सवाल केवल पटियाला की 28 वार्डों का नहीं, देश के लोकतांत्रिक विश्वास का है

संजय कुमार शर्मा
पंजाब के पटियाला नगर निगम की 28 वार्डों समेत राज्य की कुल 50 नगर निकाय वार्डों में चुनाव प्रक्रिया को निरस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने छह सप्ताह के भीतर नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश दिया है। अदालत ने यह फैसला नामांकन प्रक्रिया में व्यापक बाधा, नामांकन पत्र छीने जाने, फाड़े जाने, उम्मीदवारों को धमकाने और चुनाव लड़ने से रोकने जैसी शिकायतों की जांच के बाद लिया। इतना ही नहीं, नए चुनाव की निगरानी के लिए न्यायिक व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निश्चित रूप से लोकतंत्र की शुचिता के लिए स्वागतयोग्य है। इससे यह संदेश गया है कि यदि चुनाव प्रक्रिया को जानबूझकर दूषित किया गया है तो अदालत उस चुनाव को बचाने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनर्स्थापित करने का रास्ता चुन सकती है। लेकिन इसी फैसले के बाद देश के सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है—मीलार्ड, क्या यही कसौटी बड़े और अधिक संवेदनशील चुनावों पर भी लागू होगी?
क्या यदि किसी विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची को लेकर गंभीर सवाल उठें, लाखों मतदाताओं के नाम प्रभावित होने के आरोप लगें और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाए तो सुप्रीम कोर्ट उस चुनाव को भी रद्द कर दोबारा चुनाव कराने का आदेश दे सकता है?

यही सवाल आज बंगाल के संदर्भ में पूछा जाना चाहिए।

एसआईआर को लेकर पश्चिम बंगाल में जिस तरह राजनीतिक संघर्ष चल रहा है, उसने चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। अदालत ने फिलहाल उन्हें निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया है कि यदि चुनाव आयोग के फैसले कानून के अनुरूप नहीं पाए गए तो अदालत उन्हें रद्द या पुनर्विचार के दायरे में ला सकती है।

यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है।

नगर निगम की 28 वार्डों का चुनाव लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विधानसभा चुनाव करोड़ों मतदाताओं के राजनीतिक अधिकार का प्रश्न होता है। यदि अदालत स्थानीय निकाय चुनाव में यह मान सकती है कि उम्मीदवारों को नामांकन से रोकना पूरी चुनाव प्रक्रिया को दूषित कर देता है, तो फिर किसी राज्य के करोड़ों मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर किए जाने या उनके मतदान अधिकार पर गंभीर सवाल उठने की स्थिति को उसी गंभीरता से क्यों नहीं देखा जाना चाहिए?
लोकतंत्र में मतदाता सबसे बड़ा पक्षकार है। उम्मीदवार नहीं, पार्टी नहीं, सरकार नहीं और चुनाव आयोग भी नहीं—अंततः लोकतंत्र की संप्रभुता मतदाता के वोट में निहित है।
पटियाला मामले में जिन उम्मीदवारों की आर्थिक और राजनीतिक ताकत सीमित थी, उनकी शिकायतों पर अदालत ने तथ्य खोजने के लिए पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव निरस्त किए गए। यह न्यायपालिका की सक्रियता का उदाहरण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही सक्रियता उन मामलों में भी दिखाई देगी जहां सामने राज्य की सत्ता, राष्ट्रीय राजनीतिक दल और चुनावी मशीनरी जैसी ताकतें हों?
चंडीगढ़ मेयर चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां मतपत्रों पर पीठासीन अधिकारी के आचरण का वीडियो सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो देखा, चुनावी रिकॉर्ड अपने कब्जे में लिया और अंततः चुनाव परिणाम को पलटते हुए वैध रूप से निर्वाचित उम्मीदवार घोषित किया। अदालत ने साफ किया कि चुनावी लोकतंत्र की पवित्रता को किसी अधिकारी की मनमानी से नष्ट नहीं होने दिया जा सकता।
फिर सवाल यह है कि यदि एक नगर निगम के मेयर चुनाव में लोकतंत्र की हत्या को अदालत गंभीरता से ले सकती है, तो विधानसभा चुनाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठने वाले व्यापक सवालों को उसी पैमाने पर क्यों नहीं परखा जा सकता?
यहां किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि चुनाव निष्पक्ष हुआ या नहीं।
यदि एसआईआर की प्रक्रिया में सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ है तो स्वतंत्र जांच से उसे प्रमाणित होने दिया जाना चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद वे स्वतः समाप्त हो जाएंगे। लेकिन यदि प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता साबित होती है, तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि चुनाव हो चुका है और परिणाम आ चुका है।
चुनाव केवल मतदान की तारीख का नाम नहीं है। चुनाव मतदाता सूची से शुरू होता है। उम्मीदवारों के नामांकन से शुरू होता है। प्रचार, मतदान, मतगणना और परिणाम तक चलता है। इनमें से किसी एक चरण को जानबूझकर दूषित किया गया तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
पटियाला का फैसला इसी सिद्धांत को मजबूत करता है।
इसलिए अब देश यह देखने को उत्सुक है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपनी इसी कसौटी को बंगाल तक ले जाएगा। क्या वह यह जांचने का साहस करेगा कि एसआईआर ने वास्तव में किसी मतदाता के अधिकार को प्रभावित किया या नहीं? क्या वह चुनाव आयोग से जवाबदेही तय करेगा? क्या दोष सिद्ध होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी? और सबसे बड़ा सवाल—यदि यह साबित हो जाए कि चुनाव की बुनियाद ही दूषित थी, तो क्या मीलार्ड बंगाल विधानसभा चुनाव को रद्द कर नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश देंगे?
यह प्रश्न किसी पार्टी की जीत या हार से बड़ा है।
यह प्रश्न सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक शक्ति का भी है और उसकी निष्पक्षता में जनता के विश्वास का भी। पटियाला में अदालत ने दिखाया है कि चुनावी प्रक्रिया से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब देश देखना चाहता है कि यही सिद्धांत बड़े राजनीतिक मामलों में भी उतनी ही मजबूती से लागू होता है या नहीं।
क्योंकि लोकतंत्र में छोटी मछली के लिए न्याय और बड़ी मछली के लिए अलग कानून नहीं हो सकता।
अगर चुनाव प्रक्रिया दूषित है तो चुनाव चाहे नगर निगम का हो या विधानसभा का—उसे बचाने की नहीं, लोकतंत्र को बचाने की जरूरत है।
और यही वह कसौटी है जिस पर अब मीलार्डों को भी खुद को परखना होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समाचाचार पत्र के समूह के संपादक हैं।

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