- अर्जुन देशप्रेमी
देश में सड़कों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर अक्सर बवाल, हिंसा, पुलिसिया कार्रवाई, राजनीतिक बयानबाजी का दौर देखने को मिलता है। उत्तर प्रदेश में जब सड़कों पर नमाज़ पढ़ने पर रोक लगी तो भारी बवाल मचा। पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे संभाल लिया। इनकी पुलिस की कड़ी कार्रवाई के आगे कोई कुछ ख़ास नहीं कर पाया। अब पश्चिम बंगाल में भी सड़कों पर नमाज़ पढ़ने पर रोक लगाई गई है जिसे लेकर भारी हंगामा मचा है। वहां पर भी हिंसा और पथराव हुआ जिसके बाद पुलिस ने लाठियां भांजी। वहां की सरकार भी सख्त हुई है। भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है।
इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सड़क पर नमाज पढ़ने के मुद्दे पर दो टूक कहा कि नमाज पढ़नी है तो शिफ्ट में पढ़िए, हम रोकेंगे नहीं, लेकिन सड़क पर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोग पूछते हैं कि आपके यहां यूपी में क्या सड़कों पर सचमुच नमाज नहीं होती? मैं कहता हूं कि कतई नहीं होती है। आप जाकर देख लो, नहीं होती है। सड़कें चलने के लिए हैं या कोई भी व्यक्ति चौराहे पर आकर तमाशा बना देगा? क्या अधिकार है उसको सड़क रोकने का, आवागमन बाधित करने का? जहां इसका स्थल है, वहां जाकर पढ़ो। लोगों ने मुझसे कहा, कैसे होगा, हमारी संख्या ज्यादा है? हमने कहा, शिफ्ट में कर लो।
घर में रहने की जगह नहीं है, तो संख्या नियंत्रित कर लो। और, सामर्थ्य नहीं है तो क्यों संख्या बढ़ाए जा रहे? आपको सिस्टम के साथ रहना है, तो नियम-कानून मानना शुरू करें। नमाज पढ़नी है, आप शिफ्ट में पढ़िए। हम रोकेंगे नहीं, लेकिन सड़क पर नहीं।
सामान्य नागरिक, बीमार व्यक्ति, कामगार, कर्मचारी सभी सड़कों पर चलते हैं, हम सड़क बाधित नहीं करने देंगे। प्यार से मानेंगे तो ठीक बात है, नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाएंगे। संवाद से मानेंगे तो ठीक नहीं तो संघर्ष से भी देख लें। बरेली में लोगों ने हाथ आजमाने का कार्य किया, देख ली सरकार की ताकत। सरकार हर सिस्टम के साथ पूरी व्यवस्था को जोड़ना चाहती है।
अब ऐसे में योगी आदित्यनाथ के इस कड़े रूख के बाद सवाल उठता है कि सड़क पर नमाज़ पढ़ना कितना उचित है? भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहु-सांस्कृतिक देश में धार्मिक स्वतंत्रता एक बुनियादी और संवैधानिक अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि, इस स्वतंत्रता की सीमाएं भी तय हैं, जो लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं। पिछले कुछ वर्षों में, देश के विभिन्न हिस्सों में सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ पढ़ने का मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहा है। इस विषय पर किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इसके धार्मिक, व्यावहारिक और कानूनी पहलुओं को समझना आवश्यक है। इस्लाम में नमाज़ एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य इबादत है। जुमे (शुक्रवार) की नमाज़ का सामूहिक महत्व है, जिसके कारण मस्जिदों में भारी भीड़ उमड़ती है।
कई बार मस्जिदों में जगह की कमी के कारण श्रद्धालु बाहर सड़कों या फुटपाथों पर सफें (पंक्तियां) लगा लेते हैं। इस व्यवस्था का एक पहलू मानवीय और आस्था से जुड़ा है। नमाज़ कुछ ही मिनटों की होती है, और श्रद्धालुओं का तर्क होता है कि वे किसी को स्थायी रूप से असुविधा नहीं पहुँचाना चाहते। लेकिन जब यह एक नियमित साप्ताहिक अभ्यास बन जाता है, तो इसके व्यावहारिक दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं।
भारत के घनी आबादी वाले शहरों में सड़कें पहले से ही यातायात के भारी दबाव में हैं। ऐसे में सड़कों के ब्लॉक होने से एम्बुलेंस, स्कूली बसों और आम राहगीरों को गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।कानूनी दृष्टिकोण से, सड़कें और सार्वजनिक स्थान किसी विशेष धार्मिक गतिविधि के लिए आरक्षित नहीं किए जा सकते।
न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के नागरिक अधिकारों को बाधित नहीं कर सकता।न्यायालय का रुख: देश की विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह रेखांकित किया है कि इबादत या प्रार्थना किसी भी धर्म की हो, वह इस तरह नहीं होनी चाहिए जिससे आम जनता के ‘रास्ता पाने के अधिकार’ का उल्लंघन हो।
सड़कों का प्राथमिक उद्देश्य यातायात और आवागमन है, धार्मिक आयोजन नहीं। यह नियम केवल नमाज़ पर ही नहीं, बल्कि हिंदुओं के जागरण, कांवड़ यात्रा, दुर्गा पूजा/गणेश पंडालों या ईसाइयों के जुलूसों पर भी समान रूप से लागू होता है। जब भी कोई धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक स्थान को अवरुद्ध करती है, तो वह कानून-व्यवस्था और नागरिक अनुशासन के दायरे में आ जाती है।
इस मुद्दे का एक दुखद पहलू इसका राजनीतिकरण है। जहाँ एक तरफ इसे धार्मिक उत्पीड़न के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है, वहीं दूसरी तरफ इसे शक्ति प्रदर्शन या अतिक्रमण के रूप में दिखाकर ध्रुवीकरण की राजनीति की जाती है। भारत जैसे संवेदनशील समाज में, सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी गतिविधियां अक्सर सांप्रदायिक तनाव का कारण बन जाती हैं।
सच्चाई यह है कि एक बहुधार्मिक समाज केवल कानून के बल पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और नागरिक चेतना से चलता है। यदि एक वर्ग की आस्था दूसरे वर्ग के लिए असुविधा का कारण बनती है, तो इससे सामाजिक समरसता की नींव कमजोर होती है। सड़कों पर नमाज़ पढ़ना कितना उचित है? इसका सीधा उत्तर है कि नियमित रूप से सार्वजनिक आवागमन को बाधित कर नमाज़ पढ़ना न तो व्यावहारिक रूप से उचित है और न ही कानूनी रूप से। लेकिन इस समस्या का समाधान केवल बल प्रयोग या प्रतिबंध नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण है:
मस्जिदों का प्रबंधन: मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं को आगे आकर यह व्यवस्था करनी चाहिए कि नमाज़ मस्जिदों के अंदर या छतों पर ही संपन्न हो। यदि भीड़ अधिक है, तो जुमे की नमाज़ को दो पारियों में कराया जा सकता है।
त्योहारों या विशेष अवसरों (जैसे ईद) पर, जहाँ बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं, प्रशासन को पहले से अनुमति देकर वैकल्पिक स्थानों (जैसे ईदगाह या खुले मैदानों) को चिन्हित करना चाहिए और अस्थायी यातायात रूट डाइवर्ट करना चाहिए।
प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियम सभी धर्मों के लिए समान रूप से लागू हों। चाहे वह सड़क पर नमाज़ हो, या सड़क घेरकर बनाया गया कोई पंडाल या चौकी—सार्वजनिक संपत्तियों का अतिक्रमण किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
आस्था हृदय का विषय है और इसका प्रदर्शन नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। भारत की खूबसूरती इसकी साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) में है। मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही अब ऐसे स्वर उठ रहे हैं जो सड़कों पर नमाज़ न पढ़ने की वकालत करते हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है। अंततः, देश हित और नागरिक सुगमता को सर्वोपरि रखते हुए, धार्मिक प्रथाओं को व्यक्तिगत या निर्दिष्ट धार्मिक स्थलों तक ही सीमित रखना आज के समय की मांग है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)