अर्जुन देशप्रेमी

जब पूरी दुनिया युद्ध में लगी हुई थी, तभी भारत के विज्ञानियों ने पूरी तन्मयता और शांति के साथ देश को एक नायाब तोहफा, उपलब्धि प्रदान की है। यह उपलब्धि हासिल करने वाला भारत दुनिया का दूसरा देश है। इस काम को न तो अमेरिका कर पाया, न ही चीन या अपने को विकसित कहलाने वाले दूसरे अन्य देश, सिवाय रूस के।
इतना ही नहीं। अमेरिका ने इसपर 50 अरब डॉलर खर्च किया, पर उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। दूसरे देशों ने भी इसी तरह अरबों डॉलर खर्च किए और बाद में निराश होकर पीछे हट गए। पर भारतीय विज्ञानियों ने अमेरिका के खर्च के अंश मात्र के खर्च पर यह कारनामा कर दिखाया है।
वर्तमान में हमें अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए जरूरी यूरेनियम के लिए विदेशों, खासकर उन देशों पर निर्भर रहना पड़ता है जो अमेरिकी दवाब में काम करते हैं और जब मन होता है, उसकी आपूर्ति ठप करने की चेतावनी भी देते हैं। इनमें कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे भी देश शामिल हैं। वैसे भी पूरी दुनिया में यूरेनियम की आपूर्ति सीमित ही है।
पर भारत के विज्ञानियों ने थोरियम के माध्यम से अनवरत ऊर्जा आपूर्ति के लिए प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली है जिससे न सिर्फ परमाणु रिएक्टर स्वचालित रूप से ऊर्जा उत्पन्न करने लगता है और वह भी पूरी तरह से नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से, वरन यह यूरेनियम 233 का भी उत्पादन करता है। देश मे थोरियम पर्याप्त मात्रा में है। दुनिया के कुल थोरियम भंडार का 25 प्रतिशत अकेले भारत में है। सो अब हमें न तो अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने की जरूरत होगी न ही यूरेनियम के लिए। साथ ही हम स्वयं से यूरेनियम भी हासिल कर पाएंगे। जो उपलब्धि हासिल हुई है उससे अगले 700 वर्षों तक के लिए देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरी करने में मदद मिलेगी। वह भी स्वच्छ ऊर्जा।
असल में इस उपलब्धि के साथ ही भारत परमाणु शक्ति के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। इसके तहत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करके भारत ने ऊर्जा क्षेत्र में वर्चस्व और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के तहत कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने छह अप्रैल (सोमवार) को सफलतापूर्वक ‘पहली क्रिटिकैलिटी’ हासिल कर ली। किसी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में क्रिटिकैलिटी का मतलब नियंत्रित परमाणु विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया की उस अवस्था से है जब रिएक्टर स्वचालित रूप से ऊर्जा उत्पन्न करने लगता है और वह भी पूरी तरह से नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से।
देश की इस उपलब्धि से परमाणु ऊर्जा के वैश्विक अखाड़े में भारत ने वह महाशक्तिशाली दांव चला है जिसने बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक के गलियारों में खलबली मचा दी है। भारतीय वैज्ञानिकों ने कल्पक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को ‘क्रिटिकल’ कर न केवल विज्ञान की सीमाओं को लांघा है बल्कि चीन की उस रफ़्तार को भी सीधी चुनौती दे दी है जो खुद को परमाणु जगत का नया बादशाह मान रहा था।
यह महज एक रिएक्टर की शुरुआत नहीं बल्कि उस थोरियम के खजाने का ताला खोलने की मास्टर-की है जिसे अब तक दुनिया की मुट्ठी भर शक्तियां अपनी जागीर समझती थीं। जहां चीन 58 रिएक्टरों की फौज और अरबों डॉलर के निवेश से दुनिया को डरा रहा है, वहीं भारत ने स्वदेशी तकनीक सिद्ध कर दी है जो अपनी खपत से कहीं ज़्यादा ईंधन उगलने का दम रखती है। अब ऊर्जा सुरक्षा की शर्तें दुनिया नहीं, बल्कि खुद हिंदुस्तान लिखेगा।
यह उस संकल्प की जीत है जो भारत को अगले 700 सालों तक ‘ऊर्जा का सम्राट’ बनाने की ताकत रखता है। इसका प्रभाव यह होगा कि देश अब परंपरागत तेल और गैस ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम कर पाएगा जिसके लिए पहले से ही काम चल रहा है। इसी के तहत देश की सारी ट्रेनें बिजली पर शिफ्ट कर दी गई हैं, तो रसोई को भी इन्डक्शन चूल्हों की तरफ मोड़े जाने पर काम चल रहा है जिससे आयातित गैस की जरूरत ही खत्म हो जाए।
इसी तरह वाहनों को इलेक्टि्रक मोड मे ले जाया जा रहा है जो बिजली से चार्ज होकर चलेंगे न की पेट्रोल, डीजल या सीएनजी से। वहाँ भी बिजली से चलेंगे जिनके लिए बिजली उत्पादन देश के परमाणु ऊर्जा केंद्रों से आएगी। इससे आने वाले कुछ वर्षों में हम तेल और गैस के आयात पर अपनी निर्भरता को खत्म कर पाएंगे। इससे जहां हम इस्लामिक देशों का दबाव और उनकी ब्लैक मेलिंग से मुक्त होंगे, वहीं हमारा भारी भरकम आयात बिल काम होगा जिससे हमारी अर्थव्यवस्था बेहतर होगी।
इस उपलब्धि में एक और बड़ी बात यह है कि देश ने यह उपलब्धि नकल या किसी की मदद से हासिल नहीं की है। यह पूरी तरह से अपने अनुसंधान से हासिल हुई है। चीन ने पिछले एक दशक में रिकॉर्ड तोड़ रफ्तार से परमाणु रिएक्टर खड़े किए हैं, लेकिन उसकी पूरी ताकत यूरेनियम और विदेशी तकनीक (रूसी और पश्चिमी डिजाइन) पर टिकी है। चीन आज भी यूरेनियम के लिए आयात पर निर्भर है। जबकि भारत ने कल्पक्कम में जो कर दिखाया है वह पूरी तरह स्वदेशी है। इसका स्वदेशी होना हमारे लिए जहां गर्व का विषय है वहीं यह दुनिया के उन देशों के लिए घातक भी है जो हमसे दुश्मनी रखते हैं या जलन की भावना। हमने किसी की नकल नहीं की, बल्कि उस फास्ट ब्रीडर तकनीक को मास्टर किया है जिसे अमेरिका और जापान जैसे देश दशकों की कोशिश के बाद भी व्यावसायिक रूप से सफल नहीं बना पाए। दुनिया यूरेनियम के खत्म होते भंडारों को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के पास थोरियम का दुनिया का सबसे बड़ा खजाना है। दुनिया मे यूरेनियम सीमित है। ऐसे में बाकी देश यूरेनियम खत्म होने पर अंधेरे की ओर बढ़ेंगे जबकि भारत अपने थोरियम के बल पर ऊर्जा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ हासिल करेगा।
जहां तक आंकड़ों की बात है, भारत के पास मौजूद करीब 2.25 लाख टन थोरियम का भंडार ऊर्जा का वह कुबेर खजाना है जो देश को अगले 600 से 700 सालों तक बिना किसी बाधा के बिजली देने की गारंटी देता है। कल्पक्कम के स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने इस खजाने का ताला खोलने वाली वह जादुई चाबी तैयार कर ली है जिसे दुनिया के विकसित देश भी नहीं बना पाए। जहां चीन और अमेरिका यूरेनियम के खत्म होते भंडारों और आयात की मजबूरियों से जूझ रहे हैं, वहीं भारत अपने समुद्र तटों की रेत में छिपे थोरियम से भविष्य का परमाणु साम्राज्य खड़ा कर रहा है। फास्ट ब्रीडर तकनीक इंजीनियरिंग के लिहाज से बेहद जटिल और खर्चीली है।
कई देशों ने सुरक्षा और तकनीकी चुनौतियों के कारण इसे बीच में ही छोड़ दिया जबकि भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना किसी बाहरी मदद के इसे मुमकिन कर दिखाया। यह तकनीक भारत को न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में पूर्ण स्वराज दिलाएगी बल्कि उसे आने वाली कई सदियों के लिए दुनिया का एनर्जी हब बना देगी। भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर रूस के बाद दुनिया का दूसरा ऐसा रिएक्टर है जो अपनी खपत से ज्यादा ईंधन पैदा करेगा।
तकनीक के मामले में भारत ने फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों को पीछे छोड़ते हुए उस सेकंड स्टेज को पार कर लिया है जहां पहुंचना कई देशों का केवल सपना है। एक बार यह चक्र पूरी तरह शुरू हो गया तो भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश होगा जिसके पास अगले 700 सालों तक असीमित और सबसे सस्ती बिजली होगी.
इस रिएक्टर का प्रौद्योगिकी विकास और डिजाइन स्वदेशी रूप से इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा किया गया था, जो परमाणु ऊर्जा विभाग का एक अनुसंधान एवं विकास केंद्र है। इसका निर्माण और संचालन भारतीय परमाणु विद्युत निगम लिमिटेड द्वारा किया गया जो परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है।
यह उपलब्धि ऊर्जा क्षेत्र के वैश्विक अगुआ के रूप में भारत के उदय को मजबूत करती है। इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर हमारे समर्पित वैज्ञानिकों और अभियंताओं को बधाई।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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