अर्जुन देशप्रेमी
28 अगस्त को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर आर एस) के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तीसरे दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जिस तरह से इस मुद्दे को लेकर बात की है, उसने इस मुद्दे पर फिर से बहस छेड़ दी है। इसपर न सिर्फ विचार करने की जरूरत है, वरन इसपर नियंत्रण के लिए जरूरी उपायों को लेकर आवश्यक कदम उठाने के लिए तत्काल कानून लाने की आवश्यकता भी है। दुखद बात यह है कि देश की बढ़ती आबादी को लेकर मोदी सरकार से जो उम्मीदें थी, उनपर भाजपा की मोदी सरकार पूरी तरह विफल रही है। उसकी जो नीतियाँ पिछले 11 सालों में सामने दिखी हैं, वह देश को विनाश की ओर ही ले जाती दिख रही हैं। संघ की तरफ से भी इस मुद्दे पर जिस तरह से सरकार पर दबाव डालने की जरूरत थी, उसमे संघ भी फेल रहा है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि “हम दो और हमारे तीन” की नीति होनी चाहिए। पर यह बयान देते समय संघ प्रमुख ने अल्पकालिक लाभ ही देखे हैं, न कि दीर्घकालिक। उन्होंने कहा कि दुनिया में सब शास्त्र कहते हैं कि जन्म दर 3 से कम जिनका होता है वो धीरे धीरे लुप्त हो जाते हैं। भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को ये देखना चाहिए कि अपने घर में 3 संतान होने चाहिए। मोहन भागवत ने आगे कहा कि देश का एवरेज 2.1 है। यह गणित में होता है, लेकिन मनुष्यों में 2.1 का मतलब तीन। भागवत जी की सोच तो जनसँख्या का विस्फोट ही करा देगा।
2.1 का मतलब है कि औसत में 2.1 होना चाहिए। मतलब किसी के एक, किसी के 2 किसी के 3 तो किसी के 4 बच्चे हों जिसका औसत 2.1 हो। 145 करोड़ वाली जनसँख्या वाले देश में प्रजनन दर के मामले में 2.1 और 3 में बहुत बड़ा अंतर होता है। सबके 3 हुए तो यह विनाशकारी हो जायेगा। फिर तो जनसँख्या बेतहाशा बढ़ती ही चली जाएगी औए एक दिन ऐसा आएगा जब देश में लोगों के लिए न पर्याप्त जमीन बचेगी, न दूसरे संसाधन।
असल में देखा जाये तो देश में बढ़ती जनसँख्या को लेकर सरकारों ने कभी भी पूरे मन से कदम नहीं उठाये और वोट के लालच में देशहित को ताखे पर रखते रहे। कहने को तो आज़ादी के तुरंत बाद ही इसे एक बड़ी समस्या के रूप में पहचान लिया गया और इसपर नियंत्रण के लिए बातें आरम्भ कर दी गयी। आज़ादी के समय जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी। भारत ने 1952 में ही दुनिया का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाया जिसका मुख्य उद्देश्य परिवारों को दो बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना था। पर आज 73 साल बाद भी हो ये रहा है कि लोग और खासकर एक खास समुदाय के लोग, 10-10 या इससे भी ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे है जिससे 35 करोड़ वाला देश आज 145 करोड़ का देश बन गया है। यह जनसँख्या आज भी लगातार तेज गति से बढ़ ही रही है और कुछ खास लोग, नेता, दल और समुदाय चाहता है कि जनसँख्या नियंत्रण की बात न कि जाये। जिसे जितना मन हो, बच्चे पैदा करने की छूट हो।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने जन्म दर को नियंत्रित करने के लिए आक्रामक कदम उठाने शुरू किये थे। पर इसको जिस तरीके से दमनकारी नीतियों से लागू किया गया, उससे उल्टा असर ही हो गया। फिर दुबारा किसी भी सरकार ने इसपर नियंत्रण के लिए कानून के बारे में सोचना ही छोड़ दिया। नतीजा सामने है कि हम 35 करोड़ से बढ़कर 145 करोड़ हो गए हैं और बढ़ते ही जा रहे हैं। अगले 50 सालों तक तो कम से कम बढ़ते ही रहेंगे, बशर्ते इस बीच कोई ठोस कदम न उठा लिया जाये।
बार बार माना गया कि समग्र आर्थिक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा भारत में जनसंख्या वृद्धि की खतरनाक दर है। बेतहाशा बढ़ी आबादी ने देश में भारी भरकम बेरोजगारी ला दी। आर्थिक कमर टूटने लगी और देश कंगाली की हालत में जाने लगा जिसे रोकने के लिए सरकार को देश का सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़ा। आई एम ऍफ़ की शर्तों के तहत हमें नीतियाँ बनानी पड़ी और रुपये का भारी अवमूल्यन करना पड़ा। पर देश में भारी भरकम आबादी के कारण बेतहाशा बेरोजगारी के कारण यहाँ श्रम सस्ता हो गया, मजदूर सस्ते मिलने लगे जिसके कारण विदेशी कम्पनियाँ यहाँ कारखाने लगाने लगी जिससे लोगों को रोजगार तो मिला, और तरक्की भी दिखी है। अब इसी को लोग अब एक अलग नज़रिए से पेश कर रहे हैं कि यह बड़ी आबादी ही हमारी ताकत है। कुछ खास लोग, नेता, दल और समुदाय के लोग कहने लगे हैं कि इसके बल पर हम किसी को भी झुका सकते हैं। कम बच्चे होंगे तो हमारे यहाँ युवा जनसँख्या कम होगी, तो कम मजदूर होंगे, तो सस्ते मजदूर नहीं मिलेंगे, तो फिर हमारे यहाँ विदशी निवेश के लिये कोई क्यों आएगा? उनका यह भी कहना है कि आज हमारा जी डी पी चीन से भी ज्यादा है, क्योंकि चीन बूढों का देश बनता जा रहा है जबकि हम युवाओं का। वे जापान के बूढों का उदाहरण भी दे रहे हैं। पर वे भूल जा रहे हैं कि आज तो हम युवाओं का देश हैं, पर यही जब बूढ़े होंगे तो हम दुनिया में बूढों की जनसँख्या वाले सबसे बड़े देश होंगे। और तब हम कैसे उनको संभालेंगे? अमेरिका का क्षेत्रफल हमसे 3 गुना ज्यादा है और उनकी आबादी हमसे 4 गुना कम। फिर भी उनको समस्या होती है। ऐसे में सोचकर देखिये कि हमारी हालत क्या होगी।
इसके उलट यदि हम कानून बनाकर या दूसरे तरीके अपनाकर अपनी जनसँख्या वृद्धि को अगले कुछ वर्षों में रोक दें या घटाना आरम्भ कर देते हैं, तो हमारी ज्यादातर समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएँगी। आबादी वृद्धि रूकने या घटने के साथ ही बेरोजगारी की समस्या घटने लगेगी, आयात घटने लगेगा, भोजन, मकान, पानी, ऊर्जा, सड़क, कपड़ा से लेकर ज्यादातर आवश्यक जरूरतों के लिए हमें किसी का मुंह नहीं ताकना होगा। भाजपा और संघ के नज़रिए से देखें तो डेमोग्राफी के बदलाव की समस्या पर भी काबू पाया जा सकेगा। अपनी बढती आबादी रोककर ही तो चीन आज बड़ी शक्ति बना है, न कि आबादी बढ़ाकर। भारत की तुलना में एक चौथाई जनसँख्या के बाद भी तो अमेरिका ही हमसे बेहतर है। हमारी तुलना में मामूली जनसँख्या वाला देश फ़्रांस, इजराइल और रूस हमसे कितना आगे है। ऐसे में जरूरी है कि देश में ऐसे कानून लाये जाएँ जिससे आबादी का बढ़ना रुके या कम होना आरम्भ हो। उम्मीद है कि सरकार इसपर गंभीरता से विचार करेगी। फिलहाल तो सरकार जिस तरीके से इसपर उदासीन है, वह तो विनाशकारी ही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)