केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में व्यापक रणनीति पेश की

सीजेआई को लेना फैसला मामले की सुनवाई 12 मई को सुप्रीम कोर्ट में

Ncr Today. Khabariya. New Delhi। देश में तेजी से बढ़ते “डिजिटल अरेस्ट” जैसे साइबर फ्रॉड पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में व्यापक रणनीति पेश की है। केंद्र सरकार की योजना में मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप की भूमिका को बेहद अहम माना गया है। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि व्हाट्सएप अब सिर्फ फर्जी अकाउंट्स को ब्लॉक करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर संबंधित डिवाइस आईडी को भी ब्लॉक करने पर विचार कर रहा है। यह कदम उन साइबर अपराधियों पर रोक लगाने के लिए महत्वपूर्ण है, जो बार-बार सिम कार्ड और अकाउंट बदलकर एक ही फोन से लोगों को ठगते हैं।
इस मामले की सुनवाई 12 मई को सुप्रीम कोर्ट में होनी है, जहां चीफ जस्टिस सुर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ गृह मंत्रालय द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट की समीक्षा करेगी। इस रिपोर्ट में चार प्रमुख क्षेत्रों प्लेटफॉर्म जवाबदेही, बैंकिंग सुरक्षा, सिम ट्रेसबिलिटी और पीड़ितों के मुआवजे के लिए कानूनी ढांचे पर विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की गई है।
मोदी सरकार के अनुसार, व्हाट्सएप ने जांच एजेंसियों को सहयोग देने के लिए डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा करीब 180 दिनों तक सुरक्षित रखने पर सहमति जता दी है। इसके अलावा प्लेटफॉर्म ने कई नए सुरक्षा फीचर्स भी लागू किए हैं, जैसे संदिग्ध प्रोफाइल की पहचान के लिए लोगो-मैचिंग सिस्टम, अनजान नंबरों के लिए अकाउंट की उम्र दिखाना, संदिग्ध मैसेज पर चेतावनी देना और हाई-रिस्क चैट में प्रोफाइल फोटो छिपाना। जनवरी से 12 हफ्तों के भीतर व्हाट्सएप ने 9,400 से अधिक संदिग्ध अकाउंट्स पर कार्रवाई की है। जांच में सामने आया है कि इन साइबर फ्रॉड का बड़ा नेटवर्क दक्षिण-पूर्व एशिया, खासकर कंबोडिया में सक्रिय गिरोहों से जुड़ा हुआ है।
इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर में भी सख्ती के उपाय सुझाए गए हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा तैयार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू करने की सिफारिश की गई है। इसके तहत संदिग्ध खातों को तुरंत फ्रीज करना, बैंकों के बीच तेज समन्वय स्थापित करना और पीड़ितों को धन वापसी के लिए प्राथमिकता देना शामिल है। इसके अलावा सिम ट्रेसबिलिटी को मजबूत करने के लिए दूरसंचार मंत्रालय को बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन लागू करने का सुझाव दिया गया है। इससे फर्जी सिम कार्ड जारी होने पर रोक लगेगी और अपराधियों तक जल्दी पहुंचा जा सकेगा। हालांकि, विशेषज्ञों ने इसके दुरुपयोग और तकनीकी सीमाओं को लेकर चिंता जाहिर की है। रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों के लिए फिलहाल कोई स्पष्ट मुआवजा तंत्र मौजूद नहीं है। वर्ष 2024 में ऐसे मामलों में 206 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और कुल नुकसान 22,845 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। 22 लाख से अधिक केस दर्ज होना इस समस्या की गंभीरता को दिखाता है।
कुल मिलाकर, सरकार की यह पहल डिजिटल अरेस्ट जैसे उभरते साइबर अपराधों के खिलाफ एक सख्त और समन्वित ढांचा तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, इसके साथ ही गोपनीयता, नागरिक अधिकार और निगरानी तंत्र को लेकर बहस भी तेज हो गई है, जो आने वाले समय में इस नीति के स्वरूप को प्रभावित करेगी।

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