The Chief Election Commissioner (CEC) of India, Shri Gyanesh Kumar addressing a Press Conference to announce the schedule for Bihar Legislative Assembly Elections 2025, in New Delhi on October 06, 2025.

सवाल ज्ञानेश कुमार को हटाने का नहीं, संस्थाओं को सत्ता की गिरफ्त से मुक्त कराने का है

संजय कुमार शर्मा

बीते करीब एक महीने से विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग को लेकर लगातार हमलावर हैं। विपक्ष को लगता है कि ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके खिलाफ कार्रवाई कराने से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार आ जाएगा। लेकिन क्या किसी एक व्यक्ति को हटाने भर से उस व्यवस्था को बदला जा सकता है, जिसकी जड़ें पिछले बारह वर्षों में देश के संस्थागत ढांचे के भीतर गहरी हो चुकी हैं? विपक्ष को अब इस बुनियादी सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि समस्या केवल ज्ञानेश कुमार नहीं, बल्कि वह राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसमें संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता लगातार सवालों के घेरे में आती रही है।
वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद से देश की संस्थाओं और सरकारी विभागों में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। इन बदलावों को सरकार प्रशासनिक सुधार और कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर उचित ठहराती रही है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इनके जरिए संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता कमजोर हुई है। सवाल यह है कि यदि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने वाली आवाजें कमजोर पड़ने लगें, सरकारी संस्थाओं के फैसलों पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप बढ़ने लगें और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो, तो क्या इसे सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है?
चुनाव आयोग लोकतंत्र का वह प्रहरी है, जिसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि प्रत्येक राजनीतिक दल को समान अवसर उपलब्ध कराना भी है। आयोग की विश्वसनीयता ही चुनावी प्रक्रिया में जनता के भरोसे की बुनियाद होती है। यदि विपक्ष को लगता है कि आयोग की कार्यप्रणाली पक्षपातपूर्ण है, मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में अनियमितताएं हैं या चुनावी फैसलों में समानता का अभाव है, तो इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन यह लड़ाई केवल किसी एक आयुक्त के इस्तीफे या पद से हटाने तक सीमित कर देना समस्या की गंभीरता को कम करना है।

विपक्ष को व्यक्ति नहीं, व्यवस्था पर चोट करनी होगी।

विपक्ष को यह समझना होगा कि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को बदल देने से संस्थागत संस्कृति अपने आप नहीं बदल जाती। यदि नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक जवाबदेही, निर्णय लेने की पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी की व्यवस्था में सुधार नहीं होता, तो एक व्यक्ति की जगह दूसरा व्यक्ति आ जाएगा, लेकिन विवादों की पुनरावृत्ति होती रहेगी। आज ज्ञानेश कुमार के स्थान पर कोई दूसरा मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हो जाए, तब भी यदि व्यवस्था पर राजनीतिक प्रभाव के आरोपों की गुंजाइश बनी रहती है, तो लोकतंत्र के सामने खड़े सवाल समाप्त नहीं होंगे।
यही स्थिति नौकरशाही की भी है। जिलाधिकारी से लेकर मंत्रालयों में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों तक, प्रशासनिक तंत्र का दायित्व निर्वाचित सरकार के निर्देशों का पालन करना जरूर है, लेकिन यह पालन कानून, संविधान और स्थापित प्रशासनिक नियमों की सीमा में होना चाहिए। अधिकारी यदि राजनीतिक नेतृत्व को प्रसन्न रखने को ही अपनी सफलता का आधार मानने लगें, तो जनहित पीछे छूट जाता है। तब सरकारी योजनाओं की सफलता से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व की छवि बन जाती है। विपक्ष को ऐसे मामलों में केवल बयान देने के बजाय प्रमाण जुटाकर जवाबदेही तय कराने की लड़ाई लड़नी चाहिए।
न्यायपालिका के संदर्भ में भी यही सवाल महत्वपूर्ण है। न्यायालयों की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा पंक्ति मानी जाती है। सरकार के पक्ष या विपक्ष में फैसला आना अपने आप में किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता का प्रमाण नहीं हो सकता। लेकिन जब महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई, फैसलों में देरी अथवा संवैधानिक प्रश्नों के निपटारे को लेकर लगातार सवाल उठते हैं, तो संस्थागत पारदर्शिता और न्यायिक जवाबदेही पर व्यापक चर्चा जरूरी हो जाती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाना और उसके हर निर्णय को राजनीतिक चश्मे से देखना अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष को इस अंतर को समझना होगा।
मोदी सरकार पर विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यही है कि उसने राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करके सरकारी तंत्र पर अपना प्रभाव बढ़ाया है। हालांकि ऐसे आरोपों को प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर परखना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी सरकार को संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर करने की छूट न मिले। लोकतंत्र में बहुमत शासन चलाने का अधिकार देता है, संस्थाओं को राजनीतिक अधीनता में रखने का अधिकार नहीं।
दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष अक्सर किसी विवाद के सामने आने के बाद सक्रिय होता है। कभी चुनाव आयोग मुद्दा बनता है, कभी जांच एजेंसियां, कभी नौकरशाही और कभी न्यायपालिका। कुछ दिनों तक बयानबाजी और विरोध प्रदर्शन होते हैं, फिर कोई नया मुद्दा सामने आते ही पुराना मामला पीछे छूट जाता है। इस तरह की राजनीति से सत्ता पर दबाव तो बन सकता है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार नहीं हो सकता।
विपक्ष को अब साझा संस्थागत सुधारों का एजेंडा तैयार करना चाहिए। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता, चुनाव आयोग के निर्णयों की सार्वजनिक जवाबदेही, मतदाता सूची के पुनरीक्षण में स्पष्ट मानक, सरकारी अधिकारियों की राजनीतिक निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्र निगरानी जैसे मुद्दों पर ठोस प्रस्ताव सामने आने चाहिए। संसद से लेकर अदालत तक इन मुद्दों को लगातार उठाना होगा। साथ ही, जनता को प्रमाणों के साथ यह बताना होगा कि किसी संस्था के फैसले से उसके अधिकारों पर कैसे असर पड़ा है।
सवाल यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार के पीछे पड़ने से क्या हासिल होगा। सवाल यह है कि क्या विपक्ष ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए तैयार है, जिसमें भविष्य में किसी भी सरकार को चुनाव आयोग, नौकरशाही या दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार चलाने का अवसर न मिले। यदि विपक्ष केवल व्यक्तियों को निशाना बनाता रहा और संस्थागत सुधारों की लड़ाई नहीं लड़ा, तो चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन सत्ता और संस्थाओं के बीच का असंतुलन बना रहेगा। लोकतंत्र को बचाने के लिए किसी एक अधिकारी के खिलाफ अभियान से कहीं अधिक जरूरी है उस व्यवस्था को जवाबदेह बनाना, जिसमें संविधान सर्वोपरि हो और सत्ता उसके अधीन।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समाचाचार पत्र के समूह के संपादक हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *