संजय कुमार शर्मा
असम, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल समेत देश के पांच राज्यों में हुए मतदान के बाद आज परिणाम आने जा रहा है। फिलहाल मतों की गिनती जारी है…। देर रात का चुनाव आयोग के द्वारा नतीजों की घोषणा कर दी जाएगी। इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा यदि रही तो वह राज्य पश्चिम बंगाल है, जहां ममता बनर्जी फिलहाल सत्ता में है। ममता को हराने के लिए देश्ा की केंद्रीय एजेंसियों से लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने एक गठबंधन के रूप में काम करते दिखाई दिए। हालांकि की ममता ने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए कई बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
लेकिन ममता इस गठजोड़ में शामिल सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी बात मनवाने में नाकाम नहीं। ममता ने एसआईआर से लेकर मतगणना में केंद्रीय एजेंसियों, कर्मचारियों को शामिल किए जाने को लेकर हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में याचिका दायर की। लेकिन अनुमानित तरीके से अदालत ने ममता की याचिका पर वह निर्णय नहीं दिया जिसे निष्पक्षता की कसौटी पर खरा माना जा सके।
आज मेरे स्वयं के मन मे और देश की जनता के मन में एक सवाल जरूर है कि आखिर पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान एसआईआर कराने की इतनी जल्दबाजी क्या थी। इस जल्दी का जवाब न तो चुनाव आयोग ने दिया और न ही देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई रोशनी डाली। एसआईआर की प्रक्रिया के लिए चुनावी समय का चयन पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एसआईआर के नाम पर लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया जाना किसी भी सुरत में न्याय नहीं कहा जा सकता है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के द्वारा याचिका की सुनवाई के दौरान कहना कि ‘एसआईआर के बाद जिन लोगों के नाम मतदाता सूची के हटाए गए है वे अगली बार वोट डाल सकते है’ यह अपने आप में देश के संविधान के साथ भद्दा मजाक है। एसआईआर के नाम पर करीब 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिया गया।
इसके लिए देश की सुप्रीम कोर्ट और उन जजों को संविधान पर हाथ रख कर देश की जनता से माफी मांगने की जरूरत है। पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव के नाम पर केंद्रीय चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय ने परिणामों को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत लगा दी। इतिहास में पहली बार किसी राज्य के चुनाव को संपन्न कराने के लिए इतनी बड़ी संख्या में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवान उतारे गए। पश्चिम बंगाल चुनाव को हिंसा मुक्त रखने के नाम पर चुनाव आयोग के निर्देश पर 21 राज्यों ने अपनी-अपनी पुलिस बटालियनों को भेजा। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के पांच महानिदेशक दिल्ली का दफ्तर छोड़कर पश्चिम बंगाल में बैठक करते रहे।
इस चुनाव में बंगाल की सड़कों पर लगभग 4,000 बुलेटप्रूफ वाहन और Quick Response टीम की तैनाती की गई। पश्चिम बंगाल चुनाव को संपन्न कराने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 2,400 कंपनियां तैनात की गई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी भी विधानसभा चुनाव के लिए इतने अर्धसैनिक बलों की तैनाती नहीं हुई। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च महीने में भारत निर्वाचन आयोग ने गृह मंत्रालय से पश्चिम बंगाल के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग की थी. ये मांग 480 CAPF कंपनियों के अतिरिक्त थी जिन्हें पहले ही मंजूरी मिल चुकी थी। शुरुआत में CRPF की 230 कंपनियां, BSF की 120 कंपनियां, CISF की 37, ITBP की 47 और SSB की 46 कंपनियां पश्चिम बंगाल के लिए मुहैया कराई गई थीं जो अपने आप में एक बड़ी संख्या है। जम्मू-कश्मीर और त्रिपुरा से वापस बुलाई गई केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की कई कंपनियों को सीधा बंगाल भेज दिया गया। 31 मार्च तक बंगाल में अर्धसैनिक बलों की 300 कंपनियों की तैनाती हो गई थी। 7 अप्रैल तक 300 और कंपनियां पहुंच गईं। 10 अप्रैल तक 300 और कंपनियां तैनात की गईं।
17 अप्रैल तक चुनावों के लिए 743 कंपनियों की एक बड़ी संख्या असम के रास्ते बंगाल पहुंची। जानकारी के लिए बता दें कि एक कंपनी में 100 से 120 जवान होते हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव संपन्न कराने के लिए 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से करीब 2.5 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और सुरक्षाबलों को पहुंचाया गया था। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने इस काम में सबसे आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। इन तीनों राज्यों ने सशस्त्र पुलिस की 40-40 कंपनियां भेजीं। झारखंड ने 28, नागालैंड ने 20, पंजाब ने 20, छत्तीसगढ़ ने 25, अरुणाचल प्रदेश ने 12 कंपनियां भेजीं।
गोवा जैसे छोटे राज्य ने भी कंपनियों का योगदान दिया. भारत के हर कोने के जवानों ने मिलकर पश्चिम बंगाल चुनावों को शांति से संपन्न कराया।आज कुल मिला कर पांच राज्यों के चुनाव परिणाम देश के सामने आए जिनमे से असम और पश्चिम बंगाल भाजपा के खाते में, केरल में कांग्रेस, तमिलनाडु में टीवीके और पुडुचेरी में एआईएनआरसी की सरकार बनती नजर आ रही है। चुनाव से पूर्व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं सुप्रीम कोर्ट आई और एसआईआर को लेकर अपनी बात रखी ममता ने कोर्ट में यहां तक कहा कि हम मी लार्ड सब हो जाएगा। फार्म 7 के नाम पर लाखों वोटरों के नाम काटे जा रहा है। ममता ने प्रेस के सामने वोटरों के नाम काटने के लिए एआई का इस्तेमाल की बात भी की लेकिन देश की गोदी मीडिया ने ममता की बातों को गंभीरता से नहीं लिया। ममता की आशंका आज सही साबित हो हुई।
बंगाल में वास्तव में आज सब खत्म हो गया। लोकतंत्र का खात्मा और तानाशाही का का उदय हो गया। इसकी झांकी आज पश्चिम बंगाल में दिखाई देने लगी। चुनाव रूझान और परिणाम आने के साथ ही ममता के आवास के बाहर यह श्री राम के नारे, टीएमसी के कई कार्यालयों में आगजनी की खबरें आने लगी। कुल मिला कर शांतिपूर्ण चुनाव कराने के नाम पर केंद्रीय चुनाव आयोग के मुखिया ज्ञानेश कुमार गुप्ता ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या करते हुए तानाशाही का उदय करवा दिया। इस चुनाव में सुप्रीम कोर्ट और जजों की तुलना आजादी से पहले अंग्रेजी शासन से की जानी चाहिए।
अंग्रेजी शासन में कुछ लोग और अंग्रेज अपनी सत्ता के लिए अदालताें का भरपूर इस्तेमाल करते थे। आजादी के 78 साल बाद आज भी वहीं हो रहा है। कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़ बाकी देश की सुनवाई करने को न तो सरकार तैयार है और न ही देश की अदालतें। सब सरकार की कठपुतली बने हुए है। अदालतों के जजों का व्यवहार गांधी जी के तीन बंदरों की तरह है जो सत्ता और पक्ष के खिलाफ न तो सुनेंगे, न देखेंगें और न ही कोई आदेश जारी करेंगे। बाद बाकि डेस्क पर बैठ कर प्रवचन खुब देंगे। देश की अदालतों को जरूरत है कि वह हिम्मत दिखाकर जनता से जुड़े मुद्दों पर पर सरकार और सत्तारूढ़दल का पक्ष लेने से बचे। न्याय होना और नयाय होते हुए दिखाई देना, दानों अलग बात है। देश की अदालतें कुछ छुटपुट मामलों को छोड़, हमेश बड़े उद्योग घरानों और सत्ता के साथ खड़े नजर आते है। यदि जजों ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह दिन दूर नहीं जब जनता को एक नई आजादी के लिए एक जुट होना पड़ेगा।
लेखक एनसीआर टुडे, लोक पक्ष और खबरिया डॉट काॅम के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।