अर्जुन देशप्रेमी

आखिरकार सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में शुक्रवार को तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर ही दी। यह पिछले चार वर्षों में पेट्रोल-डीजल के दाम में पहली वृद्धि है। कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण तेल विपणन कंपनियों का घाटा बढ़ने के बीच यह वृद्धि की गई है। इसके साथ ही, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में सीएनजी की कीमतों में दो रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की गई। राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गई है। डीजल अब 87.67 रुपये के मुकाबले 90.67 रुपये प्रति लीटर हो गया है।

दरें राज्यों में मूल्य वर्धित कर (वैट) के अंतर के कारण अलग-अलग होती हैं। दिल्ली में अब सीएनजी की कीमत 79.09 रुपये प्रति किलोग्राम और मुंबई में 84 रुपये प्रति किलोग्राम है। हालांकि, घरों में खाना पकाने के लिए पाइप से मुहैया कराई जाने वाली प्राकृतिक गैस (पीएनजी) और घरेलू खाना पकाने वाली गैस एलपीजी दोनों की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।शुक्रवार का यह कदम मार्च में घोषित उत्पाद शुल्क कटौती के बाद उठाया गया है और ऐसे समय में आया है जब सरकार ईंधन खपत को कम करने और देश की तेल आयात लागत को नियंत्रित करने के लिए उपाय लागू कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सप्ताह ईंधन बचत, घर से काम करने और यात्रा कम करने की अपील की थी क्योंकि ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रही हैं और लगातार तीसरे वर्ष चालू खाते के घाटे को बढ़ाने का खतरा उत्पन्न कर रही हैं।

कुछ राज्य सरकारों ने पहले ही विभागों के कर्मचारियों को यात्रा सीमित करने, भौतिक बैठकों से बचने और कम कर्मचारियों के साथ कार्यालय संचालन के निर्देश दिए हैं। विश्लेषकों ने कहा कि ईंधन कीमतों में वृद्धि और बचत उपायों के संयुक्त प्रभाव से मांग वृद्धि पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही देश में महंगाई में चौतरफा वृद्धि देखने को मिल सकती है। पर सवाल दूसरा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या इसके बाद दोबारा वृद्धि नहीं होगी? वास्तव में देखा जाए तो साफ़ लगता है कि यह पहले दौर की वृद्धि है और आने वाले कुछ ही समय में इसमें चरणवद्ध तरीके से और बढ़ोतरी हो सकती है। अभी पेट्रोल पर प्रति लीटर 28 और डीजल पर प्रति लीटर 30 रुपए का नुकसान हो रहा है। सो महज 3 रुपए की बढ़ोतरी नाकाफी है। ऐसे में सरकार के सामने मूल्यवृद्धि के अलावा कोई दूसरा उपाय भी नहीं है। पर अगर इसी तरह दाम बढ़ाये जाएँगे तो लोगों के सामने भारी भरकम समस्याएं खड़ी होंगी। पर दिक्कत यह है कि इस समस्या को दूर करने का कोई विकल्प नज़र भी नहीं आ रहा है। उम्मीद कीजिए पश्चिम एशिया में तनाव जल्दी खत्म हो और लोगों को राहत मिले।
ईंधन की बढ़ती कीमतों का चौतरफा असर होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर एक बार फिर महंगाई का बोझ बढ़ गया है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि और सीएनजी के दामों में 2 रुपये प्रति किलो के उछाल ने बाजार में खलबली मचा दी है। यह बढ़ोतरी केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ होता है जो समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है।
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का सबसे पहला और गहरा असर लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ता है। हमारे देश में अधिकांश माल ढुलाई डीजल पर आधारित ट्रकों के जरिए होती है। जब डीजल 3 रुपये महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्टर अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ सीधे ग्राहकों पर डालते हैं। दैनिक उपभोग की वस्तुएं, दूध, ब्रेड और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों में इजाफा होना तय है। मध्यम वर्ग जो पेट्रोल के विकल्प के रूप में सीएनजी की ओर मुड़ा था, अब वहां भी राहत के रास्ते बंद हो रहे हैं। ऑटो-रिक्शा और कैब चालकों द्वारा किराया बढ़ाए जाने से ऑफिस जाने वालों का बजट बिगड़ना स्वाभाविक है।
एक तरफ वेतन में वैसी वृद्धि नहीं हो रही है, दूसरी तरफ ईंधन के बढ़ते दाम मध्यम वर्ग की डिस्पोजेबल इनकम (खर्च करने योग्य आय) को कम कर रहे हैं। जब पेट्रोल-डीजल पर खर्च बढ़ता है, तो परिवार मनोरंजन, बाहर खाने या अन्य गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने लगता है। इसका सीधा असर बाजार की मांग पर पड़ता है, जिससे अंततः आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। ईंधन केवल परिवहन का साधन नहीं है, बल्कि कई उद्योगों के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी है। विशेष रूप से लघु और मध्यम उद्योग, जो पहले से ही कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं, उनके लिए उत्पादन लागत और बढ़ जाएगी। इससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता भी प्रभावित होती है।
सरकार अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का हवाला देती है। हालांकि, यह भी सच है कि ईंधन पर लगने वाला टैक्स राजस्व का एक बड़ा हिस्सा है।”जब भी ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं होता, बल्कि एक सामाजिक चुनौती बन जाता है। यह गरीब और अमीर के बीच की खाई को और चौड़ा करता है।” ईंधन के दाम बढ़ने से थोक और खुदरा महंगाई दर में उछाल आता है। यदि महंगाई रिजर्व बैंक के तय दायरे से बाहर निकलती है, तो ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो जाती है, जिससे होम लोन और कार लोन की ईएमआई महंगी बनी रहती है।
इस संकट से उबरने के लिए दीर्घकालिक और अल्पकालिक दोनों तरह के उपायों की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को आपसी समन्वय से टैक्स के बोझ को कम करने पर विचार करना चाहिए ताकि आम जनता को तत्काल राहत मिल सके। इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को और अधिक प्रोत्साहन देना अब विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी बन गया है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को इतना सुदृढ़ और सस्ता बनाया जाना चाहिए कि लोग निजी वाहनों का उपयोग कम करें।
पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में यह ताजा वृद्धि ‘ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका’ साबित हो सकती है। सरकार को यह समझना होगा कि ईंधन की कीमतें केवल अर्थव्यवस्था का पहिया नहीं घुमातीं, बल्कि आम आदमी के विश्वास और उसकी थाली की गरिमा से भी जुड़ी होती हैं। यदि समय रहते कीमतों को नियंत्रित नहीं किया गया या इसके प्रभाव को कम करने के कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में जन-असंतोष और आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि हम ऊर्जा सुरक्षा और मूल्य स्थिरता के लिए एक ठोस राष्ट्रीय नीति पर काम करें, ताकि वैश्विक बाजार की उथल-पुथल का असर देश के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति पर न पड़े।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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