अर्जुन देशप्रेमी
देश में गैस और तेल का संकट मंडराता दिख रहा है जो हमारी रसोई को ठप कर सकता है, गाड़ियों पर ब्रेक लगा सकता है, कारखानों को बंद करा सकता है और सेना की गाड़ियों पर लगाम लगा सकता है। इससे होटल, रेस्टोरेंट के साथ-साथ देश में अन्न संकट भी पैदा कर सकता है क्योंकि इससे उर्वरकों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। यह सब कुछ इसलिए आशंकित है क्योंकि देश में कच्चे तेल और गैस का उत्पादन बेहद कम है। देश अपनी जरूरत का ८० से ९० प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल और गैस आयात करता है जिससे देश में डीजल, पेट्रोल, केरोसिन तेल, सीएनजी, एलपीजी यानि रसोई गैस, पीएनजी यानि पाइप लाइन से रसोई में सप्लाई होने वाली गैस, कारखानों को सप्लाई होने वाली और आम आदमी से लेकर कंपनियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाले वाहनों में इस्तेमाल होनेवाली सीएनजी तथा अनाज उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद आदि सब कुछ कच्चे तेल और गैस से ही प्रसंस्करण के बाद बनते हैं। ऐसे में इनकी सप्लाई में बाधा आने पर देश और आम आदमी से जुड़ी ज्यादातर सेवायें प्रभावित हो जाएंगी।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण इनकी आपूर्ति देश को या तो बंद है

दिक्कत यह है कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण इनकी आपूर्ति देश को या तो बंद है या बंद होने की आशंका है। हालांकि भारत पर अभी तक बड़ा असर नहीं पद है क्योंकि देश ने पहले से अपना बड़ा रिज़र्व बना रखा है तथा विकल्पों पर पहले से काम करता रहा है। पर जो हाल पाकिस्तान, बांग्लादेश, कोरिया, जापान का होता दिख रहा है, वह भारत के साथ नहीं होगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। कल की ख़बरों पर गौर करें तो देश के कई हिस्सों से रसोई गैस को लेकर परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं। भारत में घरेलू गैस उत्पादन लगभग 19.1 करोड़ मानक घन मीटर प्रतिदिन की कुल खपत का करीब आधा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। ऐसे में पश्चिम एशिया संकट के कारण गैस आपूर्ति बाधित होने से प्राथमिकता तय करने का फैसला किया गया है।सरकार ने कहा कि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को आपूर्ति बनाए रखने के लिए पेट्रोकेमिकल संयंत्रों, बिजली इकाइयों और ऊंची कीमत पर गैस खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मिलने वाली गैस में कटौती की जा सकती है।
हालांकि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आयातित गैस आपूर्ति बाधित होने के बीच केंद्र सरकार ने घरेलू स्तर पर उत्पादित प्राकृतिक गैस के आवंटन की प्राथमिकता सूची संशोधित कर दी है। नई व्यवस्था में एलपीजी उत्पादन को सीएनजी और पाइप से मिलने वाली रसोई गैस के साथ शीर्ष प्राथमिकता दी गई है। सरकार की तरफ से जारी गजट अधिसूचना के मुताबिक, इन क्षेत्रों की जरूरतें पहले पूरी की जाएंगी और उसके बाद ही अन्य क्षेत्रों को गैस उपलब्ध कराई जाएगी।संशोधित व्यवस्था के तहत पाइप के जरिये घरेलू रसोई गैस (पीएनजी), वाहनों के लिए संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) और एलपीजी उत्पादन को प्राथमिकता श्रेणी में सबसे ऊपर रखा गया है। इन क्षेत्रों को पिछले छह महीने की औसत खपत के आधार पर 100 प्रतिशत गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
उर्वरक क्षेत्र को दूसरी प्राथमिकता दी गई है और उसकी पिछले छह महीने की औसत मांग का कम-से-कम 70 प्रतिशत पूरा किया जाएगा। इस सूची में तीसरे स्थान पर चाय उद्योग, विनिर्माण और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को रखा गया है। इन्हें परिचालन उपलब्धता के आधार पर पिछले छह महीने की औसत गैस खपत का लगभग 80 प्रतिशत उपलब्ध कराया जाएगा।शहरी गैस वितरण (सीजीडी) से जुड़ी कंपनियों द्वारा औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को की जाने वाली आपूर्ति को प्राथमिकता सूची में चौथे स्थान पर रखा गया है।

ईरान पर अमेरिका एवं इजराइल के संयुक्त हमले और फिर ईरान के जवाबी कार्रवाई से पूरे इलाके में तनाव बढ़ा

ईरान पर अमेरिका एवं इजराइल के संयुक्त हमले और फिर ईरान के जवाबी कार्रवाई से पूरे इलाके में तनाव बढ़ गया है। इसके कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री यातायात में कमी आई है और ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की लगभग एक-तिहाई आपूर्ति इसी रास्ते से होती है।
सरकार ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये एलएनजी आपूर्ति बाधित होने के कारण आपूर्तिकर्ताओं ने ‘फोर्स मेज्योर’ प्रावधान लागू कर दिया है। यह प्रावधान किसी असाधारण या अनियंत्रित परिस्थिति के कारण अनुबंध की शर्तें पूरी न कर पाने पर लागू होता है। ऐसे में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को गैस उपलब्ध कराने के लिए घरेलू गैस आपूर्ति को नए सिरे से व्यवस्थित किया गया है।
अधिसूचना के मुताबिक, पाइपलाइन संचालन के लिए जरूरी कंप्रेसर ईंधन एवं अन्य उत्पादों को भी प्राथमिकता श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि इनके बिना गैस पाइपलाइन का संचालन हो पाना संभव नहीं है। सरकार ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य प्राथमिक क्षेत्रों के लिए गैस आपूर्ति बनाए रखना और उपलब्ध संसाधनों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करना है।
सुनने में लगेगा कि सरकार तो इतना कुछ कर रही है। यानि कोई बड़ी दिक्कत शायद ना आए। पर सवाल बिल्कुल अलग है जो स्वयं सरकार के बड़े मंत्री नितिन गडकरी की तरफ़ से आए बयान से ही उठ रहे हैं। और यह सवाल है सरकार की इच्छाशक्ति को लेकर।पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर भारत की बड़ी निर्भरता लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसे में सरकार लगातार हरित और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठा रही है। लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि इस बदलाव की राह आसान नहीं है। उनका मानना है कि देश में पेट्रोलियम आयात से जुड़े बड़े आर्थिक हित इस दिशा में कई तरह की चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।

वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की कोशिश होने पर पेट्रोलियम लॉबी का विरोध होता है

डकरी ने ‘इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी’ के एक कार्यक्रम में कहा था कि जब भी सरकार वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की कोशिश करती है, तो पेट्रोलियम लॉबी इसका विरोध करती है। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से सीएनजी, एलएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद कई शक्तिशाली समूह इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं करना चाहते। उनके अनुसार जीवाश्म ईंधन से जुड़े बड़े आर्थिक हित इस क्षेत्र में बदलाव को धीमा कर सकते हैं।गडकरी का कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। हर साल लगभग 22 लाख करोड़ रुपये का खर्च जीवाश्म ईंधन के आयात पर होता है। इतनी बड़ी रकम के कारण इस क्षेत्र में कई आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यही वजह है कि वैकल्पिक ऊर्जा को तेजी से अपनाने में कई तरह की बाधाएं सामने आती हैं।पेट्रोलियम से जुड़े व्यवसायों को हरित ऊर्जा की ओर बढ़ने में अपना आर्थिक नुकसान दिख रहा है।गडकरी का दावा है कि पेट्रोलियम लॉबी उनके पीछे पड़ी है और वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।
एथेनॉल पर उनका कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग के खिलाफ नकारात्मक खबरें इस लॉबी द्वारा प्रायोजित की जा रही हैं।गडकरी का उद्देश्य भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए 86% आयात पर निर्भरता को कम करना और स्वदेशी विकल्पों (एथेनॉल, बायो-सीएनजी) को बढ़ावा देना है। गडकरी ने का मानना है कि 2030 तक भारत की परिवहन व्यवस्था को स्मार्ट, सुरक्षित और टिकाऊ बनाना लक्ष्य होना चाहिए। एथेनॉल, मेथेनॉल, बायो-डीजल, बायो-सीएनजी, बायो-एलएनजी, इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे स्वदेशी ईंधनों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इससे 2030 तक देश की अर्थव्यस्था में बायोएनर्जी का 1.6 लाख करोड़ का योगदान और 10 लाख रोजगार निर्माण होने की संभावना है। आयातित ईंधन से देश पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम वैकल्पिक ईंधनों की ओर बढ़ें, जैसे कि बायोफ्यूल, एथेनॉल, बायोडीजल और कंप्रेस्ड बायोगैस।
ऐसे में अब सवाल है कि आख़िर उनको, यानी सरकार को रोक कौन रहा है जिससे वह पार नहीं पा रहे हैं? क्या सरकार के पास इच्छाशक्ति का अभाव है? क्या सरकार कुछ व्यवसायियों के दवाब में काम कर रही है? सरकार को किसने रोका है कि वह इलेक्ट्रिक वाहनों को ही शहरों में आवश्यक नहीं बना रही है? क्यों वह लिथियम आयन बैटरियों के उत्पादन को तेजी से आगे लाने के कदम नहीं उठा रही है? क्यों वह सरकारी क्षेत्रों में हाइड्रोजन गैस के उत्पादन को बड़े पैमाने पर उत्पादन इकाइयाँ नहीं लगा रही है? क्यों वह गांवों में सोलर को अनिवार्य नहीं बना रही है? क्यों शहरों में हर छत के लिए सोलर अनिवार्य नहीं बनाया जा रहा है? जब मंत्री स्वयं बायोफ्यूल, एथेनॉल, बायोडीजल और कंप्रेस्ड बायोगैस की बात कर रहे हैं तो फिर इतने वर्षों में क्यों बड़े कदम नहीं उठाये गए हैं?
एक बात तो तय है कि अगर यह सब हो जाता या हो जाए तो हमें तेल और गैस की जरूरत ही नहीं रहेगी और ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर भी दवाब नहीं होगा। साथ ही हम मुस्लिम उमा के दवाब से भी बाहर होंगे। सरकार को अब तो जागना चाहिए और पेट्रोलियम लॉबी के दवाब को दरकिनार कर आवश्यक कदम उठाना चाहिए जिससे देश में भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न ना हो जैसी अभी सामने दिख रही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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