रवि अरोड़ा
सोशल मीडिया पर एक वीडियो आजकल खूब वायरल हो रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक रोड शो के दौरान भीड़ में से एक युवक चिल्ला कर कह रहा है ‘ गैस नहीं मिल रही सर, क्या करें ‘। इसी वीडियो में प्रधानमंत्री का झेंपा हुआ चेहरा दिखता है और वे युवक को हाथ के इशारे से शांत करने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह घटना ओडिसा के राउरकेला की है। आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस के जमाने में इस वीडियो के असली होने की मैं तस्दीक नहीं कर सकता मगर इतना तो दावे से कह ही सकता हूं कि गैस की किल्लत की जो बात वीडियो के युवक ने कही वह करोड़ों लोगों के दिल के उद्गार हैं। घरेलू गैस को पूरे देश में हाहाकार मचा है मगर पता नहीं क्यों सरकार के कानों पर जूं भी रेंगती नजर नहीं आ रही और न ही मुख्य धारा के मीडिया में इसकी कोई खास चर्चा हो रही है। हर कोई देख रहा है कि सरकार और मीडिया चुनावों में व्यस्त है जबकि जनता जनार्दन पूरी तरह बेबस है। अपनी बात करूं तो मेरे अपने घर में मरम्मत का कार्य पिछले तीन महीने से चल रहा है जो आजकल कछुआ चाल है। ठेकेदार से शिकायत करो तो वह कहता है कि साहब क्या करूं! मजदूरों की बड़ी किल्लत है। बकौल उसके गैस का सिलेंडर चार हजार रुपए से कम में मिल नहीं रहा और इतना महंगा चूल्हा जलाकर मज़दूर की हंडिया खाली रहती है सो वापिस अपने अपने गांव जा रहे हैं।
बेशक मैं नहीं जानता कि कितने फीसदी शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूर वापिस अपने अपने गांव देहात में लौट गए हैं। मैं तो बस यह सोच रहा हूं कि गांवों में जाकर भी वे क्या करेंगे ? मुफ्त की लकड़ी कोयला कहीं से हासिल कर भी लेंगे मगर चूल्हे पर पकाएंगे क्या ? गांव देहात में कौन सा रोजगार रखा है? कोरोना काल में भी तो उनके साथ यही हुआ था । करोड़ों लोग न घर के रहे थे और न घाट के । बेशक अभी तक कोराना काल जैसा संकट दिखाई नहीं दे रहा मगर दुनिया के हालात को देख कर ऐसा कोई दावा भी तो नहीं किया जा सकता कि संकट के बादल जल्द छंट जाएंगे। युद्ध खत्म हो भी जाए तब भी हालात जल्दी ही फिर पहले जैसे हो जाएंगे , इसकी गारंटी भी भला कौन लेगा ?
बेशक रसोई गैस की किल्लत ने पूरे भारत के शहरी ढांचे को हिला दिया है मगर असली चोट तो इस ढांचे की रीढ़ प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ी है। विभिन्न सरकारी सर्वेक्षणों और अध्ययनों के अनुसार, देश के शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या लगभग 10 से 14 करोड़ के बीच मानी जाती है। ये लोग निर्माण, फैक्ट्री, परिवहन, घरेलू काम, रेहड़ी-पटरी और छोटे उद्योगों में काम करते हैं। यानी शहरों की आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं के श्रम पर टिका हुआ है। लेकिन इनकी आय का सच उतना मजबूत नहीं है जितना इनका योगदान है । औसतन एक शहरी प्रवासी मजदूर की मासिक आय 15,000 से 25,000 रुपये के बीच होती है। इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा किराया, भोजन, परिवहन और अन्य आवश्यक खर्चों में चला जाता है। बचत तो खैर क्या ही होती होगी । ऐसे में यदि रसोई गैस जैसे जरूरी चीज का खर्च अचानक कई गुना बढ़ जाए, तो उनके बजट का संतुलन पूरी तरह बिगड़ना तय ही है। शहरों के विपरीत गांवों में अभी भी लकड़ी, उपले या कोयले जैसे विकल्प उपलब्ध हैं अतः मजदूरों के समक्ष वापिस घर लौटना ही अब एक मात्र रास्ता बचा है। इस मुसीबत को गौर से देखें तो यह सिर्फ मजदूरों का संकट नहीं है, बल्कि पूरी शहरी अर्थव्यवस्था के ही लिए एक चेतावनी है। यदि प्रवासी मजदूर शहरों से लगातार लौटते रहे, तो इसका सीधा असर महंगाई, उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा। शहरों की गति धीमी पड़ सकती है, और इसका असर अंततः हमारे आपके घरों और पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा। सबसे चिंता की बात यह है कि यह संकट धीरे-धीरे गहराता जा रहा है, लेकिन इसके समाधान के लिए ठोस प्रयास नजर नहीं आ रहे हैं। उम्मीद की जा रही थी कि सरकार गैस की कीमतों और उसकी कालाबाजारी पर नियंत्रण , गरीबों के लिए सब्सिडी की व्यवस्था और शहरी गरीबों के लिए वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था जैसे कदम उठाएगी मगर सरकार और उस पर काबिज लोग तो राज्यों के चुनावों में ही मस्त हैं। पता नहीं क्यों हमारे कर्णधारों को यह समझ नहीं आ रहा कि यह सिर्फ गैस की किल्लत नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आर्थिक असंतुलन की चेतावनी है। अगर समय रहते इसे नहीं संभाला गया, तो यह संकट भी कोरोना काल जैसी एक बड़ी मानवीय और आर्थिक त्रासदी का रूप ले सकता है। क्या कोई उन दौर को भूल सकता है कि जब ऐसे ही संकट के चलते हमारी जीडीपी नकारात्मक हो गई थी। साहब अब कुछ कर ही दीजिए । वाकई गैस नहीं मिल रही सर।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।