सईद अहमद

भारत-अमेरिका के प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर सरकार के दावे और सामने आए मसविदे के बीच गहरे विरोधाभास दिखाई दे रहे हैं। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल यह भरोसा दिला रहे हैं कि भारतीय किसान, पशुपालक, उद्यमी और एमएसएमई पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे, वहीं दूसरी ओर समझौते का जो अंतरिम ढांचा सार्वजनिक हुआ है, वह इन आश्वासनों की पुष्टि नहीं करता।


सरकार का कहना है कि अमेरिका से कृषि उत्पाद भारत में नहीं आएंगे और न ही गेहूं, चावल, मक्का, सोयाबीन या डेयरी उत्पादों के आयात की अनुमति दी जाएगी। लेकिन मसविदे में कहीं भी यह स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि इन संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। उलटे सूची में ऐसे अनेक उत्पाद शामिल हैं-जैसे गेहूं, मक्का, डेयरी, पोल्ट्री, मीट, तिलहन और दलहन-जिन पर अमेरिका किसी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं है। इससे यह आशंका और गहरी होती है कि अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे धीरे-धीरे खोले जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय किसान अमेरिकी किसानों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे? अमेरिका में किसानों को अरबों डॉलर की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत में दी जाने वाली सहायता बेहद सीमित है। यदि कम लागत वाले अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में आए, तो इसका सीधा असर हमारे किसानों और पशुपालकों पर पड़ेगा। एसबीआई की रिपोर्ट में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के संभावित नुकसान का जो अनुमान लगाया गया है, वह इसी चिंता को और गंभीर बनाता है।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि ऊंचे टैरिफ लगाकर घरेलू बाजार को सुरक्षित रखा जाएगा, लेकिन मसविदे में ऐसी किसी ठोस व्यवस्था के संकेत नहीं मिलते। एक बार यदि अमेरिकी उत्पादों का सैलाब बाजार में आया, तो उसे रोक पाना आसान नहीं होगा।
इस समझौते का दूसरा चिंताजनक पहलू रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की चेतावनी है। यह भारत के संप्रभु अधिकारों से जुड़ा सवाल है कि वह किस देश से तेल और गैस खरीदे। रूस से तेल आयात कर भारत को बीते वर्षों में भारी आर्थिक लाभ हुआ है, फिर भी 25 फीसदी पेनल्टी टैरिफ की धमकी देना न केवल अनुचित है, बल्कि भारत की विदेश नीति पर दबाव बनाने जैसा भी है। इस बिंदु पर भारतीय वार्ताकारों की सहमति या चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
फिलहाल सरकार कह रही है कि मार्च के मध्य में अंतिम मसविदा आने तक संशोधन संभव हैं। लेकिन अंतरिम ढांचे में मौजूद विरोधाभासों ने किसानों और उनके संगठनों की चिंताओं को जायज बना दिया है। भरोसा केवल बयानों से नहीं, बल्कि लिखित शर्तों से बनता है। यदि वास्तव में सरकार भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्रों की रक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है, तो उसे समझौते में स्पष्ट, ठोस और गैर-भ्रामक प्रावधान करने होंगे।
आखिरकार सवाल यही है-क्या भारत ने उन क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति दे दी है, जिन पर अब तक साफ इंकार किया जाता रहा है? और क्या आर्थिक लाभ के नाम पर किसान और राष्ट्रीय हित दांव पर लगाए जा रहे हैं? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर देना अब सरकार की जिम्मेदारी है।

लेखक वेब वार्ता समाचार एजेंसी के संपादक

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