आत्ममुग्धता सुनने में भले ही महज एक शब्द हो, लेकिन इसका दायरा बहुत विशाल है। यह व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व, अपनी उपलब्धियों और अपनी छवि के मोह में इस हद तक ले जा सकती है कि उसे अपने आसपास की वास्तविकताएं दिखाई देना बंद हो जाएं। लोकतंत्र में जब यह प्रवृत्ति किसी सामान्य व्यक्ति में दिखाई देती है तो उसका प्रभाव सीमित रहता है, लेकिन जब सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के इर्द-गिर्द ऐसी संस्कृति विकसित होने लगे तो सवाल केवल व्यक्तिगत पसंद का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल तक पहुंच जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन 17 सितंबर को देशभर में जिस तरह मनाया गया, उसने इसी सवाल को फिर खड़ा किया है। भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन और सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाने की घोषणा की। इसके अंतर्गत सेवा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, रक्तदान और अन्य कार्यक्रमों के साथ दीप जलाने की अपील भी की गई।
दीप जलाना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। किसी व्यक्ति के जन्मदिन पर शुभकामना के रूप में दीप जलाने पर आपत्ति का सवाल ही नहीं है। सवाल तब पैदा होता है जब किसी प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत जन्मदिन को सरकारी कार्यक्रमों, प्रशासनिक मशीनरी और सार्वजनिक संस्थानों के बड़े आयोजनों से जोड़ दिया जाता है। दिल्ली सरकार ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर कर्तव्य पथ पर 1.25 लाख दीये जलाने का कार्यक्रम रखा। मध्य प्रदेश में उज्जैन में 33 लाख से अधिक दीये जलाए गए और पूरे प्रदेश में 3.55 करोड़ दीये जलाने की रिपोर्ट सामने आई। यहां सवाल दीपक का नहीं, सत्ता और संसाधनों की प्राथमिकता का है।
कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मितव्ययिता, संसाधन संरक्षण और खाद्य तेल की खपत कम करने की अपील की थी। कृषि मंत्रालय ने भी प्रधानमंत्री की अपील के आधार पर खाद्य तेल की खपत कम करने के अभियान को प्रशासनिक रूप देने की बात कही थी। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल है कि जब देश से तेल बचाने की अपील की जा रही हो, तब बड़े पैमाने पर दीप प्रज्वलन के आयोजनों में तेल के इस्तेमाल और उसके आर्थिक तथा पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन क्यों नहीं किया जाता?
यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि हर दीपक में खाद्य तेल ही इस्तेमाल हुआ हो, ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसलिए लाखों लीटर खाद्य तेल की बर्बादी का निश्चित आंकड़ा प्रस्तुत करने के बजाय सरकार से यह पूछा जाना चाहिए कि इन आयोजनों में कितने दीये जलाए गए, कितना तेल या अन्य ईंधन इस्तेमाल हुआ और उसका खर्च किस मद से हुआ।
सबसे गंभीर सवाल सरकारी मशीनरी को लेकर है। प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल के नेता ही नहीं, देश के प्रधानमंत्री भी हैं। लेकिन प्रधानमंत्री का जन्मदिन मूलतः एक व्यक्तिगत अवसर है। यदि किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेता का जन्मदिन मनाते हैं तो वह उनका राजनीतिक अधिकार है। परंतु जब स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय, प्रशासनिक अधिकारी और सरकारी संस्थान किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन के आयोजनों में शामिल होने लगें तो सत्ता और पार्टी के बीच की रेखा धुंधली होने का खतरा पैदा होता है। बिहार के सरकारी स्कूलों में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम की तैयारियों और दीप प्रज्वलन से जुड़ी रिपोर्टें सामने आईं। हरियाणा में भी ‘हर घर दीया’ पहल शुरू की गई। सरकारी संस्थानों में ऐसे आयोजन यदि स्वैच्छिक नागरिक कार्यक्रम के रूप में हों तो भी उनकी प्रकृति, खर्च और प्रशासनिक निर्देशों की पारदर्शिता सार्वजनिक होनी चाहिए। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का सम्मान जरूरी है, लेकिन प्रधानमंत्री के सम्मान और प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि के सरकारी प्रचार के बीच अंतर भी उतना ही जरूरी है। सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ने जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज कराने जाते हैं और तहसीलों तथा जिला मुख्यालयों में जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहुंचती है। वहां सरकारी अधिकारियों का प्राथमिक दायित्व जनता की सेवा है, किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन को भव्य बनाना नहीं।
विडंबना यह है कि जिस देश में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अस्पतालों में सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएं लगातार चर्चा में रहती हैं, उसी देश में करोड़ों दीये जलाकर किसी एक व्यक्ति के जन्मदिन को भव्य बनाने का सवाल उठना स्वाभाविक है। मध्य प्रदेश में करोड़ों दीप जलाने की उपलब्धि को यदि ‘विश्व रिकॉर्ड’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके साथ यह सवाल भी होना चाहिए कि इस आयोजन पर कितना खर्च हुआ और उस संसाधन का सार्वजनिक हित में कोई वैकल्पिक उपयोग संभव था या नहीं।
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर रक्तदान हो, अस्पतालों में स्वास्थ्य शिविर लगें, गरीबों को सहायता मिले, पौधारोपण हो, सरकारी स्कूलों में पुस्तकें पहुंचें या जरूरतमंदों को सेवाएं मिलें—इन सबका सीधा संबंध जनता से है। लेकिन किसी व्यक्ति विशेष की छवि को चमकाने के लिए सरकारी संसाधनों और प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमेशा सवाल खड़े करेगा। देश किसी एक व्यक्ति से बड़ा है और सरकार किसी राजनीतिक दल से बड़ी होती है। इसलिए प्रधानमंत्री के जन्मदिन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने करोड़ दीये जले, बल्कि यह होना चाहिए कि जनता के कितने करोड़ रुपये और कितने घंटे की सरकारी मशीनरी वास्तव में जनता के काम आई। आत्ममुग्धता तब खतरनाक बनती है जब व्यक्ति की छवि राष्ट्रहित से बड़ी दिखाई देने लगे। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि प्रधानमंत्री का सम्मान भी हो और उनसे सवाल भी पूछे जाएं। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।