अर्जुन देशप्रेमी
युद्ध आरंभ करना आसान होता है, पर युद्ध को समाप्त करना कठीन होता है। यह बात रूस ने महसूस किया था और अब अमेरिका महसूस कर रहा है। रूस तो कई वर्षों से लड़ रहा है और युद्ध है कि समाप्त ही नहीं हो रहा है। इस बीच भारी भरकम नुकसान रूस और यूक्रेन दोनों को हो चुका है। अब अमेरिका ईरान को भारी भरकम नुकसान कर चुका है, पर खुद भी भारी भरकम नुकसान उठाया रहा है। युद्ध तो भारत ने भी आरंभ किया था पाकिस्तान के साथ। पर गनीमत रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे चार दिनों में ही समेत दिया, वह भी बिना किसी खास नुकसान के। पर अमेरिका युद्ध में कूदने के बाद कुछ इस कदर फंसा कि उसे समझ नहीं या रहा है कि निकल कैसे जाए। इसी के क्रम में पाकिस्तान जैसे आतंकी मुल्क की सेवा लेनी पड़ रही है जो अमेरिका जैसे सुपर पावर के लिए ईरान से मध्यस्थता करा रहा है। इसी के तहत अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ईरान के साथ अहम शांति वार्ता के लिए शनिवार को पाकिस्तान पहुंचे। इस वार्ता का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक स्थायी शांति समझौते पर पहुंचना है। इस युद्ध ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को पंगु बना दिया है और व्यापक पैमाने पर आर्थिक व्यवधान पैदा किए हैं। इस बीच ईरानी प्रतिनिधिमंडल भी अमेरिका के साथ वार्ता के लिए शनिवार तड़के पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचा। दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम की उम्मीद के साथ दुनिया भर की नजरें इस वार्ता पर टिकी हैं। वेंस विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर सहित अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ इस्लामाबाद पहुंचे। वह ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ के नेतृत्व वाले ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पाकिस्तान की राजधानी पहुंचने के कुछ घंटे बाद यहां पहुंचे। वेंस के नूर खान एयरबेस पहुंचने पर पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इसहाक डार और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने उनकी अगवानी की। पाकिस्तान की मध्यस्थता में यह शांति वार्ता ईरान और अमेरिका द्वारा दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा किए जाने के कुछ दिन बाद होगी। अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर संयुक्त हमले किए जाने के बाद पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध की शुरुआत के बाद ईरान और अमेरिका के बीच यह पहली उच्चस्तरीय वार्ता होगी। ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर इस वार्ता के बाद शांति समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई फिर शुरू करेगा। वेंस ने पाकिस्तान रवाना होने से पहले कहा था कि वह वार्ता को लेकर आशान्वित हैं और उम्मीद करते हैं कि यह ‘सकारात्मक’ रहेगी। वेंस ने विमान में सवार होने से पहले कहा था, जैसा कि (अमेरिका के) राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरानी अच्छी नीयत से बातचीत करने को तैयार हैं, तो हम सहयोग का हाथ बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से तत्पर हैं, लेकिन अगर वे हमारे साथ ‘खेल खेलने’ की कोशिश करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि वार्ता करने वाली टीम इतनी भी सहयोगी नहीं है। इन बयानों के बाद लोग कयास लगा रहे हैं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच दीर्घावधि के लिए युद्धविराम हो पाएगा? दरअसल अमेरिका का मामला कुछ अलग है। अमेरिका अपने को दुनिया का सुपर पावर मानता है। इसी के दंभ में हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूरी दुनिया की ऐसी की तैसी कर दी। अपने ‘टैरिफ टेरर’ के माध्यम से ट्रम्प ने पूरी दुनिया को आतंकित करके रख दिया। इसमें उन्होंने मित्र देशों को भी दुश्मन बना लिया। उनके सबसे करीबी मित्र मोदी और यूरोपीय देश भी उनसे दूर होते चले गए। लगभग सभी से ट्रम्प ने रिश्ते बिगाड़ लिए। हालांकि अंत में टैरिफ के मामलों में भी ट्रम्प को झटके ही लगे। इससे अमेरिका को कुछ खास हासिल नहीं हुआ। पर ट्रम्प ने सुलह नहीं कि। अपनी ताकत के घमंड में उन्होंने बेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण तक कर डाला। ऐसे में न तो ट्रम्प पर लोगों का भरोसा रह गया, न ही अमेरिका पर। फिर ट्रम्प ने ईरान पर हमला कर दिया। उन्होंने इसमें भी दुनिया के बाकी देशों को तो दूर, अपने सहयोगियों, यहाँ तक की नाटो को भी भरोसे में नहीं लिया। अपने घमंड में उन्होंने सोच कि वह ईरान को चुटकियों में मसल देंगे। पर ईरान कुर्बानियों की बदौलत ऐसा अड़ा कि अमेरिका को अब समझ में नहीं या रहा कि युद्ध को खतम कैसे करे। यानि ट्रम्प और अमरीका दोनों फंस गए। दुनिया के दूसरे देशों ने भरोसे के लायक नहीं बचे ट्रम्प का साथ देना तो दूर, मध्यस्थता करने से भी अपना हाथ खींच लिया। अब मजबूरी में उसे पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का साथ लेना पड़ रहा है और इस्लामाबाद में बैठक करनी पड़ रही है। अब इस बैठक का क्या परिणाम निकलता है, यह तो समय बताएगा। पर यह दर्शाता है कि अमेरिका किस कदर अलग थलग पड़ गया है। और यह अलग थलग पड़ना आने वाले समय में ते करेगा कि अमेरिका कितने समय के लिए दुनिया का एकलौता सुपर पावर बना रह पाता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)