भ्रष्टाचार पर प्रश्न
राजेश बैरागी
मुझे लगता है कि उस पत्रकार का यह सवाल ही अप्रासंगिक था। उसने नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ लोकेश एम से पूछा,- प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? अवसर था नोएडा प्राधिकरण की पचासवीं वर्षगांठ पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन का जिसमें अधिकारियों ने पहले भविष्य की जनहितकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी और फिर पत्रकारों से प्रश्न आमंत्रित किए। वह पत्रकार एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र का प्रतिनिधि है। उसने अपने प्रश्न में यह तो घोषित कर दिया कि प्राधिकरण में भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसपर तपाक से उत्तर देते हुए मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने भ्रष्टाचार के आरोप को नकार दिया। उन्होंने कहा,-जो भी मामले खुल रहे हैं, वो सब पुराने हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि वह (पत्रकार) देखना चाहे तो दिखा भी देंगे। मुझे यह समझ नहीं आया कि ऐसे कैसे दिखाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार नहीं है। यह या तो पूर्व तैयारी से हो सकता है या भाग्य से। प्राधिकरणों में भ्रष्टाचार एक अनिवार्य तत्व के तौर पर विद्यमान रहता है। अमूमन सभी कार्य कराने के लिए लोगों को सिफारिश या मध्यस्थ तलाशना पड़ता है। उच्च अधिकारियों से शिकायत करने पर काम बिगड़ने का खतरा रहता है। लोग गलत काम भी कराने आते हैं और उन्हें भी निराशा हाथ नहीं लगती है। ऐसे अनेक मामले प्राधिकरणों में लंबित पाए जाते हैं जिनमें आवंटी की कोई ग़लती नहीं होती है परंतु उसे कोई राहत भी नहीं मिलती।हाल ही में एक औद्योगिक विकास प्राधिकरण का मामला सामने आया जिसमें आवंटी को उसके आवेदन से तीन गुना भूखंड आवंटित कर दिया गया है जिसे वह लेने में समर्थ नहीं है। वर्षों हो गए।वह प्राधिकरण से लेकर न्यायालय तक धक्के खा रहा है। क्या यह भ्रष्टाचार का मामला नहीं है?क्या इस मामले में प्राधिकरण और उसका कोई अधिकारी भी परेशान हो रहा होगा? यह प्रश्न ही बेमानी है। केवल न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत रूप से तलब कर लेने अथवा किसी उच्च राजनीतिक दबाव में निलंबित होने के अलावा कभी कोई सरकारी अधिकारी परेशान नहीं देखा जाता है। नोएडा प्राधिकरण में हाल ही में कई अधिकारी कर्मचारियों को निलंबित किया गया है या उन्हें प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई है। एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के 16 हजार रुपए के चिकित्सा बिल को 116000/- भुगतान करने का मामला तो पिछले सप्ताह का ही है। ऐसे न जाने कितने बिल प्रतिदिन पास होते हैं। उनमें से जो किसी कारण पकड़ा जाता है, उसकी चर्चा सुनने को मिलती है। मुख्य कार्यपालक अधिकारी का भ्रष्टाचार न होने का दावा सही नहीं है परंतु पत्रकार का भ्रष्टाचार होने का दावा भी उचित नहीं है क्योंकि भ्रष्टाचार आत्मा के जैसा हो गया है।उसे अनुभव किया जाता है, उसके साथ जिया जा रहा है परंतु उसे साधारण हाथों से पकड़ पाना संभव नहीं है। यदि पत्रकार के पास कोई ठोस जानकारी है तो उसे प्रश्न नहीं करना चाहिए बल्कि अपने समाचार पत्र में समाचार प्रकाशित कर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिए।
सभार (नेक दृष्टि)

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