संजय कुमार शर्मा
भारत के लोकतंत्र में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट दो ऐसी संस्थाएं हैं जिनसे आम आदमी को सबसे ज्यादा उम्मीद रहती है। एक मतपत्र और मतदाता की स्वतंत्रता की रक्षा करता है तो दूसरा संविधान और नागरिक अधिकारों की। इसलिए जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है तो देश की नजर इस बात पर टिक जाती है कि अदालत उस सवाल की तह तक कितनी गंभीरता से जाती है।
एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप है कि एसआईआर से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण निर्णय अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। याचिकाकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अदालत ने फिलहाल निलंबन का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया है, लेकिन संकेत दिया है कि यदि रिकॉर्ड से साबित होता है कि निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत लिए गए तो ऐसे निर्णयों को रद्द किया जा सकता है। पहली नजर में यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप दिखाई देता है। अदालत ने समाचार रिपोर्टों के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के बजाय संबंधित पक्षों से जवाब मांगना उचित समझा है। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या यह नोटिस मामले की गहराई तक जाने की शुरुआत है या फिर ऐसा न्यायिक पड़ाव, जहां कुछ समय बाद मामला जवाबों और तारीखों के बीच ठंडा पड़ जाएगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग के खिलाफ उठे आरोप सामान्य प्रशासनिक विवाद नहीं हैं। यदि किसी संवैधानिक संस्था में निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के बजाय किसी एक व्यक्ति के स्तर पर लिए जाने का आरोप सही साबित होता है तो मामला केवल ज्ञानेश कुमार का नहीं रहेगा। यह चुनाव आयोग की संस्थागत स्वायत्तता का प्रश्न बन जाएगा।
और यहीं से न्यायपालिका की भूमिका पर बहस आवश्यक हो जाती है।
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों और आदेशों ने व्यापक राजनीतिक एवं सार्वजनिक बहस को जन्म दिया है। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में याचिकाएं खारिज कीं और 2019 में पुनर्विचार याचिकाएं भी खारिज कर दीं। सरकार ने इसे अपनी पारदर्शिता की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि विपक्ष और आलोचकों ने फैसले तथा न्यायिक परीक्षण की सीमाओं पर सवाल उठाए। इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत का फैसला गलत था; सवाल यह है कि इतने बड़े सार्वजनिक महत्व के मामलों में न्यायिक तर्क और उसकी सीमाओं पर बहस क्यों न हो?
पेगासस मामले में स्थिति अलग थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर विस्तृत तथ्य प्रस्तुत न किए जाने के बाद स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की और उसकी निगरानी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश को सौंपी। यह उदाहरण बताता है कि जब संस्थागत पारदर्शिता पर सवाल उठता है तो अदालत स्वतंत्र जांच की व्यवस्था भी खड़ी कर सकती है।
किसान आंदोलन के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने तीन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई और किसानों तथा सरकार के पक्ष सुनने के लिए समिति गठित की थी। यह हस्तक्षेप अपने आप में संवैधानिक बहस का विषय रहा कि अदालत नीति और राजनीतिक समाधान के क्षेत्र में किस सीमा तक जा सकती है। वानतारा मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच की व्यवस्था की थी, हालांकि अदालत ने प्रारंभिक आरोपों को पर्याप्त प्रमाण से रहित बताया था। यानी तस्वीर एकतरफा नहीं है। इसलिए यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट हर मामले में सत्ता के पक्ष में खड़ा रहा है, तथ्यात्मक रूप से उचित निष्कर्ष नहीं होगा। लेकिन अदालत के फैसलों और उनके प्रभाव पर सवाल उठाना लोकतंत्र में असम्मान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। अब लौटिए ज्ञानेश कुमार और एसआईआर पर। यह मामला इसलिए असाधारण है क्योंकि मतदाता सूची में एक नाम का जुड़ना या कटना सीधे नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल की एसआईआर प्रक्रिया में चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने सहित विभिन्न चरण पूरे किए हैं। ऐसे में यदि निर्णय प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हों तो अदालत का काम केवल यह देखना नहीं होना चाहिए कि नियम की किताब में कौन-सी धारा लागू होती है। उसे यह भी देखना होगा कि उस प्रक्रिया का असर मतदाता के अधिकार पर क्या पड़ा।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अदालत केवल नोटिस जारी करके जिम्मेदारी पूरी मान लेगी, या फिर मूल रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, बैठक के मिनट्स और दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की वास्तविक जांच कराएगी?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड मंगाने की दिशा में संकेत दिया है। यही वह बिंदु है जहां से इस मामले की वास्तविक गंभीरता तय होगी। यदि रिकॉर्ड सामने आते हैं और आरोप निराधार निकलते हैं तो मामला वहीं समाप्त होना चाहिए। लेकिन यदि निर्णय प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन मिलता है तो केवल संबंधित आदेश रद्द करना पर्याप्त नहीं होगा; तब संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न भी उठना चाहिए।
लोकतंत्र में अदालत का काम किसी सरकार को बचाना या गिराना नहीं है। चुनाव आयोग का काम किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाना या नुकसान पहुंचाना नहीं है। और मीडिया का काम भी किसी संस्था को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि सवालों को जीवित रखना है। इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल ज्ञानेश कुमार के व्यक्ति का नहीं, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का है। यदि एसआईआर में सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ है तो चुनाव आयोग को सारे रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में संकोच क्यों होना चाहिए? और यदि प्रक्रिया में कहीं चूक हुई है तो उसे सुधारने में देरी क्यों होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस अंतिम फैसला नहीं है। यह केवल दरवाजा खोलता है। अब देश देखेगा कि उस दरवाजे के भीतर अदालत कितनी दूर तक जाती है। कहीं ऐसा न हो कि नोटिस, जवाब, अगली तारीख और फिर अगली तारीख के बीच वह सवाल ही कमजोर पड़ जाए जिसके लिए यह मामला अदालत पहुंचा है। क्योंकि सवाल केवल ज्ञानेश कुमार का नहीं है। सवाल यह है कि भारत में चुनाव कराने वाली संस्था कितनी स्वतंत्र है, मतदाता का अधिकार कितना सुरक्षित है और संवैधानिक संस्थाओं पर निगरानी रखने वाली सर्वोच्च अदालत अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को कितनी कठोरता से निभाती है। अगर इन तीनों सवालों का जवाब साफ नहीं मिला तो एसआईआर का विवाद समाप्त नहीं होगा। वह भारतीय लोकतंत्र के भरोसे पर लगा एक और प्रश्नचिह्न बन जाएगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और एनसीआर टुडे समाचार पत्र समूह के संपादक हैं।

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