जातिगत जनगणना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मुद्दा भी है। यह चुनावी गणित और सत्ता संतुलन को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि केंद्र की सरकारें वर्षों से इसे टालती रही हैं। अगर जातिगत आंकड़े सामने आ जाए और यह साबित हो जाएगा कि ओबीसी वर्ग की आबादी 50 फीसदी से कहीं अधिक है, तो यह मांग उठेगी कि आरक्षण भी उस अनुपात में बढ़ाया जाए। इससे संविधान में तय 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा (इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार, 1992) को चुनौती दी जा सकती है। यह राजनीतिक दलों, खासकर सत्तारूढ़ दलों के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। बीजेपी जैसी पार्टी, जो एक ओर तो ओबीसी नेतृत्व को उभारने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर उच्च जातियों के पारंपरिक वोट बैंक को भी बनाए रखना चाहती है। ऐसे में जातिगत जनगणना उनके लिए डबल एज्ड स्वॉर्ड बन जाती है।
बिहार का उदाहरण: एक साहसी कदम
2023 में बिहार सरकार ने एक साहसी निर्णय लेकर जातिगत सर्वेक्षण कराया। इसमें यह सामने आया कि ओबीसी और ईबीसी की संयुक्त आबादी 63 फीसदी से अधिक है। यह आंकड़ा सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिहार के इस कदम ने यह दिखा दिया कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो जातिगत गणना संभव है। साथ ही इसने अन्य राज्यों और केंद्र सरकार पर नैतिक दबाव भी बनाया कि वे भी यह पहल करें। इस सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ कि ओबीसी और ईबीसी वर्गों के भीतर भी भारी विषमता है। कुछ जातियाँ बार-बार प्रतिनिधित्व पा रही हैं, जबकि कई अभी भी उपेक्षित हैं। यह सामाजिक न्याय के भीतर न्याय की मांग को जन्म देता है।
जातिवाद बनाम जाति चेतना
जातिगत जनगणना का विरोध करने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि इससे समाज में जातिवाद बढ़ेगा। लेकिन यह सत्य नहीं है। जातिवाद तब तक रहेगा जब तक सामाजिक असमानताएं रहेंगी। जातिगत आंकड़ों को सामने लाना इन असमानताओं से लड़ने का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका है। जातिगत जनगणना जातिवाद को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि उसे तर्क, आंकड़ों और योजनाओं के माध्यम से चुनौती देती है। यह एक उत्तरदायी और जागरूक लोकतंत्र की निशानी है कि वह अपने भीतर की असमानताओं को न केवल देखे, बल्कि उन्हें स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम भी उठाए।
नीति निर्माण, बजट और योजनाओं में भूमिका
सरकार जब भी कोई योजना बनाती है, तो उसका लाभ किन्हें मिलेगा, यह आंकड़ों के आधार पर तय किया जाता है। लेकिन जब जातिगत आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं, तो यह कैसे सुनिश्चित होगा कि योजनाएं वंचितों तक पहुँच रही हैं?
जातिगत जनगणना से:
1) योजनाओं का लक्षित क्रियान्वयन संभव होगा,
2) बजट आवंटन अधिक न्यायपूर्ण होगा,
3) आरक्षण की समीक्षा और पुनर्संरचना के लिए मजबूत आधार मिलेगा,
4) और सामाजिक समरसता के लिए ठोस रणनीति बन सकेगी।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की अलग स्थिति
अक्सर कहा जाता है कि दुनिया के किसी लोकतंत्र में जाति आधारित जनगणना नहीं होती, तो भारत में क्यों हो? लेकिन भारत की सामाजिक संरचना अद्वितीय है। पश्चिमी समाजों में जातिगत भेदभाव जैसी जटिलताएँ नहीं हैं। वहाँ नस्लीय या क्षेत्रीय आधार पर गणनाएँ होती हैं। भारत में जाति जन्म से जुड़ी सामाजिक स्थिति को परिभाषित करती है। यहाँ तक कि विवाह, पेशा, शिक्षा, और राजनीतिक पहुँच भी जाति से जुड़े हैं। इस वास्तविकता को नकारना आत्मवंचना है।

समावेशी विकास की कसौटी
‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘सबका विश्वास’ तभी संभव है जब हम जानें कि कौन अब तक विकास की मुख्यधारा से बाहर रहा है।
जातिगत जनगणना से:
1) नीति निर्माण अधिक समावेशी होगा,
2) योजनाएं धरातल पर प्रभावशाली ढंग से उतरेंगी,
3) और लोकतंत्र में सहभागिता का स्तर बढ़ेगा।
जातिगत जनगणना केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, भागीदारी और अवसरों की समानता का आधार है।
ऐसे में जातिगत जनगणना को लेकर जो भ्रम और भय फैलाए जाते हैं, वे वास्तव में सत्ता के भीतर छिपी असहजता को दिखाते हैं। यदि भारत को वाकई में सामाजिक न्याय पर आधारित समावेशी लोकतंत्र बनाना है, तो उसे अपनी सच्चाइयों से डरना नहीं, उन्हें स्वीकार करना होगा। जातिगत जनगणना कोई चमत्कार नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में एक तार्किक और आवश्यक कदम है। यह इस देश के करोड़ों नागरिकों को यह विश्वास दिलाने का माध्यम बन सकती है कि उनकी गिनती भी लोकतंत्र में मायने रखती है। सवाल यह नहीं है कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि अब तक क्यों नहीं हुई? और अब समय आ गया है कि भारत अपने भीतर झांके, खुद को गिने, और सबको गिन कर ही सबको साथ लेकर चले, क्योंकि भारत जैसे विविधता से भरे देश में, जहां जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अवसरों, संसाधनों और सत्ता तक पहुंच की कुंजी बन चुकी है, वहां जातिगत जनगणना सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की बुनियाद है।

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