अर्जुन देशप्रेमी
देश में आयकर को लेकर अक्सर बातें होती रहती हैं। कोई करों की दरों को लेकर सवाल उठाता है तो कोई कर चोरी को लेकर, तो कोई लोगों में इसके प्रति उदासीनता को लेकर। देश की कुल आवादी 146 करोड़ है, पर मात्र 9.19 करोड़ लोग ही आयकर रिटर्न फाइल करते हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इनकम टैक्स रिटर्न की संख्या 8.52 करोड़ थी. 2023 में यह संख्या 7.78 करोड़ थी। देश में सरकारी नौकरी करने वालों की संख्या लगभग 3 करोड़ है जबकि निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या लगभग 6 करोड़ है। कहने का मतलब है कि इनकी ही संख्या 9 करोड़ है। गोलाबल डाटा के अनुसार अपना रोजगार करने वाले लोगों की संख्या लगभग 35 करोड़ है। ऐसे देश में कामकाजी नजरिये से लगभग 100 करोड़ से जयादा लोग काम करने वाले हैं। इस नजरिये से देखा जाये तो जितने लोग काम कर रहे हैं या यूं कहें कि वे आय अर्जित कर रहे हैं, उनमें से 10 प्रतिषत से भी कम लोग ही आयकर रिटर्न फाइल कर रहे हैं।आखिर ऐसा क्यों?
इसी तरह आये दिन आयकर चोरी की घटनाएं सामने आती हैं। बार-बार कहा जाता है कि लोग पूरा टैक्स नहीं जमा करते हैं। येन केन प्रकारेन टैक्स बचाने, या यूं कहें की सरकार को टैक्स न देना पड़े, के लिए जुगाड़ लगाते रहते हैं। कोई नकद लेन-देन के माध्यम से टैक्स न देने की तरकीब जुटाता है, तो कोई अपनी आय छुपाकर। कोई गलत-सलत बिल-भाउचर बनवाकर जुगाड़ लगाता है, तो कोई अपने सीए से जुगाड़  लगवाकर. कोई राजनीतिक दलों को चंदे देकर जुगाड़ भिड़ाता है, तो कोई एनजीओ और ट्रस्ट को चंदा देकर। इसके लिए लोग ठीक ठाक खर्चे भी करते हैं। पर वे चाहते हैं कि सरकार को या तो टैक्स न देना पड़े या फिर कम-से-कम देना पड़े।

एक बार फिर सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों?

इसको समझने के लिए बार-बार सामने आने वाली घटनाओं पर विचार करना होगा. जैसे बंगलोर में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का 50 लाख रुपए सालाना पैकेज था। जाहिर है, योग्यता थी, तभी उसे इतनी सैलरी वाली नौकरी मिली थी. इस लिहाज से उसने पिछले 5 साल में उसने सरकार को लगभग 40 लाख रुपए इनकम टैक्स दिया। वह भी बेहद इमानदारी से। चूँकि वह नौकरीपेशा था, सो उसके टैक्स चोरी या कम टैक्स देने का उसके पास कोई जुगाड़ भी नहीं था। कंपनी ही टैक्स काट लेती थी। पर एक दिन अचानक छटनी के कारण उसकी नौकरी चली गई। अचानक से उसकी आमदनी जीरो हो गयी। पर किराया देना ही था।  घर के खर्चे रूक नहीं सकते थे। ऐसे में कुछ दिन उसका गुजारा उस पैसे से चला जो उसने नौकरी के दौरान बचत किया था। पर उसके बाद क्या? जल्दी दूसरी नौकरी नहीं मिली, नौकरी न होने के कारण लोन नहीं मिला, जो लोन देने की बात करता था, वह उच्च ब्याज दर मांगता था। सो वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसे में जब कोई उपाय नहीं सुझा तो तो वह डिप्रेशन में चला गया। उसका तो जीवन ही लगभग चौपट हो गया। उसे बार बार लगता था कि अगर उसने सरकार को इतना टैक्स न देकर अगर 36 लाख रुपये बचाए होते तो कितना काम आता। यही बात दूसरे सेक्टर्स मकाम करने वालों, र्प्जगार करने वालों, रोजगार देने वालों, कम्पनीज चलने वालों पर भी लागू होती है।
और इसी सोच के कारण देश के ज्यादातर लोग टैक्स देने से बचते हैं। उनको लगता है कि यह फालतू में दे रहे हैं। इससे उनको कोई लाभ तो मिलने से रहा. इसी सोच के कारण देश में टैक्स चोरी को ज्यादा बढ़ावा मिलता है जिसके कारण लोग टैक्स रिटर्न फाइल नहीं करते या टैक्स बचाने, चुराने की सोचते हैं। यानि टैक्स देने के प्रति उनको प्रोत्साहन नहीं मिलता। अगर अमेरिका की बात करें तो अमेरिका में टैक्स पेयर्स को सामाजिक सुरक्षा (सोशल सिक्योरिटी) मिलती है। नौकरी जाने पर सरकार उसे दूसरी नौकरी ना मिलने तक पेंशन देती है। कई दूसरे देशों में भी उनको कई तरह की सामाजिक सुरक्षा मिलती है, जैसे बेरोजगारी भत्ता मिलता है, स्वस्थ्य सुविधा मिलती है।
पर भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ उल्टा है। यहां इनकम टैक्स न देने वालों को सरकार मुफ्त बिजली, पानी, बस यात्रा, लाडली बहन जैसी कई योजनाओं समेत मुफ्त राशन बांट रही है, सब्सिडी दे रही है। लेकिन जिसने सरकार को टैक्स दिया है, उसके लिए कुछ नहीं है। जब उसका अच्छा समय चल रहा होता है तो उनसे भारी -भरकम टैक्स ले लिया जाता है, पर जब उनका बुरा समय आता है तो भगवन भरोसे छोड़ दिया जाता है। ऐसे में कोई टैक्स देने के प्रति कैसे प्रोत्साहित होगा?
आज जरूरत इस बात की है कि इसपर विचार किया जाये। सरकार इतना तो कर ही सकती है कि जो जितना टैक्स दे, जरूरत के समय उसे कम से कम कुल दिए गए टैक्स का 20 प्रतिशत तो उसे किस्तों में प्रति माह एक साल के भीतर दिया जाये। अगर सरकार यह नहीं कर सकती तो जीतनी रकम उसने टैक्स में दी है, उस रकम पर हर माह जो ब्याज बनता है, उतनी रकम तो उसे एक से दो साल तक दिया जाये। उसे बेरोजगारी भत्ता, या आवश्यक भरण पोषण भत्ता उसके जमा टैक्स के अनुपात में कुछ समय तक दिया जाये। आखिर कोई तो ऐसा लोभ हो जिससे करदाता कर देने पर अपने को सुरक्षित महसूस करे। जब आप कोई कर न देने वालों को घर, गैस, शौचालय, फ्री में राशन, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, फ्री में बस सुविधा, बच्चे पैदा करने के दौरान एकमुश्त धनराशि, उनके बच्चो को ड्रेस, साइकिल, भोजन, किताब कॉपी, फ्री बिजली, पानी, महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये, किसानों को साल में 6000 रुपये दे सकते हैं तो टैक्स देने वालों को सामाजिक सुरक्षा क्यों नहीं? आखिर उन्हीं के चुकाए पैसों से उनकी मदद क्यों नहीं? इसमे कोई शक नहीं कि सरकार अगर ऐसा करती है, तो निःसंदेह लोग टैक्स देने के प्रति और जागरूक और उत्साहित होंगे जो कर ढांचे को और उक्तिसंगत बनाने में मदद देगा और ज्यादा से ज्यादा लोग कर देने में अपनी हिचक दूर करेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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