संजय कुमार शर्मा
लोकतंत्र में सत्ता जनता की मालिक नहीं, उसकी सेवक होती है। संविधान ने किसी जनप्रतिनिधि को यह अधिकार नहीं दिया कि वह सवाल पूछने वाले नागरिक के साथ हाथापाई करे या कानून अपने हाथ में ले। ऐसे में दिल्ली के मंत्री प्रवेश वर्मा से जुड़ा तिलक नगर का थप्पड़ प्रकरण केवल एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच हुआ विवाद मानकर टाल देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर भूल होगी। वायरल वीडियो में प्रवेश वर्मा एक युवक का मोबाइल हाथ से नीचे करते और उसके चेहरे पर हाथ उठाते दिखाई देते हैं। घटना के बाद युवक ने पुलिस में शिकायत भी दी है और पुलिस ने मामले के तथ्यों की जांच शुरू करने की बात कही है।
मामले का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। प्रवेश वर्मा का कहना है कि उनके परिवार के बारे में कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद उन्होंने प्रतिक्रिया दी और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में घटना का पूरा संदर्भ नहीं दिखाया गया। इसलिए पूरे विवाद की कानूनी और तथ्यात्मक जांच जरूरी है। लेकिन एक बुनियादी सवाल इससे अलग है—क्या किसी मंत्री को सार्वजनिक विवाद में नागरिक पर हाथ उठाने का अधिकार है? इसका उत्तर कानून के शासन में ही तलाशना होगा, व्यक्तिगत प्रभाव या राजनीतिक हैसियत में नहीं।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद, विधानसभा या चुनावी मंच पर नहीं, बल्कि उस क्षण होती है जब कोई आम नागरिक सत्ता के सामने खड़ा होकर सवाल पूछता है। सड़क खराब है तो सवाल होगा। सरकारी अस्पताल में सुविधा नहीं है तो सवाल होगा। बिजली, पानी, रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार या अफसरशाही को लेकर शिकायत है तो नागरिक आवाज उठाएगा। सत्ता का काम सवाल पूछने वाले को चुप कराना नहीं, सवाल का जवाब देना है।
तिलक नगर की घटना में विवाद सड़क की गुणवत्ता को लेकर हुआ। समाचार रिपोर्टों के अनुसार मौके पर सड़क निर्माण को लेकर सवाल उठाए गए और युवक घटना की रिकॉर्डिंग कर रहा था। बाद में उसने दावा किया कि वह सड़क की स्थिति दिखा रहा था और मंत्री ने उस पर हाथ उठाया। दूसरी ओर मंत्री ने इसे एक अलग संदर्भ में पेश किया है। यही कारण है कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और किसी भी पक्ष के आरोप को अंतिम सत्य मानने से बचना चाहिए।
लेकिन वीडियो में दिखाई देने वाला दृश्य एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न जरूर खड़ा करता है। क्या सत्ता में पहुंचते ही जनप्रतिनिधि और आम नागरिक के बीच बराबरी का लोकतांत्रिक रिश्ता खत्म हो जाता है?
भारत में आम आदमी पहले ही महंगाई, बेरोजगारी, प्रशासनिक देरी और सरकारी दफ्तरों की जटिलताओं से जूझता है। उसे अपने अधिकार के लिए आवेदन देना पड़ता है, प्रमाणपत्र के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, शिकायत के लिए पोर्टल भरना पड़ता है और कई बार उसी अधिकारी के सामने हाथ जोड़ने पड़ते हैं, जिसकी तनख्वाह उसके टैक्स से चलती है। ऐसी स्थिति में यदि जनप्रतिनिधि भी नागरिक की आवाज को संवाद के बजाय टकराव और हिंसा से जवाब देने लगें तो लोकतंत्र का भरोसा कमजोर होगा।
देश में भ्रष्टाचार और अफसरशाही की मनमानी को लेकर जनता की शिकायतें नई नहीं हैं। युवाओं में असंतोष के अलग-अलग रूप दिखाई देते रहे हैं। नई पीढ़ी सवाल पूछती है, वीडियो बनाती है, सोशल मीडिया पर मुद्दे उठाती है और सार्वजनिक संस्थाओं से जवाब मांगती है। यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग है। सत्ता को इसे चुनौती नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए।
आज राजनीतिक दल बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन जनता का प्रश्न वही रहता है—क्या सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह है?
यहां एक और खतरनाक प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि राजनीतिक संघर्ष को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलना लोकतंत्र को कमजोर करता है। यदि विपक्ष का कोई कार्यकर्ता गलत भाषा का इस्तेमाल करता है तो उसके खिलाफ कानून है। यदि किसी नागरिक ने किसी मंत्री का अपमान किया है तो शिकायत और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला है। यदि किसी जनप्रतिनिधि पर भ्रष्टाचार का आरोप है तो जांच की व्यवस्था है। लेकिन थप्पड़ किसी कानून की जगह नहीं ले सकता।
कानून का शासन तभी मजबूत होता है जब कानून की ताकत व्यक्ति की राजनीतिक हैसियत से ऊपर हो। मंत्री हो या मजदूर, विधायक हो या आम नागरिक—सभी के लिए एक ही कानून होना चाहिए। यही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
प्रवेश वर्मा के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। न तो राजनीतिक विरोध के कारण किसी मंत्री को पहले से दोषी ठहराया जाना चाहिए और न सत्ता में होने के कारण उसे किसी विशेष छूट का हक मिलना चाहिए। उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस शिकायत और अन्य साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच हो तथा जो तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो। यही रास्ता जनता का भरोसा कायम रख सकता है।
दरअसल, यह विवाद किसी एक थप्पड़ से कहीं बड़ा है। यह उस मानसिकता का सवाल है जिसमें सत्ता में बैठा व्यक्ति भूल जाता है कि उसकी कुर्सी स्थायी नहीं है। आज वह मंत्री है, कल कोई दूसरा होगा। आज जिसके पास सुरक्षा और सरकारी तंत्र है, कल वह विपक्ष में हो सकता है। लेकिन नागरिक हमेशा नागरिक रहेगा और संविधान हमेशा संविधान रहेगा।
जनता सवाल पूछेगी—और उसे सवाल पूछने का अधिकार है। सत्ता को जवाब देना होगा—और उसे जवाब देने की जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र में असली ताकत हाथ उठाने में नहीं, तर्क से जवाब देने में है। जिस दिन सत्ता को यह अंतर समझ में आ गया, उस दिन लोकतंत्र मजबूत होगा। जिस दिन सत्ता ने सवाल को अपराध और आलोचना को दुश्मनी समझ लिया, उसी दिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगेंगे।
इसलिए तिलक नगर का थप्पड़ केवल एक चेहरे पर पड़ा हाथ नहीं माना जाना चाहिए। यह सवाल है कि सत्ता और आम आदमी के बीच रिश्ता कैसा होगा—संवाद का या डर का? इसका उत्तर किसी एक नेता को नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था को देना है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समाचार पत्र समूह के संपादक हैं

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