संजय कुमार शर्मा
मोदी सरकार के 12 साल: विनिवेश के नाम पर सरकारी संपत्तियों की बिक्री और सार्वजनिक क्षेत्र के भविष्य पर सवाल
देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता संभाले 12 साल से अधिक हो चुके हैं। इन वर्षों में सरकार ने विकास, आर्थिक सुधार और आत्मनिर्भर भारत के नाम पर अनेक बड़े फैसले लिए। लेकिन इन फैसलों के बीच एक नीति लगातार चर्चा में रही है—सरकारी कंपनियों और सार्वजनिक संपत्तियों में सरकार की हिस्सेदारी कम करना।
कभी इसे विनिवेश कहा गया, कभी निजीकरण और कभी संसाधन जुटाने का उपाय बताया गया। मगर आम आदमी के मन में सवाल उठता है कि आखिर सरकार देश की संपत्तियां बेचकर कब तक अर्थव्यवस्था चलाएगी? क्या सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, या फिर हर सरकारी उपक्रम को निजी हाथों में सौंप देना ही आर्थिक सुधार का नया मॉडल बन गया है?
एयर इंडिया की बिक्री से लेकर अब आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की कोशिश तक, सरकार की नीतियों पर बहस तेज है। सवाल सिर्फ किसी एक कंपनी या बैंक का नहीं, बल्कि उस आर्थिक सोच का है जिसमें दशकों से खड़ी की गई सार्वजनिक संपत्तियों के भविष्य का फैसला किया जा रहा है। इन संपत्तियों को बनाने में जनता के पैसे, सरकारी निवेश और देश के कर्मचारियों की मेहनत लगी है। इसलिए इनके बारे में निर्णय लेते समय केवल राजस्व और कारोबारी लाभ नहीं, बल्कि जनहित को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
एयर इंडिया से आईडीबीआई बैंक तक
एयर इंडिया कभी देश की पहचान और सरकारी विमानन क्षेत्र का प्रमुख चेहरा थी। वर्षों के घाटे, कर्ज और परिचालन संबंधी समस्याओं के बाद सरकार ने जनवरी 2022 में इसे टाटा समूह को सौंप दिया। इस सौदे में एयर इंडिया के साथ एयर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी वाली एयरपोर्ट सर्विस कंपनी एआईएसएटीएस भी शामिल थी। सरकार का तर्क था कि इससे सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम होगा और विमानन कंपनी को नई दिशा मिलेगी। लेकिन सवाल यह भी है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को इस स्थिति तक पहुंचने से रोकने के लिए सरकारों ने क्या किया?
अब आईडीबीआई बैंक पर नजर है। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम की इस बैंक में बड़ी हिस्सेदारी है और इसके रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया लंबे समय से चर्चा में है। आईडीबीआई बैंक कोई छोटी वित्तीय संस्था नहीं, बल्कि देश के बैंकिंग ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके निजीकरण से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बैंक के ग्राहकों, कर्मचारियों, जमाकर्ताओं और व्यापक वित्तीय व्यवस्था के हितों की रक्षा कैसे होगी। बैंक बेचने से एक बार रकम मिल सकती है, लेकिन भविष्य में होने वाली कमाई और सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण का क्या होगा, इस पर भी देश को जवाब मिलना चाहिए।
12 साल में किन संपत्तियों की बिक्री हुई?
मोदी सरकार के कार्यकाल में सार्वजनिक संपत्तियों से जुड़ी नीतियों को समझने के लिए कुछ बड़े उदाहरणों पर नजर डालना जरूरी है। एयर इंडिया के अलावा भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) में सरकारी हिस्सेदारी बेचने की योजना बनाई गई, हालांकि प्रस्तावित रणनीतिक बिक्री पूरी नहीं हुई। यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी कंपनी को बेचने की घोषणा, बिक्री की प्रक्रिया शुरू होने और सौदा पूरा होने की स्थिति एक जैसी नहीं होती।
सरकार ने हिंदुस्तान जिंक, एनएमडीसी, कोल इंडिया, ओएनजीसी और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में विभिन्न चरणों में शेयर बिक्री के जरिये हिस्सेदारी घटाई। इन मामलों में हर बार पूरा उपक्रम नहीं बेचा गया; कई बिक्री में सरकार ने नियंत्रण अपने पास रखा और कुछ में केवल बाजार में शेयरों की पेशकश की गई। इसलिए सभी विनिवेश को पूर्ण निजीकरण कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह जरूर है कि सरकारी हिस्सेदारी बेचकर राजस्व जुटाना आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण के तहत कई बैंकों का विलय किया। यह बिक्री नहीं थी, लेकिन इससे सार्वजनिक बैंकिंग ढांचे का स्वरूप बदला। इसी तरह रेलवे, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और ऊर्जा क्षेत्र में परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण तथा निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया गया। राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन के माध्यम से सरकार ने सड़क, रेलवे, बिजली और अन्य क्षेत्रों की चुनिंदा परिसंपत्तियों से संसाधन जुटाने की योजना बनाई। यहां भी अंतर समझना होगा: परिसंपत्ति का मुद्रीकरण कई बार संचालन या उपयोग के अधिकार देने से होता है, न कि उसका स्थायी स्वामित्व बेचने से।
सरकार की इस नीति के समर्थकों का कहना है कि निजी पूंजी और प्रतिस्पर्धा से दक्षता बढ़ती है, सरकारी संसाधन मुक्त होते हैं और सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च कर सकती है। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है—यदि लाभ कमाने वाली या रणनीतिक महत्व रखने वाली सार्वजनिक कंपनियों में हिस्सेदारी लगातार घटती है, तो सरकार के पास भविष्य के लाभांश, नीतिगत नियंत्रण और संकट के समय हस्तक्षेप की क्षमता भी सीमित हो सकती है।
जनता के पैसे से बनी संपत्ति किसकी है?
सरकारी कंपनियां किसी नेता या सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं। वे जनता के धन और दशकों के सार्वजनिक निवेश से बनी हैं। सरकार बदलती रहती है, लेकिन देश की संपत्ति जनता की होती है। इसलिए किसी भी बड़े विनिवेश से पहले पारदर्शी मूल्यांकन, खुली प्रतिस्पर्धा, खरीदार की क्षमता और सौदे के दीर्घकालिक प्रभावों की सार्वजनिक समीक्षा जरूरी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बिक्री से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। यदि संपत्ति बेचकर प्राप्त धन का उपयोग केवल मौजूदा खर्चों को पूरा करने में किया जाता है, तो यह स्थायी समाधान नहीं हो सकता। एक बार मिलने वाला पैसा खत्म हो जाता है, जबकि बेची गई संपत्ति से भविष्य में होने वाली आय हमेशा के लिए हाथ से निकल सकती है। इसके विपरीत, यदि विनिवेश से प्राप्त धन उत्पादक निवेश, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नई सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निर्माण में लगाया जाए, तो उसका औचित्य मजबूत हो सकता है। देश को यह भी देखना होगा कि निजीकरण के बाद सेवाओं की कीमतों, कर्मचारियों की नौकरी और उपभोक्ताओं के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ता है। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि निजी क्षेत्र बेहतर काम करेगा। सरकार को यह साबित करना होगा कि सौदे से जनता को वास्तविक लाभ हुआ है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे सामचार पत्र समूह के संपादक हैं