वे जो यूं ही मर रहे हैं
रवि अरोड़ा
खबर है कि रविवार को शाहजहांपुर में यूपी क्रिकेट एसोसिएशन के एक अंपायर की क्रिकेट मैच के दौरान हृदय गति रुकने से मौत हो गई। किसी अम्पायर की इस तरह हुई मौत की खबर हालांकि पहली बार निगाहों से गुजरी, अलबत्ता ऐसी खबरें तो रोज ही पढ़ने सुनने को मिल जाती हैं कि खेलते हुए, वर्जिश करते अथवा शादी ब्याह में नाचते समय या यूं ही खड़े खड़े किसी सेलिब्रिटी अथवा सामान्य युवा की अचानक हृदय गति रुकने से मौत हो गई। कहते हैं कि मौत का इक दिन मुअय्यन है मगर ऐसी मौतें तो पहले कभी देखी न सुनीं । आपको भी अपने आस पास से ऐसे समाचार लगभग रोज देखने सुनने को मिल रहे होंगे। । सोशल मीडिया पर भी ऐसे वीडियोज भरे पड़े हैं मगर पता नहीं क्यों केंद्र अथवा राज्य सरकारों की ओर से अबतक इसका संज्ञान नहीं लिया गया ? ऐसे में जब कहा जा रहा है कि कोविड वैक्सीन के चलते ही युवाओं की मौतों का आंकड़ बढ़ा है, क्या सरकारों की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया जरूरी नहीं हो जाती ? इस मामले में हरियाणा शायद पहला राज्य है जिसने अपनी विधानसभा में युवाओं की बढ़ती मृत्यु दर पर कोई आंकड़ा जारी किया है। राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि साल 2020 से 2026 तक 18–45 आयु वर्ग में 18,000 मौतें हार्ट फेल होने की दर्ज की गईं। यह आंकड़ा औसतन 8 मौतें प्रतिदिन का है। हरियाणा की आबादी को ही यदि आधार मान कर चलें तो देश भर में कोरोना के बाद तकरीबन चार सौ युवा रोजाना अपनी जान यूं ही खड़े खड़े गंवा रहे होंगे । क्या यह आंकड़ा हैरान परेशान करने वाला नहीं है ?
ज्ञात हो कि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि कोविड संक्रमण के बाद हृदय रोगों का खतरा 40 से 50 परसेंट तक बढ़ जाता है। इस महामारी के बाद हृदय की मांस पेशियों में सूजन जैसी समस्याएँ कई गुना अधिक देखी गई हैं और लंबे समय तक कोरोना से प्रभावित लोगों में लगभग 15 फीसदी वर्षों तक दिल से जुड़ी दिक्कतों से जूझते पाए गए । यही कारण है कि अमेरिका में पोस्ट-कोविड मरीजों के लिए लंबी अवधि की निगरानी हो रही है जबकि ब्रिटेन में “लॉन्ग कोविड क्लीनिक” तक स्थापित कर दिए गए हैं। उधर, यूरोप के कई देशों ने भी हृदय जांच को पोस्ट-कोविड प्रोटोकॉल का हिस्सा बना लिया है। अब इसी रौशनी में जब अपने मुल्क की तस्वीर को देखते हैं तो गहरी निराशा ही होती है क्योंकि हम तो अभी तक यह भी स्वीकार नहीं कर रहे कि कोरोना अथवा उसकी वैक्सीन का युवाओं की मौतों से कोई लेना देना भी है। तभी तो इन मौतों का कोई समग्र, पारदर्शी राष्ट्रीय डेटा आज तक सामने नहीं आया। समझ से परे है कि जब एक छोटा सा राज्य यह हिम्मत दिखा सकता है, तो बाकी देश क्यों चुप है ? आज जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जा रहा है और वहां न सिर्फ डेटा इकट्ठा किया जा रहा है, बल्कि उसके आधार पर स्वास्थ्य नीतियां भी बदली जा रही हैं। भारत क्यों कुछ नहीं कर रहा ?
दावे से तो कोई नहीं कह सकता कि इन मौतों का कारण कोरोना वैक्सीन ही है। यह सच भी तो तब भी शायद ही कभी साबित हो पाए l । दुनिया भर में लगी इस वैक्सीन को ईजाद करने में बड़ी बड़ी ताकतों का पैसा लगा है। ये लोग इतने प्रभावी हैं कि छोटे मोटे देशों की तो सरकारें भी बनवा अथवा गिरा सकते हैं । इस बड़े लोगों और उनकी कम्पनियों से पंजा लड़ाने का साहस कोई कथित बड़ा देश भी जब नहीं दिखा रहा तो भारत की भला क्या बिसात। यहां तो सरकारें ही पूंजीपति चलाते हैं। खैर मुझ जैसे सामान्य नागरिक को तो असली गिला अपने उस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है जो यूं तो छोटी से छोटी उपलब्धि का श्रेय लेने सज धज कर पहुंच जाते हैं मगर जब कहीं कुछ गलत हो जाए तो मौन धारण कर लेते हैं। उनका दावा था कि देश भर में 220 करोड़ कोरोना वैक्सीन लगाई गईं। किसी को एक बार तो किसी को दो अथवा तीन बार वैक्सीन लगी । वैक्सीन लगवाने पर सरकार ने न जाने क्यों एक बड़ा सा सर्टिफिकेट भी नागरिकों को थमाया । इस सर्टिफिकेट पर मुस्कुराते हुए मोदी जी की बड़ी सी तस्वीर भी छपी थी । जाहिर है कि मोदी जी ने इसे अपनी और अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि मानते होंगे मगर आज जब इसी वैक्सीन पर सवाल उठ रहे हैं तो वे क्यों खामोश हैं ? वैसे सच कहूं तो मेरा यह गिला मेरी नजरों में ही गैरजरूरी है क्योंकि जिस सरकार ने अपनी बेवकूफियों से कोरोना काल में मारे गए लोगों का ही जब संज्ञान नहीं लिया तो वह भला अब इस अपयश को कैसे स्वीकार करेगी।
लेख वरिष्ठ पत्रकार हैं।
साभार

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