कुलदीप चंद अग्निहोत्री
श्रीनगर में शहीद स्मारक के नाम से एक स्थान है जहां हर साल 13 जुलाई को कुछ राजनीतिक व दूसरे लोग जाकर माथा निभाते हैं। इस स्थान पर 22 लोगों की कब्रें बनी हुई हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे 1931 मैं पुलिस की गोली से मारे गए थे। इस कब्रिस्थान को मजार-ए-शुहदा यानी शहीदों की मजार के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल श्रीनगर में अब्दुल कादिर खान नाम के एक अपराधी पर मुकद्दमा चल रहा था। यह अपराधी कौन था और इसे कौन लाया था, इसको लेकर अभी भी विवाद चलता रहता है। जाहिरा तौर पर तो यह कहा जाता है कि यह एक अंग्रेज अफसर का रसोइया था। यह रसोई का काम कितना करता था, इसके बारे में कहना तो मुश्किल है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह शहर भर में मुस्लिम कश्मीरियों को हिंदू कश्मीरियों के खिलाफ भडक़ाने वाले भाषण करता था। ब्रिटिश सरकार जम्मू-कश्मीर के उस समय के महाराजा हरि सिंह के बहुत खिलाफ रहती थी क्योंकि महाराजा कभी उनके यूनियन जैक यानी झंडे को उतरवा देता था, कभी रेजीडेंट कमिश्नर की गतिविधियों को सीमित कर देता था। सबसे बड़ी बात यह कि महाराजा ब्रिटिश सरकार को गिलगित का इलाका पट्टे पर देने से इन्कार कर रहा था। इसलिए अब्दुल कादिर खान नाम का यह व्यक्ति सबसे ज्यादा गालियां महाराजा हरि सिंह को देता था। जाहिर है कि जम्मू कश्मीर सरकार ने इस अज्ञात कुल शील शख्स को गिरफ्तार कर लिया और जेल में बंद कर दिया। खान की गिरफ्तारी के बाद वह अंग्रेज अफसर भी गायब हो गया।
यह भी चर्चा चलती रहती है कि नेशनल कान्फ्रेंस, जिसके मालिक उन दिनों शेख मोहम्मद अब्दुल्ला थे, के लोग भी उस अंग्रेज अफसर को जानते थे और वही उसे श्रीनगर लेकर आए थे। शेख अब्दुल्ला श्रीनगर और उसके आसपास लोकप्रिय तो हो रहे थे लेकिन सशक्त सैयद लॉबी उन्हें अपना प्रतिद्वन्द्वी मानती थी क्योंकि वह लॉबी मानती थी कि कश्मीरी मुसलमानों के वे स्वाभाविक नेता हैं। शेख अब्दुल्ला, जो कश्मीरी थे, अब व्यक्तिगत बातचीत में कहने लगे थे कि कश्मीरियों को अब बाहर से आए सैयदों के नेतृत्व की जरूरत नहीं है, बल्कि वे स्वयं अपने मसले सुलझाने में सक्षम हैं। यह सैयदों और कश्मीरी मूल के मुसलमानों का नेतृत्व को लेकर झगड़ा था। लेकिन सैयदों के पास एक तुरुप का पत्ता था जिसकी काट शेख अब्दुल्ला के पास भी नहीं थी। सैयद श्रीनगर की दो मुख्य मस्जिदों, खानगाहे मौला और जामिया मस्जिद पर काबिज थे। इन मस्जिदों में मजहबी कारणों से हर जुम्मे के दिन हजारों कश्मीरी आते थे। इस अवसर पर ये सैयद वायज कश्मीरियों को भावनात्मक स्तर पर मजहब से जोड़ कर अपने पाले में रखते थे। शेख अब्दुल्ला के पास इसकी काट नहीं थी। यह काट इस अज्ञात अंग्रेज अधिकारी ने अपने रसोइए के माध्यम से मुहैया करवाई थी। वह रसोइया अब जेल में बंद था और अंग्रेज अफसर अपना काम खत्म कर जा चुका था। अब अगला काम शेख अब्दुल्ला और उसके ग्रुप को करना था। इस काम के लिए अपने लोगों को जेल के बाहर एकत्रित किया गया और जेल के दरवाजे को तोड़ कर अब्दुल कादिर खान को मुक्त करवाने का आह्वान किया गया। पुलिस ने इस गु्रप के लोगों को रोकने की कोशिश की, लेकिन यह ग्रुप को न रुकने के लिए ही आया था। पुलिस ने गोली चला दी।
कुछ लोग मारे गए और बहुत से घायल हो गए। लेकिन मरने वालों में या घायल होने वालों में कोई शेख अब्दुल्ला के ग्रुप का था या नहीं, इसके बारे में अभी तक गहन चुप्पी का वातावरण है। कितने लोग मारे गए, इसके बारे में भी कोई निश्चित प्रमाण नहीं हैं। अलबत्ता यह चर्चा गली बाजार में अभी तक चलती रहती है कि जानबूझ कर घायलों को अस्पताल ले जाने की बजाय मरने दिया गया ताकि मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हो जाए। शेख अब्दुल्ला ने यह बात फैलाना शुरू कर दी। एक घायल व्यक्ति ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा कि हमने अपना काम कर दिया है, अब आगे का काम तुमने करना है। शेख अब्दुल्ला ने कभी यह नहीं बताया कि उस घायल की यह बात सुन कर, उन्होंने उसे अस्पताल ले जाने की भी कोशिश की या फिर उसकी मौत का इंतजार करते रहे, ताकि आगे का काम आसान हो जाए। घायल तड़पते रहे और कुछ लोग उनके मरने का इंतजार करते रहे, ताकि आगे का काम आसान हो जाए। कहा जाता है कि अंत में बाईस व्यक्ति दम तोड़ गए थे। कुछ गोली से और कुछ इलाज के इंतजार में। जो इलाज का इंतजार कर रहे थे, उनके आसपास के लोग उनके मरने का इंतजार कर रहे थे। जब यह इंतजार खत्म हुआ तो बाईस लोग यह दुनिया छोड़ कर जा चुके थे। जिनकी मौत मौके पर ही हो गई थी, उनके रिश्तेदार तो इसे ‘रब्ब का भाना’ मान कर सब्र भी कर लेते, लेकिन जिनकी मौत इंतजार में हुई थी, उनके रिश्तेदार बहुत साल तक उस राजनीति को कोसते रहे जिसने उनकी जान ली थी। जब रिश्तेदार अपने प्रियजनों की लाशें ले जाने लगे ताकि कब्रिस्तान में उनको सुपुर्दे खाक किया जा सके, तो शेख अब्दुल्ला के गु्रप ने उन्हें ऐसा करने से रोका। राजनीति की भाषा में कहा जाए तो समझाया। इस समझाने का एक बहुत बड़ा कारण था। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को अपनी अगली लड़ाई के लिए ‘मजार-ए-शहीद’ चाहिए थी। उसके लिए लाशें चाहिए थीं। वे लाशें अब जाकर किसी अज्ञात अंग्रेज अफसर और उसके रसोइए अब्दुल कादिर खान ने मुहैया करवाई थीं। ये लाशें किसी भी कब्रिस्तान में दफन हो जातीं तो उस अंग्रेज अधिकारी के श्रीनगर आने का उद्देश्य क्या रहता? श्रीनगर में रातोंरात चर्चा चलाई, ये लोग शहीद हुए हैं। कितने शहीद हुए, यह श्रीनगर में आज भी बहस का विषय बना रहता है।
लेकिन कब्रें 22 हैं तो माना जा सकता है 22 ही होंगे। पर लोगों की जुबान का क्या, जितने मुंह उतनी बातें। शहीदों की मजार होती हैं। इसलिए मजार-ए-शहीद अस्तित्व में आई। सैयदों के पास अपने केन्द्र थे और उनके मुकाबले में शेख अब्दुल्ला के पास भी एक भावनात्मक केन्द्र आ गया था। लेकिन यह मजार शेख को दे देने के बाद न कहीं उस अंग्रेज का पता चला और न ही अब्दुल कादिर खान का। शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 13 जुलाई की सार्वजनिक छुट्टी ही घोषित कर दी। बाकायदा मजार पर 13 जुलाई को हर साल मेला लगने लगा। बहुत से लोग विरोध भी करते कि उन बेगुनाह लोगों, जो राजनीति का शिकार होकर बेवजह मारे गए, पर अब तो राजनीति बंद करो ताकि वे कब्र के अंदर तो सुकून से पड़े रहें। लेकिन तब अनुच्छेद 370 लागू था। न कोई जम्मू वालों को पूछता था न लद्दाख वालों को। न कश्मीर के गुज्जरों की कोई हैसियत थी और न ही पहाडिय़ों की। अब लोगों ने इस मजारे शहीद को राजनीति का अड्डा बनाने का विरोध किया तो सरकार ने 13 जुलाई की सार्वजनिक छुट्टी बंद कर दी। मजार पर जाकर लोगों के भावनात्मक शोषण को भी बंद किया। लेकिन कुछ लोगों की राजनीति का दाल-फुल्का इसी भावनात्मक शोषण के सहारे चलता है। इसलिए शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला ने बहुत हो-हल्ला किया। वे 13 जुलाई की बजाय 15 जुलाई को, जिस स्थान पर इन बाईस मृतकों की कब्रें बनी हुई हैं, उस स्थान की दीवार फांद कर अंदर घुस गए। कुछ समय वहां रह कर वापस आ गए। उनका कहना था कि वे वहां उनका फातिहा पढक़र आए हैं। बेहतर होगा उमर अब्दुल्ला प्रदेश के लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए समय निकालें, प्रदेश के विकास की कोई कारागार नीति बनाएं, शिक्षा की ओर ध्यान दें, ग्रामीण इलाकों में सडक़ों की ओर ध्यान दें। गरीब और भोले-भाले कश्मीरियों की इमोशनल ब्लैकमेलिंग बंद कर यदि राज्य की असली समस्याओं की ओर ध्यान देंगे, तो ज्यादा लाभकारी होगा। कश्मीर के विकास के लिए केंद्र से जो बड़ी राशि आ रही है, उसका सदुपयोग तय करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है)

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