इंद्र शेखर शाह
वस्तु और सेवाकर ( जीएसटी) दरों में की गई कटौती से अर्थव्यवस्था को कितना लाभ होगा और अगला सुधार किन क्षेत्रों में किया जाना चाहिए, पर सरकार ने अभी से विचार करना शुरू कर दिया है। जीएसटी दरों के की गई कटौती से न सिर्फ आम लोगों को फायदा हो रहा है बल्कि अमेरिका की ऊंची टैरिफ दरों से होने वाले नुकसान को भी घरेलू स्तर पर पूरा किया जा सकेगा। सरकार के इस कदम से खपत और विकास दर दोनों बढ़ेगी। एक अनुमान के अनुसार इन सुधारों से देश की आर्थिक वृद्धि 7 से 7.5 फीसदी हो सकती है।
जीएसटी परिषद ने अब टैक्स स्लैब को घटाकर पांच की जगह तीन कर दिया है। ज़ाहिर तौर पर ऐसा करके कंपनियों, उत्पादकों, सेवा प्रदाताओं और कर प्रशासकों समेत सभी हितधारकों की परेशानियों को कम किया गया है। निश्चित रूप से जब कर अनुपालन की लागत कम होगी। अब कर की दरें पांच और 18 फीसदी हो गई हैं जबकि विलासिता एवं सिगरेट जैसी हानिकारक वस्तुओं पर 40 फीसदी की विशेष दर लागू है।
जीएसटी में कई सारे स्लैब होना वैश्विक स्तर पर स्वीकृत टैक्स मापदंड़ों के भी मुताबिक़ नहीं था। इसने कहीं न कहीं टैक्स दक्षता और कर सरलीकरण के मामले में भारत को पूरी दुनिया में एक कमज़ोर देश बना दिया था। दुनिया के ज़्यादातर देशों में अमूमन जीएसटी और वैट की एक या दो दरें ही प्रचलित हैं, जैसे कि ऑस्ट्रेलिया में जीएसटी की 10 प्रतिशत की एक ही दर है, न्यूजीलैंड में उत्पादों पर 15 प्रतिशत जीएसटी लिया जाता है, तो सिंगापुर में 9 प्रतिशत जीएसटी लिया जाता है, इसी तरह से यूरोपीय संघ में आमतौर पर आवश्यक वस्तुओं पर 17 से 25 प्रतिशत का स्टैंडर्ड वैट और एक रियायती दर (5-10 प्रतिशत) लागू है। इस लिहाज़ से देखा जाए तो भारत में जीएसटी की पांच दरों और उपकर ने इसे एक अपवाद बना दिया था। जीएसटी दरों की वजह से निसंदेह तौर पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर असर पड़ा और कारोबारियों को तमाम तरह के अनुपालनों का पालन करना पड़ता था।
जीएसटी स्लैब कम करने का यह फैसला हालांकि ऐसा नहीं है, जिससे कर प्रणाली की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. राज्यों के लिए राजस्व तटस्थता यानी ऐसे बदलाव जिनसे राज्य सरकारों के खजाने में आने वाले राजस्व में कोई बदलाव न हो, राज्यों को होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए तंत्र विकसित करना और कर आधार को व्यापक बनाना यानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को कर के दायरे में लाना, जैसे कई सवाल आज भी क़ायम है, जिन पर गंभीरता से काम करने की ज़रूरत है. हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है कि जीएसटी काउंसिल का यह निर्णय संरचनात्मक सुधार के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण है और लोगों को ज़्यादा जीएसटी से राहत प्रदान करने के साथ ही सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी करने के बीच संतुलन स्थापित करने वाला है.
जीएसटी स्लैब में किया गया यह सुधार न केवल आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर टैक्स का बोझ कम करता है, बल्कि कारोबारियों के लिए कर अनुपालन की प्रक्रिया को भी आसान बनाता है, साथ ही यह भारत के घरेलू खपत को भी बढ़ाता है। जीएसटी सुधार के दौरान सरकार ने स्वास्थ्य बीमा और जीवन रक्षक दवाओं पर लगने वाले टैक्स को कम किया है। जिस तरह से विलासिता की वस्तुओं पर अधिक जीएसटी लगाने का ऐलान किया गया है, वो सरकार के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करता है, यानी यह दिखाता है कि जो टैक्स देने में सक्षम हैं, उनसे ज़्यादा टैक्स लिया जाएगा। इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के वर्तमान महौल में अगर भारत अपनी विकास की गति को बरक़रार रखना चाहता है, तो उसके लिए यह बढ़ता हुआ पूंजीगत व्यय और मज़बूत खपत का तालमेल बेहद अहम साबित होगा।
जीएसटी में और सुधार किए जाने की बातें अभी से उठने लगी हैं। इसके साथ ही अर्थशास्त्री भी विभिन्न क्षेत्रों में सुधार किया जाने की बातें कर रहे हैं। अब देखना यह हैं कि सरकार किस किस क्षेत्रों में सुधार पर ध्यान दे रही है और उसका लाभ आम लोगों, युवाओं, गरीबों के साथ साथ अर्थव्यवस्था को कितना मिलता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह के किसी भी टैक्स का असर नकारात्मक होता है। अर्थात जितना अधिक टैक्स होगा, उत्पादन उतना ही कम होगा और कम टैक्स होने से मांग बढ़ाने और उत्पादन बढ़ाने दोनों में ही मदद मिलती है। ऐसे में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स सुधारों के माध्यम से टैक्स के बोझ में कमी आने से देश की आर्थिक वृद्धि की क्षमता 7.0 से 7.5 फीसदी तक बढ़ सकती है। फिलहाल चालू वित्त वर्ष में विकास दर 6.3 से 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन जीएसटी दरों में की गई कटौती के बाद से ही वैश्विक एजेंसियां भारत के विकास अनुमान को बढ़ाना शुरू कर दिया है।
चालू वित्त वर्ष के आम बजट में आयकर की दर में कटौती से लोगों की खर्च योग्य आय में प्रभावी रूप से वृद्धि हुई है। इससे कुल डिमांड में 2.3 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होने का अनुमान जताया गया था। जीएसटी दरों में कमी से लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये की डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। इस तरह अर्थव्यवस्था में कुल 3.5 लाख करोड़ रुपये का योगदान हो सकता है।
उपभोग में वृद्धि के साथ कंपनियों के लाभ में भी वृद्धि होने की संभावना है। बढ़ी हुई खपत से कंपनियों की बिक्री मात्रा में वृद्धि होगी और वित्त वर्ष 2024-25 के शुद्ध लाभ में 1.0 से 1.5 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है। विशेषज्ञों की माने तो जीएसटी दरों में कटौती से महंगाई में भी कमी आना स्वाभाविक है लेकिन महंगाई पहले से ही कम है। इस कदम से महंगाई और नीचे आ सकती है। आने वाले समय में आवश्यक वस्तुओं की महंगाई दर 0.15 फीसदी तक नीचे आ सकती है।
अमेरिका के 50 फीसदी टैरिफ के प्रभावों से निपटने में भी जीएसटी दरों में कमी किये जाने से मदद मिलने का अनुमान है। चालू वर्ष में भारत पर अमेरिकी शुल्क का प्रभाव लगभग 0.5 फीसदी हो सकता है। लिहाजा जीएसटी सुधार से इस शुल्क की भरपाई कहीं ज्यादा हो सकती है।
सरकार की माने तो जीएसटी सुधारों से युवाओं के लिए रोजगार और व्यवसाय के नए अवसर पैदा होंगे। एमएसएमई और स्टार्टअप्स में युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी और परिवारों व कारोबारियों पर वित्तीय बोझ कम होगा। इन सुधारों में सरकार ने उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है जहां युवाओं की बड़ी भागीदारी है। इनमें शिक्षा, ऑटोमोबाइल, प्रौद्योगिकी, हस्तशिल्प, फुटवियर, स्वास्थ्य सेवा, खाद्य प्रसंस्करण और वस्त्र जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इससे समावेशी विकास, स्थिरता और अगली पीढ़ी को सशक्त बनाने के भारत के दृष्टिकोण को मजबूती मिलेगी। नए सुधारों में कई प्रमुख क्षेत्रों की जीएसटी दरें घटाई गई हैं। चमड़ा, जूते, कागज, कपड़ा, हस्तशिल्प, खिलौने, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे उद्योगों को इसमें शामिल किया गया है। अधिकांश वस्तुओं पर जीएसटी 12प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। 2,500 रुपये तक के जूतों पर भी अब सिर्फ 5 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। इसका सीधा फायदा युवाओं और छोटे कारोबारियों को मिलेगा, जिससे उत्पादन लागत घटेगी और स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा।
इसी तरह, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण को बढ़ावा देने के लिए लकड़ी के विकल्पों पर भी जीएसटी घटाया गया है। चावल की भूसी के बोर्ड, जिप्सम बोर्ड, सीमेंट बॉन्डेड पार्टिकल बोर्ड, जूट पार्टिकल बोर्ड, बगास बोर्ड और सिसल फाइबर बोर्ड पर टैक्स 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे एमएसएमई को समर्थन मिलेगा और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ेगा।फिटनेस और स्वास्थ्य सेवाओं को भी इस सुधार का लाभ मिलेगा। जिम और फिटनेस सेंटर पर जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।
इससे सदस्यता शुल्क सस्ता होगा और अधिक लोग, खासकर युवा और मध्यम वर्गीय परिवार, स्वास्थ्य और फिटनेस सेवाओं का लाभ उठा पाएंगे। इन सुधारों का मकसद उपभोक्ताओं के लिए लागत कम करना, कारोबारियों के लिए नियम सरल बनाना और भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है।