लखनऊ में जजो का नाटक और नौटंकी भरा कदम

संजय शर्मा

घोड़े के नाल जड़ी जा रही थी, मेढ़की ने भी पैर उठा दिए! बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अवाम से विदेश यात्रा नहीं करने, सोना नहीं खरीदने और पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील की थी। भले ही इस अपील के बाद वे खुद विदेश यात्राओं पर निकल पड़े। उनकी इस यात्रा में लंबा चौड़ा लाव-लश्कर शामिल था, जिसपर लाखों डॉलर और विदेश मुद्रा खर्च की गई। मोदी की अपील पर अमल करने का दिखावा करते हुए हुए भाजपा नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने नाटक नौटंकी करते हुए सार्वजनिक परिवाहन, साइकिल, रिक्शा का इस्तेमाल कर जमकर फोटोग्राफी और प्रचार का आनंद लेकर वाहवाही लूटने का कार्य कर स्वयं को सरकार और भाजपा की गुडबुक में शामिल करने का काम किया। इसे नाटक और नौटंकी कहना इसलिए उचित होगा क्योंकि अगले ही दिन सभी लोग वापस सभी संसाधनों का उपभोग करते दिखाई दिए। मोदी की अपील का असर असर न्यायपालिका पर देखने को मिल रहा है। लखनऊ के 70 जजों के मोदी की अपील अमल करते हुए एसी कार छोड़ कर साइकिल और ई-रिक्शा से अदालत जाने का निर्णय लिया। वे सड़क पर निकल पड़े, वो भी बिना सुरक्षा और लाव-लश्कर के।
यह वाक्या देखने में जिला सीधा और सरल दिखता है उनके मायने और संदेश उतना ही टेढ़ा और जटिल है। इसकी आलोचना करने और इसे देश के इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज करने की जरूरत है। क्योंकि जब कार्यपालिका और विधायिका पर नियंत्रण करने के लिए बनी संवैधानिक संस्था न्यायपालिका भी सत्ता के तबले पर नांचना शुरू कर दें तो इससे बड़ा दुर्भाग्य देश के लिए नहीं हो सकता है। शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ ऐसा ही देखने का मिला। लखनऊ की जिला अदालत से संबद्ध करीब 70 जज मोदी के आह्वान में शामिल होते हुए कोर्ट जाने के लिए साइकिल और ई-रिक्शा का प्रयोग किया। जबकि इसके लिए न तो सुप्रीम कोर्ट प्रशासन और नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से कोई प्रशासनिक आदेश जारी किया गया। साइकिल चलाकर पेट्रोल बचाने का संदेश देने के नाम पर लखनऊ में न्यायिक अधिकारियों के द्वारा जो नाटक और नौटंकी भरा कदम उठाया गया उससे यह साफ पता चलता है कि देश के सिस्टम में मोदी, भाजपा और आरएसएस की सोच किस हद तक प्रवेष कर चुकी है। उनके लिए संविधान, शपथ, कानून और नियम कोई मायने नहीं रखता है।

देश के संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका को स्वतंत्र रहना और देश के जनमानस को स्वतंत्र दिखाई देना बेहद जरूरी है, लेकिन विगत वर्षो से न्यायपालिका और जजों ने ऐसे बहुत से कार्य किए जिससे उनकी निष्पक्षता लगातार सवालों के घेरे में बनी हुई है। हालांकि साइकिल चलाने की नाटक-नौटंकी भरे कृत्य का नेतृत्व लखनऊ के जिला जज मलखान सिंह और झंडी दिखाने का कार्य हाईकोट जज राजेश चौहान ने किया। जिला जज मलखान सिंह के डालीबाग स्थित आवास पर सभी जज इकट्ठा होकर सुबह 9 बजे साइकिल से कोर्ट के लिए निकले। इस दिखावे भरे कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जिन जजों को साइकिल चलाना नहीं आता था, वे ई-रिक्शा से कोर्ट पहुंचे। वहीं, कई वकील भी इसमे जुड़े और साइकिल या ई-रिक्शा से अदालत पहुंचे। इस दौरान सभी जजों ने आम लोगों को ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
सर्विस प्रोटोकॉल के अनुसार जज को किसी भी कार्य के लिए संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायिक प्रशासनिक अधिकारी के आदेश पर कार्य और सार्वजनिक व्यवहार करने पर बाध्य होना पड़ता है जबकि साइकिल चलाने और मोदी के आह्वान पर अमल करने को लेकर कोई आदेश प्रशासनिक जज द्वारा जारी किया गया है इसकी सूचना किसी भी मीडिया संस्थान के पास नहीं है।
हालंकि जजों ने साइकिल चलाकर अदालत जाने के कार्य को पेट्रोल-डीजल की बढ़ती खपत और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने के उद्देश्य और अभियान बताया। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव कुंवर मित्रेश सिंह कुशवाहा ने इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बताते हुए कहा कि बढ़ते ईंधन संकट के प्रति लोगों को जागरूक करना और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए यह आयोजन किया गया है। उन्होंने बताया कि यह अभियान आगे भी जारी रहेगा।

साइकिल यात्रा के दौरान जजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का कार्य भी किया गया। सभी जज खुले तौर पर आमजन के सामने थे जिसके गंभीर परिणाम हो सकते थे।

इस कृत्य के लिए जिला अदालत के जजों और हरी झंडी दिखाकर नियम विरुद्ध कार्य में सहयोग करने वाले हाईकोर्ट जज राजेश चौहान के खिलाफ जांच और कार्यवाही करने की जरूरत है। साथ ही जरूरत है राजनैतिक अभियानों, कार्यक्रमों हिस्सा बनने से बचने की।
बहराल न्यायपालिका देश में हित में कोई कार्य करे और जनता को संदेश दे, इसमें किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए। लेकिन न्यायपालिका और न्यायिक अधिकारियों को न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत का ध्यान रखकर पारदर्शिता को प्रदर्शित करने पर कार्य करना चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को इसके लिए प्रशासनिक आदेश जारी करने में सक्रियता दिखनी चाहिए। न्यायपालिका को जरूरत है कि सरकार और राजनीतिक दलों के आह्वान पर शुरू और खत्म होने वाले अभियान से बच कर गरिमापूर्ण व्यवहार जनता के सामने प्रदर्शित करें।

लेखक एनसीआर टुडे समाचार पत्र समुह के संपादक हैं।

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