अर्जुन देशप्रेमी
कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने अब एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या तय करेगा और क्या नहीं? दरअसल यह पहली बार है जब किसी नेता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के जज यह तय नहीं करेंगे कि सच्चा भारतीय कौन है। प्रियंका का ये जवाब सुप्रीम कोर्ट के राहुल के ‘सच्चे भारतीय’ होने पर उठाए सवाल पर आया।
4 अगस्त को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सेना पर की गई टिप्पणी के मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई थी जिसमे राहुल गाँधी ने कहा था कि भारतीय सेना को चीनी सैनिक पीट रहे है। राहुल गाँधी ने भारतीय सैनिकों के शौर्य पर सवाल दागा था और कहा था कि चीन ने भारत के 2000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सच्चा भारतीय ऐसा नहीं कहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा था कि राहुल गाँधी को कैसे पता चला कि चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है। सुप्रीम सुप्रीम कोर्ट यहाँ तक कहा था कि ये बातें संसद में क्यों नहीं कहते। आप विपक्ष के नेता हैं। ये बातें संसद में क्यों नहीं कहते। सोशल मीडिया की क्या जरूरत है? कैसे पता चला कि चीन ने 2000 वर्ग किमी क्षेत्र कब्जा लिया। क्या आप वहां थे। कोई प्रमाण है।
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रूख के बाद लगा था कि देश के नेता कुछ सोचेंगे और अपने बेलगाम बयानों पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे। पर हुआ उल्टा ही दिख रहा है। खासकर कांग्रेस के नेताओं के बयान से। प्रियंका गाँधी की बात करें तो मतलब यह निकलता दिख रहा है कि जब भी सुप्रीम कोर्ट कुछ कहेगा तो क्या प्रियंका गाँधी और कांग्रेस के नेता यह सवाल उठाएंगे कि सुप्रीम कोर्ट यह थोड़े न तय करेगा।
इसमे तो यह भी संभव है कि अगर सुप्रीम कोर्ट कह दे कि राहुल गाँधी ने भ्रष्टाचार किया है, तो प्रियंका गाँधी और कांग्रेस के नेता क्या यह कहेंगे कि यह सुप्रीम कोर्ट कौन होता है तय करने वाला कि भ्रष्ट कौन है? क्या कोई यह गारंटी ले सकता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट यह कह दे कि राहुल गाँधी ने दोहरी नागरिकता ले रखी है, तो यही प्रियंका गाँधी और कांग्रेस यह नहीं कहने लगेगी कि सुप्रीम कोर्ट के जज कौन होते हैं यह तय करने वाले कि राहुल के पास दोहरी नागरिकता है।
निहितार्थ तो यह निकलता दिख रहा है कि राहुल गाँधी या गाँधी परिवार के खिलाफ कोई भी टिप्पणी या निर्णय पर कांग्रेस ऐसे ही प्रतिक्रिया देगी। चुनाव आयोग के मसले पर हो या संसद में गतिरोध पर या किसी भी मुद्दे पर गलतबयानी करने के मामले पर, फिर तो राहुल गाँधी कोर्ट और संविधान से ऊपर माने जा रहे हैं। क्या यह स्थिति देश के सच्चे लोकतंत्र के लिए घातक नहीं होने जा रही है?
अगर यह पहला मामला होता तो इसे नज़रंदाज़ भी किया जा सकता था। कोर्ट, खासकर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी के खिलाफ कई मामलों में नरम रूख अपनाया भी है और नज़रंदाज़ भी किया है। राहुल गाँधी ने बार बार माफ़ी मांगी है और कोर्ट ने उन्हें माफ़ भी किया है, राहत भी दी है। पर वे तो अब झूठ बोलने, सेना पर सवाल उठाने, प्रधानमंत्री को तू-तड़ाक करने, संसदीय परम्पराओं को ताखे पर रखने, संसद में मनमानी करने, आँख मारने, किस करने, आसन की अवमानना करने के अभ्यस्त से हो गए दिखते हैं। राहुल गाँधी ने “चौकीदार चोर है” पर कोर्ट में माफ़ी मांगी।
“सावरकर माफ़ीवीर है” – महाराष्ट्र में जाकर माफ़ी मांगी। “चीनी हमारी सेना को पीट रहे हैं”, इसपर चुप्पी साधकर बेकफुट पर चले गए। “मोदी सरनेम चोर है” – कोर्ट से सज़ा सूना दी गई। राफेल केस में कोर्ट की अवमानना – बिना शर्त माफ़ी मांगी। “चीन ने हमारी ज़मीन ले ली” – सुप्रीम कोर्ट से फटकार: “अगर सच्चे भारतीय हो, तो ऐसा मत कहो”।
देश की अर्थव्यवस्था मर गई है- इसपर कांग्रेस के नेताओं ने ही राहुल को आइना दिखा दिया। चुनाव आयोग के खिलाफ 5 अगस्त को कर्नाटक में एटम बम फोड़ने वाले थे, पर कुछ नहीं हुआ और चुप्पी साध ली। यानी हर बयान का अंत एक ही होता है – माफ़ी या कोर्ट से फटकार या चुप्पी या यू टर्न। उनका फार्मूला हो गया है कि बोलो कुछ भी, पकड़े जाओ तो माफ़ी मांगो। जिम्मेदारी नाम की तो कोई बात ही नहीं। इतने मुकदमे झेल रहे हैं जितनी शायद ही किसी नेता विपक्ष ने कभी झेली हो।
मै गलत हो सकता हूँ। पर जिस तरह से नेता प्रतिपक्ष लम्बे समय से कर रहे हैं, उससे आभास होता है कि राहुल गांधी को ना अपने देश से कोई प्यार है, ना वह अपने आप को और अपने परिवार को भारतीय समझता है। वह तो यह समझता है कि अंग्रेज उन्हें और उनके खानदान को देश चलाने के लिए लाइसेंस दे गए थे और देश की सत्ता पर सिर्फ और सिर्फ उनके परिवार का हक़ है। उनकी मर्जी वे जो बोले, उनको कोई कुछ न बोले, चाहे सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न हो।
उनका एक और सिगुफा आया है कि चुनाव आयोग मर चुका है। जहाँ चुनाव जीत जाते हैं, वहां सब ठीक। वहां चुनाव आयोग सही होता है, पर जहाँ चुनाव हार जाते हैं, या हार दिख रही होती है, वहां चुनाव आयोग के खिलाफ बेहद निचले स्तर के शब्दों के साथ पेश आते हैं। और वह ऐसा तब करते हैं जब उनको पता है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है।
यह वही चुनाव आयोग है जिसके चुनाव आयुक्तों को कांग्रेस ही नियुक्त करती थी। तब तो कांग्रेस के राज में मतदाता सूची में मृत आत्माएँ वोट डालती थीं। तब बैलेट बॉक्स गायब करवाए जाते थे और गाड़ियों में भर-भर के लाए जाते थे। बाहुबली गुंडों का राज होता था, बूथ कैप्चरिंग कांग्रेस का प्रिय खेल हुआ करता था। वोट देने वालों को डराया धमकाया जाता था। तब इन्हे चुनाव आयोग “अच्छा” लगता था।
तब सब ठीक था, अब सब गलत है और चुनाव आयोग मर गया है। अब ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के किसी मामले में राहुल के खिलाफ कुछ कह दे तो क्या जरूरी नहीं कि कांग्रेस और प्रियंका गाँधी यह कहने लगें कि सुप्रीम कोर्ट कौन होता है तय करने वाला कि राहुल गलत हैं और चुनाव आयोग सही? बेहतर हो कांग्रेस और इसके नेता हर बात में राहुल गाँधी के बचाव में उतरने की जगह उनको सही राह दिखाने की कोशिश करें। या पहले यही तय कर लें कि सुप्रीम कोर्ट क्या तय करेगा और क्या नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)