अर्जुन देशप्रेमी
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संभवतः यह पहला अवसर होगा जब अमेरिका और यूरोप के बीच रिश्ते तल्ख हो रहे हैं। ये रिश्ते ना सिर्फ़ आर्थिक मोर्चों के कारण बिगड़ रहे हैं, वरन् रक्षा और तकनीक के साथ ही दूसरे देशों की संप्रभुता को लेकर भी बिगड़ रहे हैं।
दोनों के बीच तल्खी तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुलेआम स्वीकार भी लिया उन्होंने न सिर्फ़ युद्ध में अमेरिका का साथ ना देने के लिए यूरोपीय देशों को कायर तक कह डाला है, वरन् चेतावनी भी दी है की उसके बिना यूरोप की रक्षा ख़तरे में पड़ेगी क्योंकि नाटो देश काग़ज़ी शेर हैं। अमेरिका के बिना वे अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते हैं।
दरअसल यूरोप और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरी मुख्य रूप से राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक मतभेदों के कारण उत्पन्न हुई है। यूक्रेन युद्ध, चीन पर अलग-अलग दृष्टिकोण, और व्यापारिक तनाव ने ‘पश्चिम’ की एकता को चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जिससे यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करनी पड़ रही है। जिस तरह से अमेरिका ने यूक्रेन को रूस के साथ युद्ध में झोंक दिया और उसके बाद पीछे हटने लगा उससे अमेरिका के सहयोगी नाटो देश, जो मुख्यतः यूरोपीय देश हैं, को गहरा झटका लगा।
वे सोचने पर मजबूर हो गए कि अमेरिका पर आगे भरोसा किया जाए या नहीं। ऐसे में 1949 में नाटो की स्थापना के बाद से अब स्थिति बदल गई है, और यूरोपीय देशों को अब अपनी सुरक्षा के लिए खुद से कदम उठाने की आवश्यकता महसूस हो रही है, क्योंकि सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी में मतभेद उभरे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि यह अभी अभी हुआ है। ट्रंप प्रशासन से पहले बाइडेन प्रशासन तक, चीन को लेकर यूरोप और अमेरिका की साझेदारी में भिन्नता रही है, जो अब तनाव का कारण बन रही है।साथ ही यूक्रेन संघर्ष के दौरान अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण (खासकर फ्रांस और जर्मनी) ने आपसी विश्वास को कम किया है।दोनों महाद्वीपों के बीच व्यापारिक समझौतों और आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर भी मतभेद बढ़ रहे हैं।
इसकी झलक तब भी मिली थी, जब अमेरिका के ना चाहने के बाद भी यूरोपियन यूनियन ने भारत के साथ व्यापार समझौता कर लिया था। यूरोप ने भारत को अमेरिका के ऊपर एक तरह से तरजीह दे दी और अमेरिका खिसियानी बिल्ली की तरह देखता रह गया। परिणाम यह हुआ कि अमेरिका को भी मन मसोस कर भारत के साथ ना सिर्फ़ समझौता करना पड़ा, वरन् उसे भारत पर लादे गए भारी भरकम टैरिफ को भी कम करना पड़ा।
अमेरिका और यूरोप के बीच यह बढ़ती दूरी रूस और चीन जैसी शक्तियों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, जो पश्चिमी देशों के बीच दरार का फायदा उठा सकते हैं। पर साथ ही भारत के लिए भी यह फायदेमंद होगा। दोनों के बीच टैरिफ और व्यापारिक असंतुलन से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है। यूरोपीय मैन्यूफैक्चरिंग को अमेरिका के साथ व्यापार में असुरक्षा महसूस हो रही है। अमेरिका नवाचार, उत्पादकता और डिजिटल प्रौद्योगिकियों में यूरोप से काफी आगे निकल रहा है, जिससे यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।
दोनों पक्षों के बीच अंतरराष्ट्रीय संधियों, ईरान के मामलों और तकनीकी विनियमन को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। यह बढ़ती दूरी एक नए, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर इशारा करती है, जहां यूरोप और अमेरिका पहले की तरह अटूट सहयोगी के बजाय स्वतंत्र भागीदार के रूप में कार्य कर सकते हैं।
यूरोप और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरी भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर लेकर आई है, जिससे भारत व्यापारिक विविधता और सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच यूरोपीय देशों के साथ भारत के रिश्ते गहरा रहे हैं, जबकि रक्षा व प्रौद्योगिकी में अमेरिका के साथ भी संबंध महत्वपूर्ण बने हुए हैं। यह स्थिति भारत को भू-राजनीतिक संतुलन साधने की शक्ति दे रही है। अमेरिका-यूरोप के व्यापारिक तनाव से भारत को लगभग 14 अरब डॉलर का लाभ होने की संभावना है। भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर रहा है।
रक्षा क्षेत्र में यूरोप (जैसे फ्रांस) के साथ भारत के संबंध मजबूत हो रहे हैं। साथ ही, अमेरिका-चीन संघर्ष के बीच भारत की भूमिका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गई है। ईरान-इज़राइल या अमेरिका-ईरान जैसे संघर्षों में, यूरोप भारत को एक मध्यस्थ के रूप में देख रहा है, जो भारत की कूटनीतिक सफलता को दर्शाता है। कुल मिलाकर यह बदलाव भारत को एक स्वतंत्र और मजबूत वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है, जो अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए दोनों पक्षों के साथ अपने संबंधों को मैनेज कर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)