संजय कुमार शर्मा
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एकीकृत परिवहन एवं रसद प्राधिकरण यानी आईटीएलए की स्थापना को मंजूरी देकर देश की परिवहन और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को एकीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार का दावा है कि आईटीएलए परिवहन एवं रसद क्षेत्र में अनुसंधान, योजना, मूल्यांकन, निगरानी और प्रभाव आकलन को मजबूती देगा। निश्चित रूप से भारत जैसे विशाल देश में, जहां सड़क, रेल, बंदरगाह, विमानन और जलमार्ग अलग-अलग व्यवस्थाओं के तहत संचालित होते हैं, ऐसी समन्वित संस्था की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। लेकिन इस फैसले के साथ एक पुराना सवाल भी खड़ा होता है—कहीं आईटीएलए भी देश के उन अनेक प्राधिकरणों की लंबी सूची में शामिल होकर न रह जाए, जिनके गठन के बाद उनके मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गए।
भारत में प्राधिकरणों, आयोगों, बोर्डों और नियामक संस्थाओं की संख्या कम नहीं है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि देश में कुल कितने “प्राधिकरण” हैं, क्योंकि केंद्र और राज्यों में इन्हें अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियों में गिना जाता है। केंद्र सरकार की आधिकारिक Integrated Government Online Directory में अकेले 132 केंद्रीय वैधानिक निकाय सूचीबद्ध हैं। वहीं RTI Online पोर्टल पर 2,925 सार्वजनिक प्राधिकरण सूचीबद्ध हैं। ये दोनों आंकड़े अलग-अलग श्रेणियों के हैं, इसलिए इन्हें जोड़कर “देश में कुल प्राधिकरण” बताना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि भारत में सरकारी संस्थाओं और प्राधिकरणों का एक विशाल तंत्र पहले से मौजूद है।ऐसे में आईटीएलए के गठन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह पहले से मौजूद संस्थागत ढांचे से अलग क्या करेगा। क्या यह केवल मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय के लिए एक और संस्था होगी या इसके पास ऐसे वास्तविक अधिकार होंगे, जिनके माध्यम से यह परिवहन व्यवस्था में बदलाव लागू करा सकेगा?
भारत की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या संस्थाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके बीच तालमेल की कमी है। सड़क परिवहन का अपना मंत्रालय है, रेलवे की अपनी व्यवस्था है, बंदरगाह और जलमार्ग अलग संस्थागत ढांचे में हैं तथा विमानन के लिए अलग मंत्रालय और नियामक हैं। दूसरी ओर राज्यों के परिवहन विभाग, नगर निकाय और स्थानीय प्रशासन भी इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा हैं। माल एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाता है, लेकिन रास्ते में उसे अलग-अलग नियमों, प्रक्रियाओं, परमिट, टोल और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता है। यदि आईटीएलए इन बिखरी हुई व्यवस्थाओं को एकीकृत करने में सफल होता है तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकता है। माल की आवाजाही तेज होगी, परिवहन लागत घटेगी और उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। लेकिन यदि आईटीएलए केवल अध्ययन, बैठक, रिपोर्ट और सिफारिशों तक सीमित रहा तो फिर यह भी उसी सरकारी संस्कृति का हिस्सा बन जाएगा, जिसमें संस्था बनती है, कार्यालय खुलता है, अधिकारी नियुक्त होते हैं और कुछ वर्षों बाद संस्था अपने मूल उद्देश्य से बड़ी हो जाती है।
इसलिए सरकार को शुरुआत में ही आईटीएलए के अधिकार और जवाबदेही स्पष्ट करनी होगी। सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि प्राधिकरण केवल सलाह देगा या उसके निर्णयों को लागू कराने की भी शक्ति होगी। यदि उसके पास निर्णय लेने की शक्ति नहीं होगी तो वह उन मंत्रालयों और विभागों के सामने कितना प्रभावी होगा, जिनके बीच समन्वय कराने की जिम्मेदारी उसे दी जाएगी?
दूसरी बड़ी चुनौती केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल की है। परिवहन व्यवस्था में राज्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि आईटीएलए का ढांचा केवल केंद्रीय अधिकारियों और दिल्ली स्थित मंत्रालयों तक सीमित रहा तो यह देश की वास्तविक परिवहन समस्याओं से दूर हो सकता है। राज्यों, नगर निकायों, परिवहन कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और लॉजिस्टिक्स उद्योग को भी इसकी निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। तीसरा सवाल जवाबदेही का है। किसी प्राधिकरण की सफलता का मूल्यांकन उसके द्वारा आयोजित बैठकों और जारी की गई रिपोर्टों से नहीं, बल्कि जमीन पर आए बदलाव से होना चाहिए।
आईटीएलए बनने के बाद सरकार को यह बताना चाहिए कि परिवहन में कितना समय बचा, लॉजिस्टिक्स लागत कितनी कम हुई, माल ढुलाई की गति कितनी बढ़ी, सड़क और रेल के बीच समन्वय कितना बेहतर हुआ और कारोबारियों की अनुपालन संबंधी परेशानियां कितनी घटीं। भारत में एक और समस्या यह है कि कई संस्थाएं बनने के बाद उनकी स्वतंत्र और नियमित समीक्षा नहीं होती। यही कारण है कि समय के साथ संस्था का प्रशासनिक ढांचा ही उसका सबसे बड़ा उद्देश्य बन जाता है। आईटीएलए के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। उसके प्रदर्शन की समयबद्ध समीक्षा हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। डिजिटल तकनीक यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, विमानन और जलमार्ग से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत करके माल की आवाजाही का वास्तविक समय में विश्लेषण किया जा सकता है। इससे ऐसे मार्गों और प्रक्रियाओं की पहचान हो सकती है जहां सबसे ज्यादा समय और पैसा बर्बाद होता है। लेकिन इसके लिए केवल डिजिटल पोर्टल बनाना पर्याप्त नहीं होगा; अलग-अलग विभागों को अपने आंकड़े साझा करने और एक साझा प्रणाली में काम करने की मानसिकता भी विकसित करनी होगी।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आईटीएलए का लाभ केवल बड़े कॉरपोरेट लॉजिस्टिक्स समूहों तक सीमित न रहे। देश के छोटे ट्रांसपोर्टर, ट्रक मालिक, वेयरहाउस संचालक, किसान उत्पादक संगठन और छोटे कारोबारी भी परिवहन व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यदि नई व्यवस्था उनके लिए और अधिक कागजी प्रक्रिया या अनुपालन का बोझ लेकर आती है तो सुधार का उद्देश्य ही उलटा हो जाएगा। आईटीएलए की स्थापना इसलिए स्वागत योग्य हो सकती है, लेकिन केवल तब जब यह एक और प्राधिकरण नहीं, बल्कि प्राधिकरणों और मंत्रालयों के बीच वास्तविक समन्वय का केंद्र बने। भारत को नई संस्थाओं की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरत ऐसी संस्थाओं की है जो परिणाम देने के लिए जवाबदेह हों। सरकार के सामने असली चुनौती आईटीएलए बनाना नहीं, बल्कि उसे सफल बनाना है। देश पहले ही हजारों सार्वजनिक प्राधिकरणों और सरकारी संस्थाओं का विशाल ढांचा देख रहा है। ऐसे में आईटीएलए को भी यदि केवल एक नया कार्यालय, नया भवन और नई नौकरशाही बना दिया गया तो यह पहल अपने उद्देश्य से भटक जाएगी। लेकिन यदि इसे स्पष्ट अधिकार, विशेषज्ञता, राज्यों की भागीदारी, डिजिटल एकीकरण और कठोर सार्वजनिक जवाबदेही के साथ चलाया गया तो यह भारत की परिवहन और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है।
अब सवाल यह नहीं है कि नया प्राधिकरण क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि क्या सरकार इसे बाकी प्राधिकरणों से अलग परिणाम देने वाली संस्था बना पाएगी? यही आईटीएलए की असली परीक्षा होगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और एनसीआर टुडे समाचार पत्र समूह के संपादक हैं।

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