सवाल सिर्फ मोदी-ट्रंप की बातचीत का नहीं, उस समय का है

संजय कुमार शर्मा
देश में चुनावी बिगुल बजने से पहले सियासत का तापमान बढ़ रहा है। एक तरफ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर राजनीतिक घमासान है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापार और आयात शुल्क का दबाव सरकार के सामने खड़ा है। ऊपर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई टेलीफोन वार्ता ने एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या यह महज सामान्य कूटनीतिक संवाद था या इसके पीछे बदलते चुनावी माहौल की कोई चिंता भी काम कर रही है?
आधिकारिक तौर पर बातचीत को भारत-अमेरिका संबंधों, व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा बताया गया है। निश्चित रूप से किसी भी बड़े देश के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच संवाद असामान्य बात नहीं है। लेकिन राजनीति में केवल बातचीत महत्वपूर्ण नहीं होती, उसका समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
भारत में चुनाव सिर पर हों और उसी समय अमेरिका भारत पर आयात शुल्क को लेकर दबाव बनाए, व्यापारिक हित प्रभावित होने की आशंका हो, किसानों और उद्योगों पर उसके असर की चर्चा हो तथा देश के भीतर एसआईआर को लेकर मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर बहस छिड़ी हो, तो प्रधानमंत्री की ट्रंप से बातचीत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी शुल्क का असर केवल आंकड़ों और कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। निर्यातक, उद्योग, किसान, रोजगार और बाजार—सभी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे पड़ते हैं तो उसका असर कारोबार पर पड़ेगा और कारोबार पर असर अंततः रोजगार और आय पर दिखाई देगा। चुनाव के समय आर्थिक दबाव का राजनीतिक असर होना कोई रहस्य नहीं है।
यही वजह है कि मोदी-ट्रंप बातचीत को केवल कूटनीतिक औपचारिकता कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। देश जानना चाहेगा कि बातचीत में अमेरिकी शुल्क पर क्या बात हुई? भारत ने क्या रुख रखा? क्या व्यापारिक तनाव कम करने का कोई रास्ता निकला? क्या भारतीय हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस आश्वासन मिला? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आने वाले दिनों में इसका कोई ठोस परिणाम दिखाई देगा?
दूसरी तरफ एसआईआर है, जिसने चुनावी राजनीति को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी नींव है। उसमें किसी योग्य नागरिक का नाम रहना जितना जरूरी है, उतना ही अपात्र नाम का हटना भी। लेकिन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि किसी वास्तविक मतदाता को यह आशंका न हो कि प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर उसका लोकतांत्रिक अधिकार कमजोर किया जा सकता है।
यहीं चुनाव आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। आयोग को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल उनके आदेशों से नहीं बनती, बल्कि उनकी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के विश्वास से बनती है।
एसआईआर को लेकर विपक्ष के आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। लेकिन इन आरोपों को नजरअंदाज कर देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है। यदि करोड़ों मतदाताओं की सूची की समीक्षा हो रही है तो प्रत्येक नागरिक को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसका नाम बिना पर्याप्त प्रक्रिया और सत्यापन के नहीं हटेगा। यही भरोसा चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार इन तमाम मोर्चों को लेकर चिंतित है? इसका सीधा उत्तर किसी के पास नहीं है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच बातचीत को चुनावी भय का परिणाम कहना भी बिना प्रमाण के निष्कर्ष होगा। लेकिन यह पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है कि जब देश चुनावी दौर में प्रवेश कर रहा है, तब विदेश नीति, व्यापार नीति और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को सरकार किस तरह देख रही है?
क्योंकि चुनाव केवल भाषणों से नहीं जीते जाते। जनता के बीच आर्थिक हालात, रोजगार, महंगाई, किसान, उद्योग, व्यापार और शासन की विश्वसनीयता भी मुद्दे बनते हैं। और जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर बहस शुरू हो जाए तो मामला किसी राजनीतिक दल की सुविधा या असुविधा से आगे बढ़कर लोकतंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है।
सबसे बड़ा खतरा यही है कि चुनावी लाभ-हानि की राजनीति कहीं संस्थागत भरोसे पर भारी न पड़ जाए। अमेरिका से बातचीत होनी चाहिए, व्यापारिक विवाद सुलझने चाहिए और भारत के आर्थिक हितों की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन इन सबके बीच सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि राष्ट्रीय नीतियां चुनावी गणित से नहीं, राष्ट्रीय हित से संचालित होती हैं।
इसी तरह चुनाव आयोग को भी किसी राजनीतिक दल को संतुष्ट करने के बजाय देश के मतदाता को संतुष्ट करना होगा। एसआईआर हो या मतदाता सूची, हर कदम इतना पारदर्शी होना चाहिए कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सवालों का जवाब दस्तावेजों और प्रक्रिया से दिया जा सके।
मोदी-ट्रंप की फोन वार्ता के पीछे चुनावी भय था या नहीं, यह तो समय और उसके परिणाम बताएंगे। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता चुनाव के दबाव में है या लोकतंत्र जनता के भरोसे पर कायम है?
आखिर चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह जनता के विश्वास का सबसे बड़ा परीक्षण है। इसीलिए अमेरिका से होने वाली बातचीत हो या देश के भीतर मतदाता सूची की कवायद—हर कदम पर एक ही कसौटी होनी चाहिए: देशहित, पारदर्शिता और जनता का विश्वास।
क्योंकि अगर चुनाव जीत भी लिया जाए, लेकिन मतदाता को मतदान प्रक्रिया पर भरोसा न रहे, तो जीत का राजनीतिक अर्थ भले बचा रहे, लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समूह के संपादक हैं

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