संजय कुमार शर्मा

भारत में विकास के नाम पर बड़े-बड़े सपने दिखाना अब राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुका है। कभी बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया जाता है, कभी हाई-स्पीड कॉरिडोर की तस्वीरें दिखाई जाती हैं और कभी आधुनिक रेलवे स्टेशनों की चमक-दमक को नए भारत की पहचान बताया जाता है। लेकिन इन चमकदार तस्वीरों के पीछे भारतीय रेल की जो वास्तविक तस्वीर है, वह बेहद परेशान करने वाली है। देश में यात्री ट्रेनों के लिए पर्याप्त इंजन उपलब्ध नहीं हैं, ट्रेनों की समयबद्धता लगातार सवालों के घेरे में है और आम यात्री घंटों देरी से अपनी मंजिल तक पहुंचने को मजबूर है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि जब हम सामान्य ट्रेनों को समय पर नहीं चला पा रहे हैं तो आखिर बुलेट ट्रेन कैसे चलाएंगे?
इन दिनों भारतीय रेलवे में यात्री ट्रेनों के लिए इस्तेमाल होने वाले इंजनों की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। यह खबर महज रेलवे प्रशासन की कोई सामान्य तकनीकी समस्या नहीं है। यह करोड़ों यात्रियों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा गंभीर विषय है। रेलवे भारत की जीवनरेखा है। करोड़ों लोग प्रतिदिन ट्रेन से यात्रा करते हैं। किसी यात्री के लिए ट्रेन का दो-तीन घंटे देर से पहुंचना केवल समय की बर्बादी नहीं है। इससे उसकी नौकरी, परीक्षा, कारोबार, इलाज, कनेक्टिंग ट्रेन और पारिवारिक कार्यक्रम तक प्रभावित होते हैं। फिर भी रेलवे की इस बुनियादी समस्या को लेकर वह गंभीरता दिखाई नहीं देती जिसकी अपेक्षा देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से की जानी चाहिए।
रेल मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारतीय रेलवे के पास करीब 17,900 लोकोमोटिव हैं। इनमें लगभग 13,700 इलेक्ट्रिक और करीब 4,200 डीजल इंजन हैं। इनमें से लगभग 3,400 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव यात्री ट्रेनों के संचालन में इस्तेमाल होते हैं। आंकड़े अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं। देश में रेल नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है, नई ट्रेनें शुरू की जा रही हैं, ट्रेनों के फेरे बढ़ाए जा रहे हैं, माल ढुलाई के लिए अलग कॉरिडोर विकसित किए जा रहे हैं और हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं की चर्चा हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि इस विस्तार के साथ यात्री ट्रेनों के लिए पर्याप्त इंजन, चालक, रखरखाव और परिचालन क्षमता भी बढ़ाई जा रही है या नहीं?
सरकार को इस सवाल का जवाब देश के आम रेल यात्री को देना चाहिए।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर सरकार बुलेट ट्रेन को आधुनिक भारत की महत्वाकांक्षा का प्रतीक बताती है, वहीं दूसरी ओर सामान्य यात्री ट्रेनें अपनी निर्धारित गति और समय-सारिणी के मुताबिक नहीं चल पा रही हैं। देश की बड़ी संख्या में ट्रेनें निर्धारित समय पर नहीं पहुंचतीं। अगर किसी व्यवस्था की बुनियादी इकाई ही समय की पाबंदी सुनिश्चित नहीं कर पा रही है तो केवल अत्याधुनिक ट्रेन खरीद लेने से परिवहन व्यवस्था आधुनिक नहीं हो जाती।
बुलेट ट्रेन केवल तेज रफ्तार ट्रेन का नाम नहीं है। उसके पीछे अत्याधुनिक ट्रैक, सिग्नलिंग, सुरक्षा प्रणाली, परिचालन अनुशासन, प्रशिक्षित मानव संसाधन, रखरखाव और विश्वसनीय बुनियादी ढांचे की पूरी व्यवस्था होती है। जिस देश में सामान्य रेल संचालन के लिए इंजन उपलब्धता और समयबद्धता जैसे सवाल लगातार उठ रहे हों, वहां केवल बुलेट ट्रेन की घोषणा को उपलब्धि मान लेना आत्ममुग्धता से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।
सरकारों को यह समझना होगा कि विकास का अर्थ केवल नई परियोजनाओं का उद्घाटन करना नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ उस व्यवस्था को मजबूत करना है जिसका लाभ आम आदमी रोज उठाता है। रेलवे में यात्रियों की सबसे पहली जरूरत यह है कि ट्रेन उसे सुरक्षित, सम्मानजनक और निर्धारित समय पर उसकी मंजिल तक पहुंचाए। यदि यात्री को यह भरोसा ही नहीं है कि उसकी ट्रेन समय पर चलेगी और समय पर पहुंचेगी तो फिर रेलवे के आधुनिकीकरण के तमाम दावे खोखले दिखाई देंगे।
विडंबना यह भी है कि सरकार छोटी-बड़ी उपलब्धियों को उत्सव की तरह प्रस्तुत करने में पीछे नहीं रहती। हर नई परियोजना, हर नए स्टेशन और हर नई ट्रेन को उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन व्यवस्था के भीतर मौजूद कमियों पर उतनी ही गंभीरता से बात नहीं होती। इंजन की कमी, ट्रेनों की देरी, भीड़, प्लेटफॉर्म की समस्याएं, रखरखाव और यात्रियों की सुरक्षा जैसे सवाल किसी उत्सव का हिस्सा नहीं बनते। जबकि असली परीक्षा इन्हीं सवालों पर होनी चाहिए।
बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर देश में बहस हो सकती है कि इसकी जरूरत कितनी है, इसकी लागत कितनी है और इससे कितने लोगों को वास्तविक लाभ मिलेगा। लेकिन इस बहस से भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारतीय रेलवे की मौजूदा व्यवस्था को मजबूत किया जाए। यात्री ट्रेनों के लिए पर्याप्त संख्या में आधुनिक इंजन उपलब्ध हों। पुराने लोकोमोटिव को चरणबद्ध तरीके से हटाने की स्पष्ट योजना हो। इंजन के रखरखाव की क्षमता बढ़ाई जाए। चालक और तकनीकी कर्मचारियों की पर्याप्त नियुक्ति हो। ट्रैक और सिग्नलिंग व्यवस्था को मजबूत किया जाए और सबसे महत्वपूर्ण—ट्रेन की समयबद्धता को रेलवे के प्रदर्शन का केंद्रीय पैमाना बनाया जाए।
देश को केवल तेज ट्रेन नहीं चाहिए, उसे भरोसेमंद ट्रेन चाहिए।
सरकार यदि वास्तव में भारतीय रेलवे को विश्वस्तरीय बनाना चाहती है तो उसे चमकदार परियोजनाओं के साथ जमीन पर मौजूद समस्याओं का भी समाधान करना होगा। बुलेट ट्रेन की रफ्तार से पहले आम ट्रेन की समयबद्धता सुनिश्चित करनी होगी। हाई-स्पीड रेल की चर्चा से पहले मौजूदा रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ानी होगी। नई ट्रेनों की घोषणा से पहले उनके लिए पर्याप्त इंजन और मानव संसाधन सुनिश्चित करना होगा।
आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि भारत में बुलेट ट्रेन कब दौड़ेगी। असली सवाल यह है कि क्या भारत की सामान्य ट्रेन भी बिना इंजन की कमी, परिचालन अव्यवस्था और अनावश्यक देरी के समय पर दौड़ पाएगी?
अगर इसका जवाब अभी भी नहीं है, तो फिर देश को यह पूछने का पूरा अधिकार है—ऐसे कैसे हम बुलेट ट्रेन चलाएंगे?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और एनसीआर टुडे समाचार पत्र समूह के संपादक हैं।

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