अर्जुन देशप्रेमी/लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
बिहार में नीतीश कुमार को लेकर चाहे जितनी बातें होती हों, पर एक बात तो तय थी कि वह ना सिर्फ़ ईमानदार थे वरन् उन्होंने बिहार को पटरी पर लाया। उसे जंगलराज से मुक्त किया। उनकी अनेकानेक उपलब्धियां रही हैं। पर जिस तरह से उन्होंने अपने बेटे को आगे किया है और उसे बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाने की बात चल रही है, उसने उनकी छवि को चार्ट पहुँचाने का काम किया है। ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार ने परिवारवाद के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम से जो कुछ भी अर्जित किया था, उसे वह गँवा रहे हैं या जल्दी ही गँवा देंगे।

साथ ही दूसरे दलों पर भाजपा के साथ मिलकर जो वार करते थे, उसे भी वह भोथरा कर देंगे।
सच्चाई से देखें तो लगभग 20 वर्ष पूर्व बिहार की जनता ने पूरी आशा और विश्वास के साथ शासन की बागडोर श्री नीतीश कुमार को सौंपी। श्री कुमार ने वर्ष 2005 में कानून का राज स्थापित करने और न्याय के साथ विकास के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर उन्होंने सुशासन, पारदर्शिता एवं समावेशी विकास के सिद्धांतो पर शासन की नींव रखी। पहले वर्ष 2005-2010 तक के लिए और इसके उपरांत अभी तक सुशासन के कार्यक्रम बनाये रखे। उन्होंने पूरी इमानदारी एवं लगन से ‘सुशासन के कार्यक्रम’ पर आधारित नीतियों, कार्यक्रमों एवं योजनाओं का क्रियान्वयन किया। उपलब्धियों, संभावनाओं एवं चुनौतियों से परिपूर्ण इस यात्रा में श्री नीतीश कुमार को राज्य की जनता का भरपूर सहयोग एवं समर्थन मिल रहा है। आपको यह अतिशयोक्ति लगेगी, पर यह सच है कि कुछ वर्षो की अवधि में ही उन्होंने कई सार्वजनिक संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण किया। इस सफ़र में जहाँ एक ओर प्रभावी विधि व्यवस्था, कानून का राज स्थापित करने में सफलता मिली, वहीं दूसरी ओर मानव संसाधन के साथ-साथ उत्तम आधारभूत संरचना के विकास में श्री नीतीश कुमार ने कई नई ऊचाइयाँ हासिल की है। लोगों के मन में सुरक्षा एवं निश्चय का माहौल बना, जिसका प्रभाव शहर तथा गांवों में आर्थिक तथा सामाजिक गतिविधियों में देखा जा सकता है। समाज के कमजोर, साधनहीनता एवं विकास से वंचित वर्गों को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने बिहार के विकास की एक नई दिशा की कल्पना की ।
राज्य में विधि-व्यवस्था बहाल कर कानून का राज स्थापित करना श्री नीतीश कुमार की प्रथम तथा सर्वोच्च प्राथमिकता रही। बिना कोई भेदभाव से कानूनी प्रावधानों एवं वैधिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए हमने अपराध पर नियंत्रण तथा अपराधियों को निष्प्रभावी करने के लिए ठोस व्यवस्था लागू की, जिसका परिणाम चारों ओर देखा जा सकता है। संगठित अपराध पर कड़ाई से अंकुश लगाया गया। न्यायालयों से समन्वय कर त्वरित विचरण प्रणाली की व्यवस्था लागू की गई और न्यायालायों द्वारा बड़ी संख्या में अपराधियों को सजा सुनाई गई। जनसंख्या के अनुपात में पुलिस बल मे नियुक्ति सहित, पुलिस को सभी आवश्यक संसाधन के साथ-साथ उनके आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। असामाजिक तत्वों के द्वारा जहाँ कहीं भी कलह पैदा करने या सांप्रदायिक स्थिति पैदा करने की कोशिश की गई तो उन्होंने त्वरित कार्यवाई करते हुए लोगों से संवाद कायम कर उनके सहयोग तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप से इन घटनाओं को नियंत्रित किया है। इन प्रभावी कार्यवाईयों से जहाँ एक ओर नागरिकों के मन में सुरक्षा का भाव जागा, वहीं दूसरी ओर अपराधियों मे कानून का डर स्थापित हुआ। आज लोग कभी भी और किसी भी समय निजी एवं सामाजिक गतिविधियों के लिए अपने घरों से निकल सकते हैं। सुरक्षा एवं उत्साह के इस अहसास को आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता।
जीरो टोलरेंस की निति अपनाकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध श्री नीतीश कुमार की मुहीम जारी है | कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्था कर भ्रष्ट लोक सेवकों के विरुद्ध प्रभावकारी कार्यवाई सुनिश्चित की गई है | निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, विशेष निगरानी इकाई एवं आर्थिक अपराध इकाई के द्वारा भ्रष्टाचार में संलिप्त, आय से अधिक संपत्ति उपार्जित करने एवं पद का दुरूपयोग करने वाले लोक सेवकों के विरुद्ध मामले दर्ज कर उन्हें सजा दिलाने और उनकी अवैध संपत्ति को जब्त करने की ठोस कार्रवाइयां की गई हैं। देश में पहली बार जब्त अवैध संपत्तियों के भवनों में गरीब और निःशक्त बच्चों के लिए विद्यालय खोले गए।
अपराध और जंगल राज के लिए जाने जाने वाले बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने कानून-व्यवस्था सुधारने, महिला सशक्तिकरण (जैसे- साइकिल योजना, सरकारी नौकरियों में आरक्षण), और बुनियादी ढांचे (सड़कें, बिजली) के विकास पर ध्यान केंद्रित किया है। “7 निश्चय-1 और 2” के तहत 20 लाख युवाओं को नौकरी/रोजगार, हर घर नल का जल, और ‘सुशासन’ को मुख्य उपलब्धियां माना जाता है।
इसके साथ ही जिस हिम्मत और दूरदर्शिता से उन्होंने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की, वह एक गेम चेंजर साबित हुआ। इससे राज्य की महिलाओं को नया संबल मिला। शराब माफिया के भारी भरकम दवाब के बाद भी नीतीश कुमार ने शराबबंदी वापस नहीं ली। इससे महिलाओं का बड़ा जुड़ाव उनके साथ हुआ जिसका फ़ायदा एनडीए को मिला। यह काम उन्होंने तब किया जब राज्य के राजस्व पर शराबबंदी के कारण दवाब रहा है। इसके साथ ही बिहार सरकार द्वारा संचालित इन योजनाओं से शिक्षा, स्वास्थ्य, और बिजली-पानी की स्थिति में अभूतपूर्व सुधार देखा गया है, जो नीतीश कुमार के नेतृत्व की प्रमुख उपलब्धियां मानी जाती हैं। राज्य में इन्होंने एक अलग सामाजिक समीकरण भी बनाया। मात्र ढाई प्रतिशत कुर्मियों की जाति से आनेवाले नीतीश कुमार ने राज्य में अबाध रूप से पाँच बार चुनाव जीते। इससे उनके प्रति राज्य के लोगों के झुकाव को समझा जा सकता है। इससे उनकी छवि लोगों के बीच बहुत अच्छे राजनेता की बनी रही है।
पर हाल में काफ़ी कुछ ऐसा हुआ है जिससे ऐसा लगता है कि उनकी छवि को ठेस पहुंचाना तय है। ख़ासकर जिस तरह से उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को अपनी जगह स्थापित करने के लिए अपने मन से या अपने लोगों के दवाब में कदम उठाये हैं। ईमानदारी से आकलन किया जाए तो, अगर निशांत कुमार नीतीश कुमार के बेटे नहीं होते तो उनको शायद उनको वर्तमान हालत में कोई नौकरी भी नहीं देता। उनकी शारीरिक भाव भंगिमा, उनकी बोलने की स्थिति, ऐसा कोई अहसास नहीं कराती है जिससे लगे की यह कोई नेता भी हो सकते हैं। उन्होंने आजतक कोई पद नहीं संभाला है, न ही उनके पास कोई अनुभव है। राजनीति से वे दूर ही रहे हैं। इसके बाद भी अचानक से उनको जानता दल यूनाइटेड में जिस तरह से प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उससे साफ़ साफ़ परिवारवाद की गंध आ रही है। और यह तब हो रहा है जब जदयू के अंदर एक से बढ़कर एक क़ाबिल लोग हैं। लेकिन नीतीश कुमार को पुत्र मोह ने मजबूर कर दिया है, ऐसा आभास हो रहा है। इसमें महत्वपूर्ण यह है कि पूरी ज़िंदगी नीतीश कुमार लालू यादव को इसी परिवारवाद के लिए कोसते रहे हैं। साथ ही वह कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को भी इसके आधार पर आड़े हाथों लेते रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार वही सब कैसे कर सकते हैं जिसकी वह मुखालफ़त करते रहे हैं। क्या अब आने वाले दिनों में लोग इस मामले में नीतीश कुमार पर हल्ला नहीं बोलेंगे? अब देखा जाए तो लालू यादव और नीतीश कुमार में अंतर क्या रह गया। लालू अपने बेटों को सत्ता सौंप गए और अब नीतीश कुमार अपने बेटे को सत्ता सौंपने की तैयारियों में लगे हैं। यह तो वही बात है की राजा का बेटा ही राजा होगा। चाहे वह लालू की पार्टी का मामला हो, या रामविलास पासवान की पार्टी का या फिर नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का। सवाल तो भाजपा पर भी होगा जिसने सकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी को सता सौंपी है या जिन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी कर रही है। वंशवाद के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नीतीश कुमार अब किस मुँह से राहुल गांधी का विरोध करेंगे? उनमे और सोनिया गांधी में अंतर क्या रह गया?