अर्जुन देशप्रेमी

सरकार ने संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किया है, जिसमें प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों को गंभीर आपराधिक आरोपों में लगातार 30 दिनों तक गिरफ़्तार और हिरासत में रखने पर पद से हटाने का प्रस्ताव है।
हालाँकि इस विधेयक को समीक्षा के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है। पर इसे लेकर विपक्षी दलों में भारी विरोध देखा जा रहा है। इसपर विपक्ष ने जिस तरह से आपत्तियां दर्ज कराई हैं, उसे नज़रंदाज़ भी नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ सरकार की मंशा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। दोनों ही पक्ष अपने अपने तर्कों में सही दिखते हैं।
पर सवाल जस का तस है कि क्या जेल से सरकार चलाई जा सकती है? अगर हाँ, तो यह कहाँ तक न्यायोचित होगा? और नहीं, तो फिर ऐसा कानून क्यों नहीं आना चाहिए? प्रश्न यह भी है कि क्या पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर कोई बीच का रास्ता निकालेंगे?
दरअसल यह बिल आया ही है एक ऐसी स्थिति से निपटने के लिए जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने शायद नहीं की थी। अगर उन्होंने सपने में भी उस स्थिति की कल्पना की होती तो वे संविधान में इससे निपटने के लिए कोई न कोई व्यवस्था जरूर कर देते। पर अब स्थिति यह है कि तमाम नैतिकताओं को ताखे पर रखकर नेता लोग जेल से सरकार चलाने पर उतारू हो गए हैं।
परिपाटी यह रही है कि जब भी किसी मंत्री या मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री की गिरफ्तारी की स्थिति बनती थी, मंत्री खुद ही इस्तीफा दे देते थे या फिर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने मंत्री से इस्तीफा ले लेते थे या उसे बर्खास्त कर देते थे। जब वे जेल से बाहर आते थे तब दुबारा पद पर आ जाते थे।
इसी तरह मुख्यमंत्री भी ऐसी स्थिति होने पर खुद से इस्तीफ़ा दे देते थे और जेल से बाहर आने पर फिर मुख्यमंत्री बन जाते थे। पर हाल के वर्षों में ऐसा हुआ कि मंत्री और मुख्यमंत्री जेल में महीनों रहे, पर पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया। जेल में रहे और मुख्यमंत्री या मंत्री के तौर पर रहे। इस दौरान राज्यों का भले ही बेडा गर्क क्यों न होता रहा हो।
सबसे बड़ा उदाहरण अरविन्द केजरीवाल का ही है जो 177 दिनों तक जेल में रहे, पर मुख्यमंत्री का पद नहों छोड़ा। अदालतों में लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक गई। पर संविधान और कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जो इन्हें बाध्य करता की वे पद छोड़ते या बर्खास्त कर दिए जाते या फिर सुप्रीम कोर्ट इन्हें पद छोड़ने के लिए कोई आदेश या निर्देश दे पाता। ऐसा ही अरविन्द केजरीवाल के दो मंत्रियों और तमिलनाडु के एक मंत्री के मामले में भी हुआ। थक हारकर कोर्ट को इंगित करना पड़ा कि इस सम्बन्ध में कानून होना चाहिए। और इसी क्रम में केंद्र सरकार विधेयक (बिल) लेकर आयी है जिसपर पूरा विपक्ष हंगामा कर रहा है।
विधेयक के अनुसार, यदि किसी मंत्री को पाँच या अधिक वर्षों की सज़ा वाले अपराध के लिए लगातार 30 दिनों तक गिरफ़्तार और हिरासत में रखा जाता है, तो उसे 31वें दिन पद से हटाना अनिवार्य है। यदि किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को लगातार 30 दिनों तक गिरफ़्तार और हिरासत में रखा जाता है, तो विधेयक के अनुसार उन्हें 31वें दिन तक इस्तीफ़ा देना होगा।
यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो वे स्वतः ही पद से हट जाएँगे। समान परिस्थितियों का सामना करने वाले अन्य केंद्रीय या राज्य मंत्रियों के लिए, विधेयक अलग निष्कासन प्रक्रियाओं को निर्दिष्ट करता है जिसके अनुसार केंद्रीय मंत्रियों को प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाएगा जबकि राज्य के मंत्रियों को राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर हटाएँगे। विधेयक में प्रावधान है कि यदि कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी मंत्री को हटाने की सलाह नहीं देता है, तो 30 दिनों की नज़रबंदी के बाद वह मंत्री स्वतः ही पद से हट जाएगा।
इसी विधेयक का विपक्षी दलों द्वारा विरोध किया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि सत्ता पक्ष जब चाहेगा किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ अपनी एजेंसियों से मुकदमे लदवाकर उसे 30 दिन तक हिरासत में रखवा देगा और जमानत नहीं होने देगा।
ऐसे में निर्दोष होने के बाद भी उस मुख्यमंत्री को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ेगा या उसे हटा दिया जायेगा। एक तरह से यह विरोधियों के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा। इस कानून का दुरुपयोग सत्ता पक्ष करेगा।
विपक्ष के इस दावे में दम भी है, यह हवा हवाई नहीं है। जिस तरह से मुकदमे लादे जा सकते हैं और लादे भी गए हैं, उससे यह आशंका बलवती होती है। पर सवाल है कि सिर्फ इस शंका के कारण जेल से सरकार चलाने की छूट मिलनी चाहिए? और सवाल तो यह भी है कि क्या कांग्रेस या तीसरे मोर्चों की सरकारों के दौरान कोई ऐसा कानून नहीं बना है जिसका दुरुपयोग नहीं हुआ है, या दुरुपयोग नहीं हो रहा है? सच तो यह है कि देश में शायद ही ऐसा कोई कानून बना हो जिसका दुरुपयोग न हुआ हो या न हो रहा हो। एससी/एसटी एक्ट, दहेज निषेध अधिनियम आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इनके दुरुपयोग की गाथाएं हर गली-मोहल्ले में सुनाई देती हैं।
ऐसे ही दूसरे लगभग सभी कानूनों में है। और फिर तो दुरुपयोग के डर से कभी कोई कानून बनना ही नहीं चाहिए। यदि जनता के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग को अगर नज़रंदाज़ किया गया है तो फिर नेताओं के लिए बनने वाले कानून के दुरुपयोग की शंका को नज़रंदाज़ क्यों नहीं किया जा सकता है। और फिर देश में क़ानून का ही राज है।
आपको लगता है कि इस कानून का दुरुपयोग किया गया है तो कोर्ट में अपनी बात रखिये, 30 दिन के भीतर कोर्ट से जमानत या राहत ले लीजिये, बने रहिये पद पर। इस दौरान आपकी पार्टी का कोई दूसरा नेता मंत्री या मुख्यमंत्री बना रहेगा। और कोर्ट यदि जमानत या राहत नहीं देती तो पद छोडिये। इसमे समस्या क्या है? और फिर, यह कानून तो सभी दलों पर लागू होगा।
भाजपा जब विपक्ष में जायेगी तब उनपर भी यही बात लागू होगी। फिर इससे डरना क्यों? जब भाजपा नहीं डर रही है तो विपक्ष क्यों डर रहा है? या विपक्ष मान रहा है कि वह कभी भी केंद्र की सत्ता में आयेगा ही नहीं, आजीवन केंद्र की सत्ता में भाजपा ही रहेगी? या ऐसा कानून बनाने ही नहीं दिया जाये और जेल से सरकार चलाने की इज़ाज़त दे दी जाये?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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