संजय कुमार शर्मा
अवैध निर्माण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की सख्ती निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—यह सख्ती केवल मेरठ तक क्यों सीमित रहे? मेरठ के सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह कड़ा रुख अपनाया है, उससे यह संदेश स्पष्ट है कि कानून और निर्धारित मास्टर प्लान से खिलवाड़ को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अवैध निर्माण समय बीतने के साथ वैध नहीं हो जाता।
मेरठ मामले में सामने आए आंकड़े समस्या की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त हैं। रिपोर्टों के अनुसार, शहर के एक जोन में ही 16,726 अनधिकृत संपत्तियों की पहचान हुई है। लेकिन असली सवाल यह है कि यदि एक शहर में हजारों अवैध निर्माण वर्षों तक खड़े रह सकते हैं तो देश के दूसरे शहरों में स्थिति क्या होगी? दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और देश के दूसरे तेजी से फैलते महानगरों में अवैध कॉलोनियों, भू-उपयोग परिवर्तन, बिना स्वीकृति निर्माण और नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियों का जाल किसी से छिपा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पूरे देश की सर्वोच्च अदालत है। इसलिए मेरठ का मामला केवल मेरठ की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह देश की शहरी नियोजन व्यवस्था की उस बीमारी का एक उदाहरण है, जिसने दशकों में विकराल रूप ले लिया है। अदालत के सामने मेरठ का मामला आया, इसलिए उस पर सुनवाई हुई और आदेश दिए गए। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया कि इस आदेश की भावना को देशव्यापी शहरी नियोजन और अवैध निर्माण की समस्या के संदर्भ में देखा जाए?
बीते दो दशकों में दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अनेक हिस्सों में जमीन और मकानों की कीमतों में असाधारण वृद्धि हुई है। दूसरी ओर सरकारें लगातार ‘सुनियोजित विकास’, ‘सबके लिए आवास’ और ‘आम आदमी को सस्ता घर’ जैसे नारों के साथ विकास योजनाएं बनाती रही हैं। लेकिन जमीन पर तस्वीर कई जगह इसके उलट दिखाई देती है। विकास प्राधिकरणों का गठन इस उद्देश्य से हुआ था कि शहरों का नियोजित विस्तार हो, मास्टर प्लान के अनुसार निर्माण हो और नागरिकों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलें। मगर अनेक स्थानों पर यही व्यवस्था सवालों के घेरे में है।
अवैध कॉलोनियां पहले बसती हैं, सड़कें और मकान खड़े हो जाते हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन पहुंच जाते हैं और वर्षों बाद उन्हें नियमित करने की कवायद शुरू होती है। सवाल यह है कि जब निर्माण शुरू हो रहा था, तब संबंधित विकास प्राधिकरण, नगर निकाय और प्रशासन कहां थे? एक-दो मकान रातोंरात नहीं बनते। सैकड़ों एकड़ जमीन पर कॉलोनी विकसित होने में महीनों और वर्षों का समय लगता है। फिर ऐसी कॉलोनियां सरकारी अधिकारियों की नजर से कैसे बच जाती हैं? यही वह बिंदु है जहां केवल अवैध निर्माण करने वाले व्यक्ति को दोषी ठहराने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जिस इलाके में अवैध निर्माण खड़ा होता है, वहां अनुमति देने, निरीक्षण करने, कार्रवाई करने और रोक लगाने की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की भी होती है। यदि कोई अवैध निर्माण वर्षों तक चलता रहता है तो यह केवल बिल्डर या भू-माफिया की सफलता नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की विफलता का भी प्रमाण है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब अवैध निर्माण नया होता है तो कार्रवाई नहीं होती और जब वह वर्षों पुराना हो जाता है, तब बुलडोजर चलाने की तैयारी होती है। इस बीच उस निर्माण में किसी ने जीवन भर की कमाई लगा दी, किसी ने दुकान खरीदी, किसी ने मकान बनाया और किसी ने परिवार बसाया। इसलिए अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के साथ उस प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए, जिसने उसे पनपने दिया। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का असली उद्देश्य केवल कुछ इमारतों को गिराना नहीं, बल्कि कानून के शासन को स्थापित करना होना चाहिए। इसके लिए देशभर में अवैध निर्माण की पहचान, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही, मास्टर प्लान के उल्लंघन की निगरानी और विकास प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है।
यह भी जरूरी है कि आम आदमी और संगठित अवैध निर्माण कारोबार के बीच अंतर किया जाए। जिसने नियमों की आड़ में बड़े पैमाने पर जमीन काटकर कॉलोनी बसाई और मुनाफा कमाया, उसकी जवाबदेही उस परिवार के समान नहीं हो सकती जिसने व्यवस्था पर भरोसा करके अपनी जीवन भर की कमाई से छोटा सा मकान खरीदा। कानून का पालन सभी के लिए समान होना चाहिए, लेकिन कार्रवाई में जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला भी सामने आनी चाहिए। मेरठ आज एक शहर का नाम भर नहीं है। यह उस शहरी संकट का आईना है, जिसमें अनियोजित विस्तार, महंगी जमीन, कमजोर नियमन और प्रशासनिक उदासीनता ने आम आदमी के ‘सस्ते और सुरक्षित घर’ के सपने को लगातार दूर किया है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि मेरठ में कितने अवैध निर्माण हैं। बड़ा सवाल यह है कि देश में कितने मेरठ हैं? यदि सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती से एक व्यापक व्यवस्था बने, जिसमें अवैध निर्माण शुरू होने से पहले ही रोक दिए जाएं, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और विकास प्राधिकरण वास्तव में नियोजित विकास के प्रहरी बनें, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है। वरना आज मेरठ में बुलडोजर चलेगा, कल किसी और शहर में चलेगा और उसके बाद किसी तीसरे शहर में—लेकिन अवैध निर्माण का कारोबार अपनी जगह बना रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को इसलिए किसी एक शहर की कार्रवाई तक सीमित करने के बजाय देश की बिगड़ती शहरी व्यवस्था के लिए चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। आखिर सर्वोच्च न्यायालय की नजर में कानून देश के हर नागरिक और हर शहर के लिए समान है। फिर अवैध निर्माण के खिलाफ सवाल भी केवल मेरठ का क्यों हो?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।