अर्जुन देशप्रेमी
अच्छी बात है कि सरकार ने पश्चिम एशिया संकट के कारण एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चिंताओं के बीच इंडक्शन हीटर व उससे जुड़े बर्तनों की बढ़ती मांग के मद्देनजर कंपनियों को इन उत्पादों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने के तरीकों पर शुक्रवार को चर्चा की। पर दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि सरकार ने यह कदम देर से उठाया। सरकार को इसपर काफी पहले काम करना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह साफ तौर पर सरकार की अदूरदर्शिता का नमूना है। खासकर तब जब देश बिजली के मामलों मे आत्मनिर्भर है और गैस के मामले में हम मुस्लिम देशों पर निर्भर हैं।
पश्चिम एशिया संकट ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों की आवाजाही को बाधित कर दिया है। इससे खाना पकाने की गैस की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं और लोग इंडक्शन हीटर और उसके अनुकूल बर्तन खरीद रहे हैं। ऐसे में एक बैठक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में हुई। इसमें ऊर्जा सचिव, विदेश व्यापार महानिदेशक (डीजीएफटी) और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के सचिव सहित वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस बैठक में सरकार ने चर्चा की कि इंडक्शन हीटर और उससे जुड़े बर्तनों (जैसे इंडक्शन कुकर के बर्तन) का उत्पादन किस तरह तेजी से बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है और बाजार में ये खूब बिक रहे हैं। उद्योग जगत के अनुसार, पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण खाना पकाने की गैस की आपूर्ति संबंधी चिंताओं के मद्देनजर इंडक्शन कुकटॉप और इलेक्ट्रिक केतली की बिक्री में भारी वृद्धि हुई है। पर असल में सवाल तो यह है कि क्या सरकार अबतक सो रही थी। उसने इतनी देर से इसपर विचार क्यों आरंभ किया? सरकार को क्या यह नहीं मालूम कि देश किस कदर रसोई गैस के लिए विदेशों, खासकर खाड़ी देशों पर निर्भर है। आज तो युद्ध के कारण आपूर्ति बिगड़ी है।
कल को किसी और कारण से आपूर्ति बाधित होगी। आनेवाले समय में लगातार कोई न कोई कारण इसमें बाधा डालेंगे। तो क्या हर बार ऐसे ही जनता को संकट में डाला जाता रहेगा? बड़ी बात यह है कि देश में सूरज कि गर्मी पर्याप्त मात्र में मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोलर मिशन भी चल रखा है। मतलब साफ है कि देश में आने वाले समय में भी बिजली की कमी नहीं रहने वाली है। सोलर के साथ ही पवन ऊर्जा से भी बिजली पैदा होती है। इस क्षेत्र में भी देश ने व्यापक उपलब्धि हासिल की है। देश मे सोलर और विंड ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। लोग भी इसे अपना रहे हैं। घरों की छतों पर बड़े पैमाने पर सोलर पैनल लग रहे हैं। जरूरत के समय इसे जितनी जरूरत हो, उतनी बढ़ाई जा सकती है। कहने का मतलब है कि अब देश में बिजली की कमी नहीं होने वाली है। तो फिर एक मुहिम चलाकर, एक अभियान चलाकर क्यों न हर रसोई को इंडक्शन चूल्हे से जोड़ दिया जाए? सरकार जब इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी दे सकती है, शौचालयों के लिए पैसे दे सकती है, गैस सिलिन्डर पर सब्सिडी दे सकती है, उद्योगों को सब्सिडी दे सकती है, घर बनाने के लिए पैसे दे सकती है तो इंडक्शन चूल्हे के लिए सब्सिडी क्यों नहीं दे सकती है? सोलर पर तो वैसे भी सब्सिडी दी ही जाती है। अगर सरकार ने ऐसा किया तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हमें पूरी दुनिया के आगे गैस के लिए भीख नहीं मंगनी पड़ेगी न ही हमारी भारी-भरकम विदेशी मुद्रा इस मद में दूसरे देशों को जाएगी।
यह देश हित में, देश की अर्थव्यवस्था और घरों के चूल्हों के जलते रहने के लिए बहुत ही उत्तम और बड़ा कदम होगा। इसमें एक अच्छी बात यह भी है कि इंडक्शन चूल्हों का उपयोग गैस की तुलना में ज्यादा सुरक्षित है। इसकी सप्लाइ चेन नहीं होगी, इसकी बार-बार डिलीवरी की जरूरत नहीं होगी। इसमें कालाबाजारी कि गुंजाइश नहीं होगी। एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान होगा। इसमें महिलाओं के हाथ जलने, आग लगने, गैस के रिसाव की समस्या नहीं होगी। और अंत में सबसे महत्वपूर्ण कि यह गैस की तुलना में सस्ता भी पड़ता है। यदि कुछ बर्तनों में बदलाव की जरूरत हो तो सरकार उन बर्तनों को आसानी से और सस्ते में उपलब्ध कराने का काम करेगी। ऐसे में उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार ने जो कदम उठाने पर आज विचार किया है, उसपर अमल करेगी। हो सके तो वह जैसे ‘घर घर शौचालय’ जैसा अभियान चलाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)