अर्जुन देशप्रेमी

समय से न्याय न मिले तो वह न्याय नहीं होता। इसी तरह अगर पैसों के बल पर न्याय मिले तो वह भी न्याय की श्रेणी में नहीं आता। देश की हालत कुछ ऐसी रही है कि लोग अदालतों में ऐड़ियाँ रगड़ रगड़ कर मर जाते हैं । कई बार तो उनके मरने के बाद फ़ैसले आते हैं। तारीख़ पे तारीख़ का डायलॉग किसको याद नहीं है। और यह तारीख़ मिलती है तो उस दिन पता चला दूसरे पक्ष का कोई नहीं आया। कभी गवाह नहीं आया तो कभी वकील साहब, तो कभी ख़ुद जज साहब। कभी हड़ताल के कारण सुनवाई नहीं हुई, तो कभी मौसम ख़राब रहने के कारण। सवारी समय पर नहीं मिली, और लेट हो गए, तो भी अगली डेट ही मिलनी है। ऊँची अदालतों में तो सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए समय और धन दोनों ही चाहिए। गवाह को साथ ले जाने का खर्च भी आपको ही उठाना है। ऐसे में भारतीय न्याय व्यवस्था को लेकर अक्सर नकारात्मक परिदृश्य ही उभरता रहा है।
पर हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक बातें सामने आ रही हैं। ख़ासकर कोरोना काल ने ऑनलाइन कोर्ट, ऑनलाइन सुनवाई के रास्ते खोले हैं। कानून में भी इस तरह के संशोधन हुए है जिससे ऑनलाइन गवाही, ऑनलाइन दस्तावेज जमा करने को इजाज़त दी गई है। इससे जहाँ कामकाज आसान होता दिख रहा है, वहीं अदालतों में अनावश्यक भीड़ भी कम होने की आशा दिख रही है। इसी कड़ी में देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने बृहस्पतिवार को साफ़ किया कि उन्होंने देश भर के सभी उच्च न्यायालयों को ऑनलाइन सुनवाई करने का निर्देश दिया है और उनमें से अधिकतर ने इसे लागू कर दिया है।उन्होंने यह बात तब कही जब एक याचिका में राष्ट्रहित में सभी जिला अदालतों को तीन महीने तक ऑनलाइन सुनवाई करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। प्रधान न्यायाधीश का कहना था कि जिला अदालत उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। जिला अदालतें उच्च न्यायालयों के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में हैं। मैंने उनसे जिला अदालतों के लिए भी अनुरोध किया है।शीर्ष अदालत ने 15 मई को, सोमवार और शुक्रवार को केवल वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मामलों की सुनवाई करने का फैसला किया था।
देश में परिवर्तन का जो दौर चल रहा है उसमे अदालतों ने भी गंभीरता से कदम उठाना आरम्भ कर दिया है जो लोगों को त्वरित और कम लागत में न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।तकनीक के इस आधुनिक युग में जब जीवन का हर क्षेत्र डिजिटल हो रहा है, न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं रही है। भारतीय न्याय प्रणाली में ‘ऑनलाइन सुनवाई’ या ‘वर्चुअल कोर्ट’ की शुरुआत शुरुआत में एक आपातकालीन व्यवस्था के रूप में हुई थी, लेकिन आज यह भारतीय कानूनी इतिहास की सबसे बड़ी जरूरत और सुधार बनकर उभरी है। देश के सभी उच्च न्यायालयों में ऑनलाइन सुनवाई को स्थायी रूप से लागू करने से न केवल न्याय प्रणाली की कार्यकुशलता बढ़ेगी, बल्कि यह आम नागरिकों के लिए न्याय को अधिक सुलभ, पारदर्शी और किफायती बनाएगा।
भौगोलिक दूरियां अक्सर न्याय के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बनती हैं। किसी भी राज्य का उच्च न्यायालय आमतौर पर उस राज्य की राजधानी या किसी एक मुख्य शहर में स्थित होता है। दूरदराज के गांवों या छोटे शहरों में रहने वाले पीड़ितों और गवाहों के लिए हर तारीख पर उच्च न्यायालय पहुंचना शारीरिक और आर्थिक दोनों रूप से बेहद कष्टदायक होता है। ऑनलाइन सुनवाई से कोई भी व्यक्ति अपने घर, स्थानीय अदालत या किसी कॉमन सर्विस सेंटर से सीधे उच्च न्यायालय की कार्यवाही में शामिल हो सकता है। यह व्यवस्था सही मायनों में “न्याय आपके द्वार” की अवधारणा को साकार करती है।
अदालती कार्यवाही में वकीलों और मुवक्किलों का एक बड़ा समय और पैसा यात्रा करने, ठहरने और कोर्ट परिसर में अपनी बारी का इंतजार करने में नष्ट हो जाता है। ऑनलाइन सुनवाई से यह फिजूलखर्ची पूरी तरह रुक जाती है। वकील एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर स्थित कई अदालतों में बिना यात्रा किए बहस कर सकते हैं। मुवक्किलों को भी अपनी दिहाड़ी या नौकरी का नुकसान किए बिना कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ने का मौका मिलता है, जिससे न्याय पाने की कुल लागत काफी कम हो जाती है।
भारतीय अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं, और उच्च न्यायालय भी इससे अछूते नहीं हैं। कई बार मामले सिर्फ इसलिए टल जाते हैं क्योंकि वकील साहब समय पर कोर्ट नहीं पहुंच पाए या कोई गवाह बीमारी या किसी अन्य कारण से यात्रा नहीं कर सका। वर्चुअल सुनवाई इन बाधाओं को समाप्त करती है। इसके माध्यम से मामलों का निपटारा तेजी से हो सकता है, जिससे न्यायपालिका पर लंबित मुकदमों का बोझ धीरे-धीरे कम होगा और ‘त्वरित न्याय’ का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित हो सकेगा।
जब न्यायालयों की कार्यवाही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर होती है, तो उसमें पारदर्शिता का स्तर स्वतः बढ़ जाता है। कई उच्च न्यायालयों ने अपनी कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग (सजीव प्रसारण) भी शुरू की है। इससे देश के नागरिकों, कानून के छात्रों और शोधकर्ताओं को यह देखने का मौका मिलता है कि अदालतें कैसे काम करती हैं और कानून की व्याख्या कैसे की जाती है। यह पारदर्शिता न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास को और मजबूत करती है।हाई-प्रोफाइल मामलों में अपराधियों या संवेदनशील गवाहों को शारीरिक रूप से अदालत में पेश करना सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी चुनौती होता है। ऑनलाइन सुनवाई से जेल से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी मुमकिन हो जाती है, जिससे सुरक्षा का जोखिम और पुलिस बल का खर्च बचता है।
इसके अलावा, वर्चुअल कोर्ट पूरी तरह ‘कागज रहित’ संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। ई-फाइलिंग और डिजिटल दस्तावेजों के उपयोग से हर साल लाखों पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। ऐसे में कहा जा सकता है कि निस्संदेह, सभी उच्च न्यायालयों में ऑनलाइन सुनवाई के फायदे असीमित हैं। यह तकनीक केवल वकीलों या जजों की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि उस अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक के लिए है जो न्याय की आस में वर्षों चक्कर काटता है।हालांकि, इस डिजिटल क्रांति को पूरी तरह सफल बनाने के लिए हमें ग्रामीण इलाकों में मजबूत इंटरनेट कनेक्टिविटी और वकीलों व मुवक्किलों के डिजिटल प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना होगा। यदि हम इन बुनियादी ढांचागत चुनौतियों को पार कर लेते हैं, तो ऑनलाइन सुनवाई भारतीय न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय, संवेदनशील और आधुनिक बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। समय आ गया है कि हम इस तकनीकी बदलाव को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपनाएं ताकि “सबके लिए न्याय” का सपना सच हो सके।
आशा की जानी चाहिए कि इस तरह के उपायों को और बेहतर बने जाएगा। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका इस दिशा में इंफ्रास्ट्रक्चर को और बेहतर बनाएगी जो आम लोगों को आसानी से, त्वरित और कम खर्चीली न्याय व्यवस्था सुगम करा पायेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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