NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। भारत के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने जीएसटी दरों में हुई कटौती पर केंद्र सरकार को घेरा है।
एक समाचार पत्र में छपे लेख में चिदंबरम ने कहा कि आखिरकार सरकार ने वही माना जो उन्होंने आठ साल पहले संसद में उठाया था कि जीएसटी दर 18 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इस फैसले को सही लेकिन बहुत देर से उठाया गया कदम बताया।
चिदंबरम ने याद दिलाया कि जब 2016 में संविधान संशोधन बिल पर संसद में चर्चा हुई थी, तब उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर है, जो अमीर और गरीब दोनों पर समान रूप से लागू होता है। ऐसे में इसे 18 फीसदी से ऊपर रखना अन्यायपूर्ण होगा। उन्होंने चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि उभरते बाजारों में जीएसटी की औसत दर 14.1फीसदी है और विकसित देशों में करीब 16.8फीसदी। यही कारण है कि कांग्रेस ने 18 फीसदी की दर का सुझाव दिया था।
पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र ने उस समय यह तर्क दिया था कि कम दरें रखने से राज्यों को भारी नुकसान होगा, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार ने ऊंची दरों के जरिए उपभोक्ताओं से हर संभव पैसा वसूल किया है। उन्होंने आंकड़े दिए कि 2017-18 में जीएसटी से करीब 11 लाख करोड़ रुपए वसूले गए, जबकि 2024-25 में यह राशि बढ़कर 22 लाख करोड़ तक पहुंच गई।
चिदंबरम ने लेख में लिखा कि यह बोझ लोगों की जेब पर पड़ा, खपत घटी और घरेलू कर्ज बढ़ा। यही वजह थी कि जीएसटी को आम लोगों ने “गब्बर सिंह टैक्स” नाम से पुकारा। चिदंबरम ने सवाल उठाया कि अगर आज टूथपेस्ट, हेयर ऑयल, घी, बच्चों के नैपकिन, पेंसिल-कॉपी, ट्रैक्टर और स्प्रिंकलर जैसी रोज़मर्रा की चीजों पर 5 फीसदी दर लगाना सही है, तो पिछले आठ सालों तक लोगों से ज्यादा वसूली क्यों की गई। उन्होंने कहा कि ऊंचे टैक्स स्लैब ने खपत को दबाया और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया।
उन्होंने यह भी कहा कि दरों में कटौती अच्छी शुरुआत है लेकिन काम यहीं खत्म नहीं होता।
उन्होंने सरकार को छह बड़े कदम उठाने की सलाह दी-जिनमें भारत को एक सिंगल जीएसटी रेट की दिशा में बढ़ना चाहिए। कानून की जटिल भाषा को खत्म कर इसे आसान बनाया जाए। फॉर्म और रिटर्न की प्रक्रिया सरल हो और फाइलिंग की संख्या घटाई जाए। छोटे व्यापारियों और दुकानदारों को सीए की मदद की जरूरत न पड़े। जीएसटी कानूनों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला जाए और केवल आर्थिक दंड दिया जाए। टैक्स अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि व्यापारी दुश्मन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है।
चिदंबरम ने अपने लेख के आखिर में लिखा कि दरों में कटौती को बीजेपी अपनी जीत की तरह पेश कर रही है, जबकि यह असल में देर से उठाया गया कदम है। उन्होंने लिखा कि सरकार को उपभोक्ताओं से माफी मांगनी चाहिए कि आठ साल तक उन्हें ऊंचे टैक्स ढांचे का बोझ झेलना पड़ा। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे के सुधारों के लिए जनता को और आठ साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

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