अर्जुन देशप्रेमी
देश में सरकारें इतनी तरह की सरकारी सहायता नकद राशि लाभ और सब्सिडी दे रहीं हैं कि एक नाकारा और कामचोर व्यक्ति न सिर्फ मजे से जी रहा है, वरन दर्जनभर या उससे भी ज्यादा औलादें पैदा कर देश पर अनावश्यक बोझ डाल रहा है।
इस तरह से दी जा रही सरकारी सहायता और सब्सिडियां कामचोरों की लम्बी चौड़ी फ़ौज भी तैयार कर रही है जो न सिर्फ देश की जीडीपी के लिए खतरनाक है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी आने वाले समय में चौपट कर सकती है। देश में बच्चे के पैदा होने से पहले से ही मुफ्त की योजनाओं का लाभ उसे दिया जाता है। साथ ही उसे पैदा करने वाले उसके माँ और पिता को भी सरकार मुफ्त में नकद राशि से लेकर तमाम सहायतायें (फ्री बीज) दे रही हैं।
कोरोना काल में सरकार ने मुफ्त का अनाज, तेल, नमक और न जाने क्या क्या देश की 80 करोड़ जनता को देना आरम्भ किया।
पर कोरोना समाप्त हुए वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे समाप्त नहीं किया। यह अनवरत जारी है।
अब जब सरकार फ्री में अनाज दे रही है तो एक बड़ा तबका पहले की तुलना में कम काम करने का आदी हो गया है। सीधे कहें तो कामचोर होता जा रहा है। रही सही कसर मनरेगा जैसी योजनायें पूरी कर दे रही हैं जिसमे मिलीभगत से घोटाले के माध्यम से लगभग नाममात्र का काम करके उसे धन प्राप्त हो रहा है।
सो पूरा मन लगाकर पूरी सिद्दत से काम कौन करे। सो यहाँ भी कामचोरी की प्रवृति तैयार होती है। परिणाम यह है की अनेक जिलों में लोगों को कामगार नहीं मिल रहे हैं। जो मिल रहे हैं, वे पोर्री उत्पादकता नहीं दे रहे हैं।
देश का हाल यह है कि एक बड़ी आबादी जब लोग बच्चे पैदा करती है तो गर्भधारण के समय से ही जननी योजना के तहत इन्हें पैसे मिलते हैं जो कई कई किस्तों में और कई राज्यों में एकमुश्त मिलते हैं। बच्चे पैदा करने के लिए सरकारी अस्पतालों में फ्री में सारी सुविधा और इलाज़ मिलती है। ऐसे में आबादी का एक बड़ा तबका यह सोचता है कि क्या दिक्कत है जितने बच्चे पैदा कर लो।
कई कई के तो 14 या इससे भी ज्यादा बच्चे हैं। ये बच्चे जैसे ही सरकारी स्कूलों में दाखिल होते हैं, वैसे ही इन्हें कोपी, किताब, ड्रेस तो फ्री में मिलने ही लगते हैं, मिड डे मिल के तहत खाना भी फ्री में मिलने लगता है। जिस दिन स्कूल नहीं जाते उस दिन इनके माँ बाप इनको दूसरे कामों में लगा देते हैं और कमाई का एक जरिया बना लेते हैं।
मुफ्त में इनके परिवार को रसोई गैस सिलिंडर मिलती है, मुफ्त में मकान मिलता है, मुफ्त में शौचालय मिलता है, मुफ्त में घर घर नल का जल योजना के तहत फ्री में पानी मिलता है और चोरी या कटिया के तहत फ्री में बिजली मिलती है।
फ्री मे राशन का जिक्र तो मै कर ही चूका हूँ। बच्चे जैसे जैसे ऊँची कक्षाओं में जाते है, किसी को लैपटॉप, स्कूटी, साइकिल और न जाने क्या क्या मिलाता है। कई राज्य सरकारें इनको टीवी, फ्रीज़, सोलर जैसी चीजें देती हैं। स्कोलरशिप, वजीफे तो हैं ही, फीस का कोई झंझट ही नहीं है।
कई राज्यों में तो इनको कोचिंग भी फ्री में उपलब्ध कराई जाति है। ऐसे में न बच्चे पैदा करने में समस्या है, न ही इनको पढ़ाने-लिखाने की या उनको पालने पोसने की।
न तो उनके इलाज़ की टेंशन है न दावा दारू की। दारू इसलिए लिख दी कि दिल्ली में तो एक पर एक फ्री तक मिलने लगी थी। लड़कियों औए महिलाओं को आनी जाने के लिए तो बसें फ्री हैं ही। यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं और लड़कियों को तो हर महीने 3000 रुओअये तक का महीना भी मिल रहा है।
अब दूसरे राउंड में अगर इनके घर में कोई विधवा है तो उसे विधवा पेंशन मिलता है। घर में कोई बुज़ुर्ग है तो वृद्धावस्था पेंशन मिलती है।
इस तरह की पेंशन बड़ी संख्ह्या में वो लोग भी लेते हैं जिनके बच्चे या बड़े काफी मालदार होते हैं या पैसे वाले होते हैं या उनका ठीक ठाक कारोबार होता है या अच्छी खासी नौकरी होती है।
सरकारी जमीनों पर फ्री में कब्ज़ा कराकर इनको झुग्गी झोपडी से लेकर चार चार मंजिल मकान बनाने तक की छूट मिल जाती है जहाँ इनको न तो प्रॉपर्टी टैक्स देना होता है, न पानी का बिल या बिजली का बिल।
और गरीब के नाम पर लोग इनकी वकालत करने लगते है। सो चिंता किस बात की। क्यों कोई जापानियों, अमेरिकियों, जर्मनों या दूसरे देशों के लोगों की तरह मेहनत करे। सब कुछ तो सरकार कर ही रही है।
और यह सब दिया जा रहा है देश में 80 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को जो आबादी का लगभग 60 प्रतिशत होते हैं।
ऐसे में आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि देश किस कदर कामचोरी की तरफ देश की बड़ी आबादी को धकेला जा रहा है जिसका कितना भयावह परिणाम आनेवाले दशकों में आ सकता है। यह कटाई देशहित में नहीं हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)