अर्जुन देशप्रेमी/लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
जैसे ही सर्दियों का मौसम आता है, राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के मार पड़नी शुरू हो जाती है। हवा जहरीली और जानलेवा हो जाती है। यह उस राजधानी हा हाल है जहाँ देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, से लेकर तमाम आला अधिकारी और निर्णय लेनेवाले विद्वान रहते हैं। इसके बाद भी दशकों से दिल्ली में यह समस्या बनी हुई है।
चीन में भी ऐसी समस्या सामने आयी थी, पर उसने कुछ ही वर्षों में इससे निजात पा ली, जबकि हम अब भी इसे झेल रहे हैं। यह हाल तब है जब संसाधनों की कोई कमी नहीं है। जून से सितंबर तक मानसून के मौसम के दौरान वायु प्रदूषण सबसे कम होता है क्योंकि बार-बार की बारिश प्रदूषण को फैलने या बढ़ने का अवसर नहीं देती है। लेकिन बाकी के महीनों में वायु प्रदूषण की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।सबसे ख़राब वायु गुणवत्ता (एयर क्वालिटी) का अनुभव ठंड के महीने में अक्टूबर से फरवरी के दौरान होता है। इस समस्या का सबसे आम संकेत ख़राब दृश्यता (विज़िबिलिटी), सांस लेने में कठिनाई, बहुत अधिक लोगों को सांस की बीमारी, सतही पानी की क्वालिटी में गिरावट और शहर की गतिविधियों में रुकावट है। वायु प्रदूषण के सबसे ख़राब समय के दौरान मीडिया, राजनीतिक दल और हित समूह हर साल इस मुद्दे पर चर्चा करते हैं, इस पर प्रकाश डालते हैं। समस्या को काबू में करने के लिए उच्चतम न्यायालय, केंद्र सरकार और शहर के प्रशासन ने अलग-अलग ढंग से दखल दिया है और वायु प्रदूषण के स्रोतों पर आधारित कई समाधान लागू किए हैं। पर हाल यह है कि समस्या बढ़ती ही जा रही है। इस विषय में देश का सुप्रीम कोर्ट भी लगातार दखल दे रहा है और इसपर सुनवाई कर रहा है। 21 जनवरी को भी कोर्ट में इस विषय पर सुनवाई हुई जहाँ वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के लिए वाहनों से होने वाला प्रदूषण सबसे अधिक जिम्मेदार है। इसके साथ ही, आयोग ने बिगड़ते वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में सुधार के लिए 15 दीर्घकालिक उपायों की सिफारिश की। सीएक्यूएम ने चरणबद्ध तरीके से कई उपायों को लागू करने की सिफारिश की है जिसमे कहा गया है कि ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को दिल्ली-एनसीआर से समयबद्ध तरीके से चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना चाहिए। साथ ही दिल्ली और एनसीआर में अधिक मार्गों और स्टेशनों के साथ क्षेत्रीय रेल परिवहन और मेट्रो रेल नेटवर्क को विस्तारित करने की जरूरत है। मेट्रो और क्षेत्रीय तीव्र परिवहन प्रणाली को जोड़ने वाले मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट केंद्रों का विकास करना और गंतव्य-आधारित सार्वजनिक परिवहन ट्रैकिंग के साथ रियल टाइम यात्री सूचना प्रणाली के माध्यम से कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने जैसे उपाय करने होंगे। इस समस्या से निबटने के लिए सुझाव दिया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहन नीतियों की समीक्षा और संशोधन करने की जरूरत है। वाहनों की बढ़ती संख्या के अनुरूप, बैटरी की अदला-बदली वाले स्टेशनों सहित इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग केंद्र का तेजी से विस्तार करना भी जरूरी है। दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरी क्षेत्रों, विशेष रूप से नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत में सुचारू और बेहतर यातायात आवागमन के लिए एकीकृत यातायात प्रबंधन प्रणाली को लागू करने पर भी बल दिया गया है।
पर गाड़ियों से निकलने वाला धुआं ही एक मात्र कारण नहीं है। इसके प्पीछे और भी कई कारण हैं। दिल्ली भारत का सबसे सघन आबादी वाला क्षेत्र है और इसकी बड़ी आबादी अलग-अलग गतिविधियों- यात्रा, निर्माण एवं उत्पादन, कृषि, बिजली उत्पादन एवं खपत, सफाई और त्योहारों को मनाने- में लगी हुई हैं। इनमें से कई गतिविधियां पर्यावरण के हिसाब से बहुत ख़राब ढंग से की जाती हैं जिसके नतीजतन धूल पैदा होती है और हवा में प्रदूषण पैदा करने वाले तत्व निकलते हैं।
धान और गेहूं के अवशेषों (पराली) को पड़ोसी राज्यों हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान जलाते हैं। किसानों को जहां ये तरीका खेत में नई फसल बोने के लिए त्वरित और सुविधाजनक लगता है, वहीं ये दिल्ली में वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है।
पिछले अनेक वर्षों के दौरान समस्या यह भी रही की केंद्र और राज्य में अलग अलग पार्टियों की सरकारें रहीं जिन्होंने अपने अपने हिट देखे और दूसरे पर सिर्फ़ दोषारोपण किया, काम किसी ने नहीं किया। पर अब जबकि दोनों ही जगह भाजपा की सरकारें हैं, उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार सरकारें कुछ ठोस और कठोर कदम उठायेंगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाएगा सिवाय आदेश देने के। अगर इस बार भी ऐसा नहीं हुआ तो यह दिल्ली-एनसीआर के करोड़ों लोगों के लिए दुर्भाग्य ही होगा।