अर्जुन देशप्रेमी
विपक्ष के हंगामे के कारण संसद के वर्तमान मॉनसून सत्र के दुसरे दिन भी लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बाधित रही, विपक्ष ने हंगामा जारी रखा। यहाँ तक कि हंगामे की वजह से शून्यकाल भी नहीं हो पाया। वैसे भी कल संसद का मॉनसून सत्र का पहला दिन हंगामे की भेंट चढ़ गया था। कारण, वही सदन में विपक्ष का भारी हंगामा। और यह कोई नई बात नहीं है। यह एक आम परिपाटी सी हो गई है। जब भी संसद का सत्र आरम्भ होता है, संसद का ढेर सारा समय इन्हीं हंगामों में जाया हो जाता है। ऐसा भी देखने में आया है जब पूरा का पूरा सत्र ही धुल जाता है। आगे कोई बहुत जरूरी बिल सरकार को पास कराना होता है तो सरकार इसी हंगामे में बिना बहस के ही बिल पास करा लेती है। 1991 से संसद की कार्यवाही को कवर करने का मौका मिला है और उसमे मैंने यही महसूस किया है कि संसद में हंगामे, शोर शराबे और नारेबाजी की घटनाएं लगातार बढती ही गयी हैं।
चाहे विपक्ष में आज कांग्रेस हो या पूर्व में भारतीय जनता पार्टी या कोई और दल। सबने वही किया जो आज हो रहा है। कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब वह हंगामे के लिए भाजपा को दोष देती थी। आंकड़ों के हिसाब से साबित करती थी कि इन हंगामों के चलते देश का कितना नुकसान हो रहा है। संसद को चलने में प्रति दिन, प्रति मिनट और प्रति सेकण्ड कितना खर्चा आता है और विपक्ष (भाजपा या कोई और दल) देश का कितना नुकसान कर रहे हैं। कांग्रेस नसीहत देती थी कि विपक्ष को हंगामा कर सदन की कार्यवाही बाधित करने की जगह बहस करनी चाहिए। विपक्ष का काम सार्थक बहस करना है। पर आज वही कांग्रेस अपने ही नसीहतों से उलट हंगामे पर उतारू रहती है। पिछले 11 वर्षों के दौरान संसद के ज्यादातर सत्रों में विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने हंगामा ही किया है। विपक्ष के वर्तमान नेता और कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गाँधी स्वयं इसे लीड करते हैं। इसके उलट भाजपा अब वही बातें सत्ता पक्ष के रूप में बोल रही है जो पहले कांग्रेस बोलती थी। यानि भाजपा के सुर भी बदल गए हैं। आज वही आंकडें भाजपा देती है और विपक्ष के खिलाफ गैर संवैधानिक कार्य करने के आरोप लगाती है।
यदि अनुभवों की बात करें तो संकेत यही दिखाते हैं कि आनेवाले समय में भी ऐसा नहीं लगता कि हमारी संसद इससे उबार पायेगी। तो क्या यह सिलसिला अनवरत चलता रहेगा? क्या हमारे चुने हुए नेता संसद में बहस कर अच्छे कानून बनाने की जगह हंगामों में ही लगे रहेंगे? क्या बिना सार्थक और गहन बहस के बिल पास होते रहेंगे?
दरअसल भारत ने जिस संविधान को अंगीकार किया है, उसमे संसद को देश के लिए कानून बनाने का काम सौंपा गया है। इसका एक काम विभिन्न संस्थाओं पर नियंत्रण रखना भी है जिससे कोई निरंकुश न हो जाये। अच्छे कानून बनाने के लिए जरूरी है कि सांसद गहन अध्ययन कर विषय के अनुरूप बहस करें, सरकार की कमियों को जनता के समक्ष उजागर करें, कानूनों में उचित बदलाव के लिए सरकार को अपने तर्कों से बाध्य करें। सत्ता पक्ष का भी काम है कि वह विपक्ष की सुने और तार्किक रूप से जो ठीक हो उसे अपने बिल में शामिल करे। विपक्ष के सवालों का जवाब दे। पर ऐसा हो नहीं रहा है। सरकारें अपने हिसाब से कानून बना रही हैं। जैसा मैंने ऊपर लिखा, अनेक बार बिना बहस के कानून पास हो रहे हैं। विपक्ष सार्थक बहस की जगह इसे राजनीतिक चश्मे से देखकर बहस करता है। सत्तापक्ष और विपक्ष उसमें भी अपना वोट बैंक देखता है और उसी के अनुरूप अपनी बातें रखता है। दोनों ही “अपनी अपनी ढपली, अपना अपना अपना राग” का अनुसरण करते हैं जो कतई देशहित में नहीं है।
संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक यानी कुल 32 दिन चलेगा। इस दौरान 18 बैठकें होंगी, 15 से ज्यादा बिल पेश होंगे। केंद्र सरकार मानसून सत्र में 8 नए बिल पेश करेगी, जबकि 7 लंबित बिलों पर चर्चा होगी। इनमें मणिपुर, जीएसटी संशोधन बिल 2025, इनकम टैक्स बिल, नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल जैसे विधेयक शामिल हैं। पर इस बात में संदेह ही है कि सबकुछ ठीक ठाक होगा। संकेत तो पहले से ही गड़बड़ दिख रहे हैं। उदाहरण के तौर पर राहुल गाँधी को पता है कि किसी भी विषय पर डिबेट के लिए पहले नोटिस देना होता है। पर राहुल गाँधी चाहते हैं कि जैसे ही वह खड़े हों, उनके इच्छित विषय पर बहस आरम्भ कर दी जाये। आपरेशन सिन्दूर के मसले पर सोमवार को लोकसभा में उन्होंने ऐसा ही किया। राहुल गांधी ने ऑपरेशन सिंदूर पर नोटिस तक नहीं दिया और चारो तरफ शोर मचाने लगे कि उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया जा रहा है। एक तरफ वह कह रहे हैं कि उनको बोलने नहीं दिया जा रहा और दूसरी तरफ उनके सांसद सदन के वेल में भारी हंगामा कर रहे थे। अगर उनको बोलना था तो पहले तो उनको अपने सांसदों को चुप कराना चाहिए था। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मकसद साफ है कि वह दरअसल सदन चलने नहीं देना चाहते थे। ऐसा तब हो रहा था जब सरकार ने साफ कर दिया था कि जिस मुद्दे पर भी विपक्ष चाहेगा, बहस होगी। आपरेशन सिन्दूर के लिए तो लोकसभा अध्यक्ष ने पहले ही समय तय कर दिया था।
ऐसे में अब समय आ गया है कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों अपनी गरिमा को समझें और देशहित में कोई ऐसी युक्ति निकालें जिससे संसद में संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप कार्य हो सके। इसके लिए कुछ सत्ता पक्ष को झुकना होगा तो कुछ विपक्ष को भी। अगर ऐसा नहीं होता है तो संसद की गरिमा लगातार गिरेगी और संभव है एक दिन संसद की बहस और संसद ही बेमानी होकर रह जाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)