संजय शर्मा/संपादक
शुक्रवार का दिन देश की न्यायपालिका के इतिहास में एक काले दिवस के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। देश की किसी अदालत और उसके मुखिया प्रधान न्यायाधीश ने एक मामले की सुनवाई करते हुए देश की बेरोजगार जनता की तुलना कॉकरोच से की।
सुप्रीम जज सूर्यकांत व जज बागची जॉयमाल्या एक वकील की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उसने सीनियर एडवोकेट का दर्जा पाने मांग की थी।
बेंच ने वकील को जमकर फटकार लगाते हुए कहा- समाज में पहले से ही पैरासाइट (परजीवी) हैं, जो सिस्टम पर हमला करते हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने रिट वापस ले ली। किसी याचिका को खारिज करना या स्वीकार करना किसी अदालत और वहां बैठे जजों का स्वतंत्र अधिकार है लेकिन इस स्वतंत्रता के आड़ में भरी अदालत में न्याय के मंच पर बैठकर देश के नागरिकों को अपमानित करने का अधिकार किसी को नही दिया जा सकता। मामला केवल वरिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर नियुक्ति को लेकर था, जिसमे बेरोजगार युवा मीडिया, सोशल मीडिया यूजर्स, आरटीआई कार्यकर्ता और अन्य के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया था। याचिका नियम के अनुसार एक सीमित लक्ष्य को लेकर दाखिल की गई थी, लेकिन सीजेआई ने अपनी कुंठा के चलते  बेरोजगार युवाओं, मीडिया, सोशल मीडिया यूजर्स, आरटीआई कार्यकर्ता और अन्य को इसमे घसीट लिया। इस सबके बावजूद कोर्ट ने कोई आदेश पारित नहीं किया। इतना ही नहीं जजों ने अपने चिरपरिचित अंदाज में याचिका को वापस लेने की अनुमति भी दे दी।
अब सवाल ये है कि सीजेआई सूर्यकांत को भरी अदालत में यह सब बोलने की जरूरत क्यों पड़ी। दरअसल बंगाल चुनाव के बाद जिस तक करीब 27 लाख वोटों को काटने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रवैया उदासीन रह है। सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई की उदासीनता के कारण ही चुनाव में मनमानी हुई और 27 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित होना पड़ा। चर्चा है कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट बार चुनाव में एक अधिवक्ता के मताधिकार को सुरक्षा प्रदान की गई। ऐसे में भारतीय संविधान को ताक पर रख कर 27 लाख लोगों के सवाल पर कह देना कि ‘वे अगली बार वोट दे’। इससे देश में एक संदेश गया कि देश की शीर्ष अदालत और उसके मुखिया सत्ता की जुगलबंदी में शामिल हो गई। वे न केवल चुनाव आयोग की ढपली बजा रहे है बल्कि सत्तारूढ़ दल के चुनावी रास्ता बना रहे है। यह कोई पहला वाक्या नहीं जिसको लेकर देश के नागरिकों में आक्रोश है। बीते दो दशकों में एेसे कई प्रकरण है, जिसमे सत्ता के साथ न्यायपालिका कदमताल मिला कर खड़ी दिखाई दी।
देश की अदालतें वर्शिप एक्ट के प्रावधानों को ताक पर रख कर सत्ता के हक में देश की मस्जिदों में मुर्ति तलाशने में सहयोगी बन रही है। वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल अधिनियम) जो 15 अगस्त 1947 को देश में मौजूद सभी धर्मों के पूजा स्थलों की स्थिति को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया था।
इक्का दुक्का मामलों को अपवाद के तौर छोड़ कर सुप्रीम कोर्ट ने अधिकांश मामले में सत्ता पक्ष और बड़े औद्योगिक घरानों के लिए सहयोग की भूमिका अदा की है। यह कोई नया नहीं जब सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम जज सत्ता और उद्योगपतियों के संरक्षण के लिए काम करते है। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह के समय मेडिकल प्रवेश के लिए उस समय आयोजित सीपीएमटी परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से मेडिकल कॉलेज और उनके संचालक लांभवित हो रहे थे, लेकिन सरकार ने इस आदेश की मंशा को समझ कर जनहित में उचित निर्णय लिया। वर्तमान में अनंत अंबानी के ‘वनतारा’ कर जिक्र यहां किया जा सकता है। ‘वनतारा’ को लेकर शीर्ष कोर्ट ने एक अवैध और गैरकानूनी कृत्य को निपटा कर संरक्षित कर दिया। ऐसे बहूत से प्रकरण है जिसको लेकर देश का नागरिक व्यथित है।
देश के युवाओं, मीडिया, सोशल मीडिया यूजर्स, आरटीआई कार्यकर्ता और अन्य को भरी अदालत में कॉकरोच बताना समस्या का हल नहीं है। इससे न्यायपालिका की छवि सुधरने के बदले और खराब होगी। जरूरत है नागरिकों के हितों को संरक्षण प्रदान करने और उनके मन में न्याय को स्थापित करने की। न्याय होना और होते हुए दिखाई देना अलग बात है। वर्तामन में न्याय हाेते हुए दिखाई नहीं दे रहा है।

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