अगर कोई आपको भी ऐसे ही शब्दों से नवाज़ने लगे, आपको चोर और गद्दार कहने लगे, आपको आपके ही अंदाज़ में तू-तड़ाक करने लगे, तो आपको कैसा लगेगा? और आप अगर ऐसा सार्वजनिक मंचों से ऐसा बोल रहे हैं, तो आप दूसरों को ऐसा करने से कैसे रोकेंगे? ऐसे में तो एक अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा। शब्दों की तो कोई मर्यादा ही नहीं रह जाएगी। क्या यह लोकतंत्र के लिए, देश के लिए, समाज के लिए ठीक होगा? लोग तो आप जैसे नेताओं से ही सीखते हैं। ऐसे में आप क्या सीखा रहे हैं? संभव है, आप कहें कि फ़लाँ नेता ने भी ऐसा बोला था। तो क्या आप किसी के ग़लत आचरण को अपना रहे हैं? मुझे तो नहीं याद है कि कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह ने उस तरह की तू-तड़ाक की भाषा आपके लिए या सोनिया गांधी के लिए, मनमोहन सिंह के लिए, स्वर्गीय राजीव गांधी के लिए इस्तेमाल की होगी जैसा की राहुल गांधी कर रहे हैं। आरएसएस की तो बात ही छोड़िये। वहां तो ऐसा संभव ही नहीं है। फिर राहुल गांधी बार बार ऐसा क्यों करते है। वर्षों से ऐसा क्यों कर रहे हैं? राहुल गांधी बड़े नेता हैं।

अर्जुन देशप्रेमी

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले दो दिनों से उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली के दौरे पर थे जहाँ उन्होंने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के लिए किया, उससे साफ़ है कि देश में लोकतंत्र में कितनी गिरावट आ चुकी है। यहाँ बड़ी बात यह है कि नरेंद्र मोदी न सिर्फ़ प्रधानमंत्री हैं, वरन् वह राहुल गांधी से उम्र में भी बहुत बड़े हैं। ऐसे में संस्कार तो यही कहते हैं की राहुल गांधी को अपनी भाषा और बोली पर नियंत्रण करना चाहिए। ऐसा पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया है। तू-तड़ाक की भाषा का वैसे भी समाज और देश में स्थान नहीं होना चाहिए।

अगर आप विपक्ष के नेता जैसे संवैधानिक पद पर हों, तब तो और भी नहीं। पर पता नहीं राहुल गांधी को यह बात समझ में क्यों नहीं आती है। कुछ लोग कहते हैं कि राहुल गांधी अंग्रेजी में सोचकर हिंदी में बोलते हैं। इसी कारण वह तू-तड़ाक जैसी हो जाती है। उनका आशय तू-तड़ाक करना नहीं होता है। पर सच तो यही है कि आप के मुँह से जो निकलता है, वही देश और दुनिया में आम आदमी सुनता है और उसका अर्थ निकलता है। वैसे भी राहुल गांधी भारतीय होने की बात करते हैं, अपने को उत्तर प्रदेश का बताते हैं, ख़ुद को दत्तात्रेय ब्राह्मण घोषित करते हैं। फिर वह कैसे कह सकते हैं कि उनको हिंदी नहीं आती या वह जिस अंदाज़ में जिन शब्दों का चयन कर रहे हैं, उनका अर्थ उनको नहीं मालूम।

पहले वह प्रधानमंत्री को चोर बोल चुके हैं। अदालत में माफ़ी माँग चुके हैं। पर आज तो उन्होंने हद ही कर दी। उन्होंने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और आरएसएस को सीधे सीधे गद्दार कह दिया। यह कितना उचित है? आप एक चुने हुए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को गद्दार कैसे बोल सकते हैं? यह अधिकार आपको कहाँ से मिलता है? इसी तरह से देश के सबसे बड़े संगठन, जो भारतीय जनता पार्टी का मूल संगठन माना जाता है, उसे ग़द्दार कैसे बोल सकते हैं? क्या सिर्फ़ इसलिए की आपको बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान से मिला हुआ है? अगर ऐसा है, तो देश में बोलने के अधिकार का उपयोग कर कोई कुछ भी बोलेगा। अगर कोई आपको भी ऐसे ही शब्दों से नवाज़ने लगे, आपको चोर और गद्दार कहने लगे, आपको आपके ही अंदाज़ में तू-तड़ाक करने लगे, तो आपको कैसा लगेगा? और आप अगर ऐसा सार्वजनिक मंचों से ऐसा बोल रहे हैं, तो आप दूसरों को ऐसा करने से कैसे रोकेंगे? ऐसे में तो एक अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा।

शब्दों की तो कोई मर्यादा ही नहीं रह जाएगी। क्या यह लोकतंत्र के लिए, देश के लिए, समाज के लिए ठीक होगा? लोग तो आप जैसे नेताओं से ही सीखते हैं। ऐसे में आप क्या सीखा रहे हैं? संभव है, आप कहें कि फ़लाँ नेता ने भी ऐसा बोला था। तो क्या आप किसी के ग़लत आचरण को अपना रहे हैं? मुझे तो नहीं याद है कि कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह ने उस तरह की तू-तड़ाक की भाषा आपके लिए या सोनिया गांधी के लिए, मनमोहन सिंह के लिए, स्वर्गीय राजीव गांधी के लिए इस्तेमाल की होगी जैसा की राहुल गांधी कर रहे हैं। आरएसएस की तो बात ही छोड़िये। वहां तो ऐसा संभव ही नहीं है। फिर राहुल गांधी बार बार ऐसा क्यों करते है। वर्षों से ऐसा क्यों कर रहे हैं? राहुल गांधी बड़े नेता हैं। वह यह नहीं कह सकते कि चूँकि छुटभइये नेता ऐसा करते हैं, सो वह भी कर रहे हैं। राहुल गांधी और उनमें समानता नहीं हो सकती। लोकतंत्र सिर्फ संख्या बल या चुनावी गणित से नहीं चलता, बल्कि इसकी आत्मा संवाद की मर्यादा और भाषाई शुचिता में बसती है। पिछले कुछ समय से जैसी गिरावट दिखी है, वह चिंताजनक है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए की गई ‘तू तड़ाक’ (अमर्यादित या अनौपचारिक) शब्दावली के प्रयोग ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि राजनीतिक विरोध और व्यक्तिगत गरिमा के बीच की रेखा कहां खत्म होती है। क्या देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ ऐसी भाषा का प्रयोग किसी भी लिहाज से उचित ठहराया जा सकता है?
भारतीय संसदीय लोकतंत्र में ‘प्रधानमंत्री’ केवल एक व्यक्ति या किसी राजनीतिक दल का चेहरा नहीं होता, बल्कि वह 140 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक संस्था है। जब कोई विपक्ष का बड़ा नेता प्रधानमंत्री के लिए ‘तू तड़ाक’ या ओछी शब्दावली का इस्तेमाल करता है, तो वह केवल एक व्यक्ति विशेष का अपमान नहीं कर रहा होता, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है जिसे जनता ने चुना है।
राजनीति में वैचारिक मतभेद, तीखे प्रहार और नीतियों की आलोचना स्वाभाविक भी हैं और आवश्यक भी। एक जीवंत लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को घेरना और उसकी कमियों को उजागर करना है। लेकिन जब यह आलोचना रचनात्मक न रहकर व्यक्तिगत आक्षेपों और अमर्यादित भाषा में तब्दील हो जाती है, तो विमर्श की गंभीरता समाप्त हो जाती है। राहुल गांधी खुद को ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने वाला और नफरत के खिलाफ लड़ने वाला नेता बताते हैं। ऐसे में उनकी भाषा से मर्यादा की उम्मीद और अधिक बढ़ जाती है। उनके द्वारा की गई ऐसी बयानबाजी उनके ही दावों के विरोधाभास को उजागर करती है।
एक राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता के आचरण को समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी, बहुत बारीकी से देखती है। नेता सिर्फ कानून नहीं बनाते, वे समाज के लिए व्यवहार का एक मानक भी तय करते हैं। यदि देश के मुख्य विमर्श में शामिल बड़े नेता ही ‘तू-तड़ाक’ और अपशब्दों का सहारा लेने लगेंगे, तो समाज में सहिष्णुता और आपसी सम्मान की भावना कैसे बची रहेगी? सोशल मीडिया के इस दौर में, जहां पहले से ही भाषाई मर्यादाएं तार-तार हो रही हैं, नेताओं के ऐसे बयान आग में घी का काम करते हैं। इससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच कटुता बढ़ती है, जो अक्सर जमीनी स्तर पर हिंसक या अत्यधिक आक्रामक व्यवहार में बदल जाती है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि यह एकतरफ़ा है। हम सिक्के के दोनों पहलुओं को देखें। भारतीय राजनीति में भाषाई मर्यादा को गिराने का काम किसी एक दल ने नहीं किया है। सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा भी विपक्षी नेताओं के लिए ‘शहजादा’, ‘पप्पू’ या अन्य अपमानजनक शब्दों का प्रयोग लगातार किया जाता रहा है। खुद प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक विरोधियों पर किए गए कई तीखे हमले भाषाई रूप से आलोचना के घेरे में रहे हैं।
मूल प्रश्न यह है: क्या एक पक्ष की गलती दूसरे पक्ष को भी मर्यादा लांघने का लाइसेंस दे देती है? निश्चित रूप से नहीं। यदि राहुल गांधी और विपक्ष यह मानते हैं कि सत्ता पक्ष की भाषा आक्रामक या अमर्यादित है, तो उन्हें अपनी भाषा को और अधिक संयत, गंभीर और अनुकरणीय बनाना चाहिए ताकि वे एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर सकें। ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ देने की यह होड़ अंततः लोकतंत्र की बुनियाद को ही कमजोर करती है।
इसके बाद भी राहुल गांधी की ‘तू तड़ाक’ की भाषा को किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता। राजनीति में शब्दों का चयन ही आपकी परिपक्वता का पैमाना होता है। जब विपक्ष गंभीर मुद्दों जैसे बेरोजगारी, महंगाई या आर्थिक नीतियों पर सरकार को घेरने के बजाय भाषाई स्तर पर नीचे गिरता है, तो वह जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने का काम करता है। इससे सत्ता पक्ष को विक्टिम कार्ड (पीड़ित बनने का कार्ड) खेलने और मुख्य मुद्दों से पल्ला झाड़ने का मौका मिल जाता है।
भारतीय राजनीति को आज ‘तू तड़ाक’ की नहीं, बल्कि ‘तर्क और तथ्यों’ की भाषा की जरूरत है। नेताओं को यह समझना होगा कि वे संसद या रैलियों में जो कुछ भी बोलते हैं, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज होता है। राहुल गांधी और उनके समकालीन सभी नेताओं को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि वे आने वाली पीढ़ी को कैसी राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। तीखी से तीखी बात भी यदि मर्यादा के दायरे में रहकर कही जाए, तो उसका असर कहीं अधिक गहरा और दीर्घकालिक होता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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