संजय कुमार शर्मा
उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करने के मामले में सरकार के खिलाफ होने वाली अदालती कार्यवाही जिस तरह आगे बढ़ती दिखाई दे रही है, उसने न्यायपालिका की भूमिका और उसकी प्रभावशीलता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला इतना महत्वपूर्ण बताया गया कि उच्चतम न्यायालय को रविवार की छुट्टी के दिन भी आपात सुनवाई करनी पड़ी। इससे देश को उम्मीद जगी कि शायद अब अदालत सरकार से सीधे जवाब मांगेगी और संवैधानिक आदेशों की अवहेलना के मामले में कोई ऐसा कदम उठाएगी, जिससे सरकार को भी कानून के सामने अपनी जवाबदेही का अहसास हो। लेकिन सुनवाई के बाद सामने आए घटनाक्रम ने इन उम्मीदों को फिर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। आखिर रविवार को अदालत लगाने की जरूरत क्या थी, यदि उससे निकलने वाला परिणाम सामान्य सुनवाई से अलग दिखाई ही नहीं देता?
सवाल किसी एक आदेश, किसी एक सरकार या किसी एक सुनवाई का नहीं है। सवाल उस संवैधानिक व्यवस्था का है, जिसमें उच्चतम न्यायालय के आदेश सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होते हैं। यदि सरकार ही अदालत के आदेश का पालन नहीं करती, तो आम नागरिक से कानून का सम्मान करने की अपेक्षा किस आधार पर की जाएगी? लोकतंत्र में सरकार को बहुमत के आधार पर शासन करने का अधिकार जरूर मिलता है, लेकिन यह अधिकार संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। सरकार की शक्ति की सीमा संविधान तय करता है और उस सीमा की रक्षा करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है। रविवार को आपात सुनवाई अपने आप में असाधारण कदम है। अदालत जब सामान्य कार्यदिवस से अलग होकर किसी मामले पर तत्काल सुनवाई करती है, तो स्वाभाविक रूप से जनता यह अपेक्षा करती है कि मामला वास्तव में गंभीर है और अदालत उसके समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाना चाहती है। लेकिन यदि सुनवाई के बाद भी आदेश के अनुपालन, जिम्मेदारी तय करने और आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो लोगों के मन में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। अदालत की गंभीरता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसने छुट्टी के दिन सुनवाई की, बल्कि इससे मापी जाएगी कि उसके हस्तक्षेप से न्याय और संविधान की रक्षा कितनी प्रभावी हुई।
बीते 12 वर्षों के राजनीतिक और संवैधानिक घटनाक्रमों के संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका को लेकर पहले भी बहस होती रही है। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालतों के रुख, सुनवाई की गति और अंतरिम राहत के सवालों पर नागरिकों, कानूनविदों तथा राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि न्यायपालिका ने हर मामले में एक जैसा व्यवहार किया है, लेकिन यह पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है कि जब सत्ता और नागरिक के अधिकार आमने-सामने हों, तब न्यायिक हस्तक्षेप कितना समयबद्ध और प्रभावी रहता है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ केवल सरकार से स्वतंत्र होकर फैसला सुनाना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ यह भी है कि न्यायालय अपने आदेशों के पालन को लेकर किसी प्रकार की असहायता प्रदर्शित न करे। यदि किसी पक्ष पर आदेश की अवहेलना का आरोप है, तो अदालत को तथ्यों की जांच करनी चाहिए, संबंधित पक्ष को सुनना चाहिए और कानून के अनुसार स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए। सरकार को भी यह समझना होगा कि न्यायालय के आदेश पर असहमति होने का अर्थ उसकी अनदेखी करने की छूट नहीं है। आदेश को चुनौती देने के लिए कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं, लेकिन उसका पालन टालने का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या अदालत की कार्यवाही का उद्देश्य केवल सरकार से जवाब मांगना है या संवैधानिक व्यवस्था में आदेशों की सर्वोच्चता सुनिश्चित करना भी है? जवाब मांगना न्यायिक प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है, मगर जब मामला आदेश के अनुपालन का हो, तब सुनवाई के साथ समयसीमा, जिम्मेदारी और आगे की कानूनी प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए। अन्यथा मामला तारीखों और औपचारिकताओं के बीच उलझ सकता है। हालांकि किसी सुनवाई के तत्काल परिणाम से ही अंतिम निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है, क्योंकि अदालत को सभी पक्षों की दलीलें सुनने और कानून के अनुरूप फैसला करने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन यही सावधानी सरकार पर भी लागू होनी चाहिए। सरकार से यह नहीं कहा जा सकता कि वह संविधान की व्याख्या केवल अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार करे। यदि अदालत का आदेश लागू करने में कोई व्यावहारिक या कानूनी कठिनाई है, तो उसका विवरण न्यायालय के सामने रखा जाना चाहिए। चुप्पी, देरी या अस्पष्टता से संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव बढ़ सकता है। लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा एक-दूसरे को कमजोर करने से नहीं, बल्कि अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाने से कायम रहती है। देश की जनता के लिए न्यायपालिका अंतिम उम्मीदों में से एक है।
आम नागरिक के पास सत्ता के निर्णयों को चुनौती देने के सीमित साधन होते हैं, जबकि सरकार के पास प्रशासनिक तंत्र और संसाधनों की व्यापक शक्ति होती है। ऐसे में अदालत का निष्पक्ष, स्पष्ट और प्रभावी हस्तक्षेप नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनिवार्य है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि सरकार के सामने न्यायिक आदेशों की प्रभावशीलता कमजोर पड़ जाती है, तो यह केवल अदालत की छवि का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि संवैधानिक शासन में विश्वास का प्रश्न बन जाएगा।
इसलिए रविवार की सुनवाई को केवल एक असाधारण न्यायिक घटना मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। असली कसौटी यह है कि संबंधित आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए अदालत आगे क्या करती है और सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी कैसे निभाती है। न्यायालय को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि दृढ़ता और कानून के अनुरूप निर्णय लेना चाहिए। सरकार को भी यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि संविधान के सामने कोई पद बड़ा नहीं है।
आखिरकार, अदालत की ताकत उसके दरवाजे रविवार को खुलने में नहीं, बल्कि उसके आदेशों की गरिमा और प्रभावशीलता कायम रहने में है। यदि असाधारण सुनवाई के बाद भी जनता के मन में यही सवाल बना रहे कि आदेश का पालन कौन सुनिश्चित करेगा, तो न्यायपालिका और सरकार दोनों को आत्ममंथन करना होगा। लोकतंत्र में न्याय केवल सुनाया नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसका सम्मान और अनुपालन भी सुनिश्चित होना चाहिए।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्णयों को भी राजनीतिक सुविधा और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के तराजू पर तौला जाने लगे। ऐसी स्थिति में जनता का भरोसा कमजोर पड़ता है। इसलिए अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का शासन केवल किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी उसका समान सम्मान हो।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समाचाचार पत्र के समूह के संपादक हैं।