अर्जुन देशप्रेमी

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अनुसूचित जाति/जनजाति एवं पिछड़े वर्गों को मिल रहे आरक्षण पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने साफ़ कहा है कि अगर माता पिता दोनों आईएएस हैं तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्जवल भुइयां की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कल जब यह बात कहीं, तब सवाल साफ़ साफ़ उनपर भी है जो इन वर्गों में धनी हैं, बड़े नेता हैं या रसूखदार, व्यापारी, उद्योगपति हैं जिनके यहाँ लोग नौकरियाँ करते हैं, अपनी सेवाएं देते हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर छात्रों के माता पिता अच्छी नौकरियों में हैं और उनकी आय भी अच्छी खासी है, तो बच्चों को आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा जारी कई आदेशों में पहले से ही ऐसे समृद्ध वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का प्रावधान है। पीठ ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और वंचित समूहों के मामले में, सामाजिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि केवल आर्थिक पिछड़ापन होता है। इसमें कुछ संतुलन होना चाहिए। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए, यह बात सही है लेकिन जब माता पिता आरक्षण का लाभ उठाकर एक निश्चित स्तर तक पहुंच चुके हैं, तो फिर उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ता को कर्नाटक पावर ट्रांसमीशन कारपोरेशन लिमिटेड में आरक्षित श्रेणी के तहत असिस्टेंट इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया था। अधिकारियों ने पाया कि याचिकाकर्ता के माता पिता दोनों ही सरकारी कर्मचारी थे और उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर सीमा से अधिक थी। याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर मे वर्गीक्रत करने का आधार उसके माता पिता की आय थी। वे दोनों ही वेतनभोगी कर्मचारी थे और कथित तौर पर उनकी संयुक्त आय 800000 (आठ लाख) रुपये से अधिक थी। परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को जारी किया गया जाति प्रमाणपत्र रद कर दिया गया, जिसमें उसे कुरुबा समुदाय का सदस्य प्रमाणित किया गया था।
इससे पहले जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले में मध्य प्रदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के बच्चों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लाभों से बाहर रखने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि स्टेट बैंक बनाम दविंदर सिंह के मामले में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा अगस्त 2024 में दिए गए फैसले में एससी और एसटी कोटे से क्रीमी लेयर को बाहर रखने का जो जिक्र किया गया था, वह केवल एक राय थी, इस संबंध में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार विधायिका के पास है।
उल्लेखनीय है कि इस विषय पर भारत के उच्चतम न्यायालय लगातार अपनी राय रखता रहा है।उसकी राय रही है कि एससी और एसटी श्रेणियों में भी ‘क्रीमी लेयर’ की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर किया जाना चाहिए। न्यायालय का तर्क था कि जो लोग समाज की सीढ़ी पर सबसे ऊपर पहुँच चुके हैं (जैसे आईएएस, आईपीएस, सांसद, विधायक), उन्हें अपने ही वर्ग के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों (जैसे मैला ढोने वाले, भूमिहीन मजदूर) के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए।वर्तमान परिदृश्य में, यह बहस अब कानूनी और राजनीतिक रूप से अंतिम निर्णय की ओर बढ़ रही है कि एससी/एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर के मानक क्या होने चाहिए।
आरक्षण नीति मूल रूप से समाज के उन तबकों को मुख्यधारा में लाने के लिए बनाई गई थी जो सदियों से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार रहे हैं। लेकिन जब एक आरक्षित वर्ग का व्यक्ति देश के सबसे प्रतिष्ठित पद यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा तक पहुँच जाता है, तो सवाल उठता है कि क्या उसकी अगली पीढ़ी को भी उसी आरक्षण बैसाखी की ज़रूरत है?
जैसे-जैसे आरक्षित वर्गों का एक हिस्सा आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हुआ, वैसे-वैसे क्रीमी लेयर का सिद्धांत सामने आया। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमी लेयर का नियम कड़ाई से लागू होता है। उच्चतम न्यायालय के ‘इंद्रा साहनी मामले (1992)’ के फैसले के बाद यह तय किया गया कि ओबीसी वर्ग में जो लोग प्रशासनिक रूप से ऊंचे पदों पर हैं या जिनकी आय एक निश्चित सीमा से अधिक है, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। यानी, ओबीसी वर्ग के आईएएस माता-पिता के बच्चों को पहले से ही आरक्षण नहीं मिलता है। पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में ऐतिहासिक रूप से क्रीमी लेयर का नियम लागू नहीं था। इसका तर्क यह था कि आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद भी इन वर्गों को सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का सामना करना पड़ता है। हालांकि, हाल के वर्षों में न्यायपालिका और समाज के एक बड़े हिस्से में इस पर बहस तेज हुई है।
जो लोग इस बात का समर्थन करते हैं कि एससी/एसटी वर्ग के आईएएस अधिकारियों के बच्चों को भी आरक्षण का लाभ मिलना जारी रहना चाहिए, उनका कहना है कि भारत में जाति एक ऐसी सच्चाई है जो आर्थिक समृद्धि या ऊंचे पद से पूरी तरह खत्म नहीं होती। एक आईएएस अधिकारी का बच्चा भले ही महंगे स्कूल में पढ़े, लेकिन समाज, रिश्तेदारों या कार्यस्थल पर उसकी जातिगत पहचान उसके साथ जुड़ी रहती है। कई बार उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी परोक्ष रूप से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए, जब तक समाज से जातिवाद और मानसिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक सुरक्षा कवच के रूप में आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी। उनका कहना है कि आईएएस माता-पिता के बच्चे जब प्रशासनिक सेवाओं या उच्च संस्थानों में जाते हैं, तो वे एक ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण को साथ लेकर आते हैं जो हाशिए पर मौजूद समाज के दर्द को समझता है। समर्थकों का मानना है कि यदि इन बच्चों को रोक दिया गया, तो उच्च पदों पर फिर से केवल एक खास वर्ग का वर्चस्व स्थापित हो सकता है, जिससे प्रशासनिक विविधता प्रभावित होगी।
दूसरी ओर, एक बहुत बड़ा वर्ग, जिसमें खुद आरक्षित वर्ग के कई बुद्धिजीवी भी शामिल हैं, का मानना है कि आईएएस के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इसके पीछे तर्क है कि आरक्षण का लाभ सीमित है। जब एक आईएएस अधिकारी, जो दिल्ली या किसी बड़े शहर के शीर्ष कॉन्वेंट स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ा सकता है, जिसके पास कोचिंग, इंटरनेट और बेहतरीन माहौल की कोई कमी नहीं है, का बच्चा आरक्षण का लाभ लेता है, तो वह अनजाने में अपने ही वर्ग के किसी बेहद गरीब, ग्रामीण और वंचित बच्चे का हक छीन लेता है। एक आईएएस का बच्चा और एक दिहाड़ी मजदूर का बच्चा (दोनों एक ही आरक्षित जाति के हों) कभी भी समान स्तर पर नहीं हो सकते। इसे अभिजात वर्ग का निर्माण कहा जाता है, जहाँ आरक्षण का फायदा सिर्फ कुछ गिने-चुने परिवारों तक ही सीमित रह जाता है। एक आईएएस अधिकारी को समाज में अत्यधिक सम्मान, सुरक्षा और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। उनके बच्चे समाज की मुख्यधारा के सबसे शक्तिशाली हिस्से में पलते-बढ़ते हैं। ऐसे बच्चों को ‘पिछड़ा’ या ‘वंचित’ कहना तर्कसंगत नहीं लगता। उन्हें आरक्षण देना उन सामान्य वर्ग के गरीब बच्चों के साथ भी अन्याय प्रतीत होता है जिनके पास बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। जब आर्थिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह सक्षम बच्चों को आरक्षण मिलता है, तो इससे पूरी आरक्षण प्रणाली की साख पर सवाल उठते हैं। इससे समाज में आरक्षण के खिलाफ आक्रोश बढ़ता है। यदि क्रीमी लेयर को बाहर कर दिया जाए, तो आरक्षण को लेकर समाज में स्वीकार्यता बढ़ेगी और इसे अधिक न्यायसंगत माना जाएगा।
आईएएस माता-पिता के बच्चों को आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं, यह सवाल अब केवल भावनाओं का नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के आत्मनिरीक्षण का है। यदि हम आरक्षण के मूल सिद्धांत ‘सामाजिक प्रतिनिधित्व’ को देखें, तो समर्थकों की यह बात सही लगती है कि जातिगत पहचान पूरी तरह नहीं मिटती। लेकिन यदि हम ‘वास्तविक सामाजिक न्याय’ की बात करें, तो संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत वितरण होना अनिवार्य है।
अगर सही नजरिये से देखें तो एससी/एसटी वर्ग में भी ओबीसी की तरह एक तार्किक ‘क्रीमी लेयर’ व्यवस्था लागू होनी चाहिए, जिसमें पहली पीढ़ी के आईएएस/आईपीएस अधिकारियों के बच्चों को स्वतः ही इस लाभ से बाहर कर दिया जाए।आरक्षण का प्राथमिक लाभ उस व्यक्ति या परिवार को मिलना चाहिए जिसने आज तक इसका एक बार भी लाभ नहीं उठाया है। साथ ही सरकार को अपनी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को इतना मजबूत करना चाहिए कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के गरीब बच्चों को किसी आईएएस के बच्चे से मुकाबला करने के लिए केवल आरक्षण के भरोसे न रहना पड़े, बल्कि उन्हें समान अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।आरक्षण एक साधन है, साध्य नहीं। इसका अंतिम लक्ष्य एक ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना है जहाँ किसी को भी अपनी जाति के कारण न तो प्रताड़ित होना पड़े और न ही आगे बढ़ने के लिए किसी विशेष विशेषाधिकार की आवश्यकता हो। आईएएस के बच्चों को आरक्षण से बाहर करना आरक्षण को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे अधिक धारदार, प्रभावी और न्यायसंगत बनाना है।

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