रवि अरोड़ा
अहमदाबाद में हुई भीषण विमान दुर्घटना से ही अभी देश उभरा नहीं था कि रविवार को केदारनाथ यात्रा से श्रद्धालुओं को लेकर लौट रहा एक हेलीकॉप्टर भी हादसे का शिकार हो गया। इस हादसे में कोई भाग्यशाली नहीं रहा और उसमें चालक समेत सभी सात सवार मौके पर ही मारे गए । बोइंग ड्रीम लाइनर जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने को लेकर तो खैर माना जा सकता है कि हादसे के कारण अभी स्पष्ट नहीं हैं मगर हेलीकॉप्टर दुर्घटना में तो साफ दिख रहा है कि हवाई सेवा दे रही कंपनी आर्यन एविएशन की घोर लापरवाही के चलते ही सात लोगों की जान गई । नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी डीजीसीए के स्पष्ट निर्देश हैं कि हेलीकॉप्टर में किसी भी सूरत चार से अधिक यात्रियों को नहीं बैठाया जाए मगर जो हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हुआ उसमें छह यात्री सवार थे । यह भी जानकारी सामने आ रही है कि खराब मौसम के बावजूद हेलीकॉप्टर ने उड़ान की इजाज़त हासिल कर की थी । चार धाम यात्रा में इस साल यह पहली नहीं वरन् पांचवीं हवाई दुर्घटना है और इनमें अब तक 13 लोग मारे जा चुके हैं। चार धाम यात्रा में लगभग हर साल हेलीकॉप्टर दुर्घटना ग्रस्त होते हैं और विगत 14 वर्षों में 13 हेलीकॉप्टर जमीदोज हो चुके हैं और उनमें सवार 41 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
समाज में धार्मिक यात्राओं का क्रेज जैसे जैसे बढ़ रहा है उत्तराखंड में चार धाम यात्रा की भी पौ बारह है। लगभग हर साल 20 से 25 फीसदी यात्री बढ़ रहे हैं और डेढ़ माह पहले शुरू हुई इस साल की यात्रा में भी अब तक 28 लाख लोग बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री मंदिर के दर्शन कर चुके हैं। बेशक इसमें सरकार द्वारा बनवाई गई बारहमासी सड़कों और प्रचार प्रसार का भी योगदान है मगर मूल कारण समाज में आया परिवर्तन ही है। नतीजा लोगबाग मसूरी, नैनीताल और शिमला जैसा ही चार धाम यात्रा को मान कर घरों से बिना तैयारी के निकल रहे हैं और आए दिन प्राण गंवा रहे हैं। इस साल भी अब तक मात्र 46 दिनों में 118 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। किसी की हृदय गति रुकने से जान गई तो कोई ऊंचाई पर सांस की तकलीफ नहीं झेल सका । रही सही कसर अब ये हेलिकॉप्टर पूरा कर रहे हैं। चार धाम के लिए सरकार ने नौ कंपनियों को हवाई सेवा की अनुमति दी हुई है और ये कम्पनियां अधिक से अधिक कमाई के लालच में शहरों की ऑटो रिक्शा जैसी ही अपनी सेवाएं संचालित कर रही हैं। इस बार भी जब तक महानिदेशालय को होश आया तब तक इन कम्पनियों ने अपने हेलीकॉप्टरों से एक एक घंटे में 25 – 25 फेरे लगाने शुरू कर दिए थे और जब एक के बाद एक हादसे हुए तब जाकर महानिदेशालय ने हवाई फेरों में 35 फीसदी कटौती का फरमान जारी किया । मगर यात्रियों की निर्धारित संख्या और खराब मौसम में भी हेलीकॉप्टर उड़ाए जाने पर महानिदेशालय ने भी कोई कार्रवाई नहीं की । रविवार की दुर्घटना के बाद बेशक अब सभी उड़ानें रद्द कर दी गई हैं मगर एविएशन कम्पनियों की ऊंची पहुंच के चलते ऐसा कब तक रहेगा, कहा नहीं जा सकता।
दुनिया भर के तमाम सर्वे चुगली करते हैं कि हेलीकॉप्टर से ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर जाना सड़क मार्ग से यात्रा करने के मुकाबले पांच गुना अधिक असुरक्षित है। चार धाम यात्रा के दौरान हुई मौतों पर ही नजर डाल लें तो साफ नजर आता है कि इस वर्ष भी अभी तक केवल दो यात्रियों की सड़क दुर्घटना में मौत हुई है जबकि हवाई यात्रा में इससे कई गुना अधिक लोगों ने प्राण गंवाए हैं । मगर न जाने क्या कारण है कि राज्य सरकार दिन प्रतिदिन हवाई सेवा को ही अधिक प्रचारित कर रही है। यह ठीक है कि चार धाम यात्रा से और उसमें भी हेलीकॉप्टर सेवा से राज्य सरकार को अच्छी खासी कमाई हो रही है और इस साल भी वह अब 28 सौ करोड़ रुपए का राजस्व तीर्थ यात्रियों से वसूल कर चुका है। मगर यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा ? सरकार द्वारा यात्रियों के स्वास्थ्य के मद्देनजर न ही अभी तक अस्थाई अस्पतालों का निर्माण किया गया है और न ही यात्रा के मार्ग पर ऑक्सीजन बूथ बनाए गए हैं। राज्य में मोबाइल मेडिकल टीम का भी बेहद अभाव है मगर सरकार है कि अभी भी देशवासियों का विज्ञापनों के माध्यम से रोज आह्वान कर उन्हें चार धाम यात्रा पर आने के लिए प्रेरित किए जा रही है। कोई नेता, कोई अधिकारी नहीं सोच रहा कि ये पहाड़ आखिर कितना बोझ झेल सकते हैं, बढ़ती भीड़ से वहां का पर्यावरण कितना प्रभावित हो रहा है अथवा इससे राज्य सरकार की विश्वसनीयता कितनी खतरे में पड़ रही है ? हर कोई अपने कार्यकाल में श्रद्धालुओं की संख्या का आंकड़ा बढ़ाने पर ही तुला है। अब इन नेताओं और अधिकारियों को ही अकेले क्या दोष दें, हाल ही में प्रयागराज में संपन्न हुए कुंभ ने यह मानक तय तो कर ही दिया है कि इतिहास में मृतकों की नहीं केवल श्रद्धालुओं की संख्या गिनी जाएगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।

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