जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राज कुमार भाटी पत्रकारिता के शुरूआती दौर से मेरे मित्र हैं। उनकी विद्वता का मैं तब से कायल हूं जब साल 1990 में जन समावेश नाम से मैंने एक दैनिक समाचार पत्र निकाला और विमोचन का दिन आ गया मगर अखबार पूरा तैयार ही नहीं हो पाया था। ऐसे में इत्तेफ़ाकन साथी राजकुमार भाटी मेरे कार्यालय आए हालात देखकर उन्होंने मुझसे कहा कि आप प्रोडक्शन का बाकी काम देखिए, एडिटोरियल पेज मैं तैयार कराता हूं। अखबार का पहला संपादकीय कितना महत्वपूर्ण होता है यह बात हर वह व्यक्ति भली भांति समझता है जो अखबारों से थोड़ा बहुत भी जुड़ा रहा हो।
भाटी जी ने अखबार के लिए जो उम्दा संपादकीय उस दिन लिखा, वह मेरे दिलो दिमाग पर आज तक छपा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से उन्हें समाचार चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेते समय प्रगतिशील और ज्ञानवर्धन बातें करता हुए जब देखता हूं तो सुखद अनुभूति होती है। मैं दावे से कह सकता हूं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शायद ही किसी अन्य पत्रकार ने शास्त्रों, साहित्य, समाज शास्त्र और तमाम अन्य विषयों पर इतना गहन अध्ययन किया हो, जितना राज कुमार भाटी ने किया है। गांव देहात की पृष्ठभूमि से निकल कर हमारे बीच का एक कस्बाई पत्रकार इस ऊंचाई तक पहुंचा कि आज टीवी पर बड़े बड़े धुरंधरों को धूल चटा देता है।
वर्ष 1931 के बाद से भारत में पूरी जातिगत गणना नहीं हुई मगर एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में 4,600 से अधिक समुदायों का उल्लेख किया गया है। उपजातियों की भी गणना हो तो यह आंकड़ा कई गुना और बढ़ने की उम्मीद है।
जातीय व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि नीची से नीची समझे जाने वाली जाति भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है और उसका मखौल उड़ाती है। मगर अब जैसे जैसे शिक्षा, तकनीक, शहरीकरण और समृद्धि का फैलाव बढ़ा है, समाज इस कूप मंडूकता से धीरे धीरे ही सही मगर बाहर आ रहा है। तमाम जातियों के युवा अब प्रेम विवाह करते समय जाति की परवाह नहीं करते। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में अंतर्जातीय विवाहों की संख्या अब ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है। महानगरों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में भी अंतरजातीय विवाह अपेक्षाकृत बढ़े हैं।
वर्ष 1931 के बाद से भारत में पूरी जातिगत गणना नहीं हुई मगर एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में 4,600 से अधिक समुदायों का उल्लेख किया गया है। उपजातियों की भी गणना हो तो यह आंकड़ा कई गुना और बढ़ने की उम्मीद है।
जातीय व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि नीची से नीची समझे जाने वाली जाति भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है और उसका मखौल उड़ाती है। मगर अब जैसे जैसे शिक्षा, तकनीक, शहरीकरण और समृद्धि का फैलाव बढ़ा है, समाज इस कूप मंडूकता से धीरे धीरे ही सही मगर बाहर आ रहा है। तमाम जातियों के युवा अब प्रेम विवाह करते समय जाति की परवाह नहीं करते। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में अंतर्जातीय विवाहों की संख्या अब ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है। महानगरों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में भी अंतरजातीय विवाह अपेक्षाकृत बढ़े हैं।
इन्हीं राजकुमार भाटी के एक बयान को लेकर आजकल जो विवाद चहुंओर छाया हुआ है, उसे देख सुन कर दुख होता है। मैने लगभग बारह मिनट का उनका पूरा भाषण सुना और विभिन्न जातियों को लेकर समाज में प्रचलित लोकोक्तियों के उद्धरण के अतिरिक्त बाकी सारी बातें बहुत गहरी और सम सामायिक लगीं। जिन लोकोक्तियों का जिक्र उन्होंने किया उन्हें भी उन्होंने मन से नहीं बनाया और वे न जाने कब से समस्त उत्तर भारत में कही सुनी जा रही हैं। मगर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि उन्हें ऐसे मुहावरों और लोकोक्तियों को सार्वजनिक मंचों पर कहने से बचना चाहिए था। मेरा ऐसा कहने का एकमात्र कारण यह है कि ऐसी बातों की अनुगूंज सदैव नकारात्मक ही होती है और इससे जातीयता के खिलाफ प्रगतिशील समाज की लड़ाई केवल कमजोर होती है। समस्त समाज जरूरी विषयों से हट कर इन पर चर्चा में उलझ जाता है और इसका लाभ उन्हीं शक्तियों को होता है, जिनसे लड़ने में राजकुमार भाटी जैसे लोग पूरी ताकत से लगे हुए हैं।
वर्ष 1931 के बाद से भारत में पूरी जातिगत गणना नहीं हुई मगर एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में 4,600 से अधिक समुदायों का उल्लेख किया गया है। उपजातियों की भी गणना हो तो यह आंकड़ा कई गुना और बढ़ने की उम्मीद है।
इस साल हो रही जन गणना जातियों के आधार पर है और अगले साल तक तस्वीर साफ होने की उम्मीद की जा रही है। पता नहीं इस तरह की जन गणना से देश और समाज का कुछ भला होगा भी अथवा यह जातीयता की आग को और भड़काएगी। अजब स्थिति है कि यहां हर कोई अपनी जाति को लेकर दंभ अथवा हीन भावना पाले बैठा है और जब मौका मिले दूसरी जातियों का उपहास उड़ाने में गर्व महसूस करता है।
जिसके जीवन में कोई निजी उपलब्धि नहीं वह जीवन में इत्तेफाक से मिली जाति को ही अपनी पहचान बनाए घूम रहा है। जाति को लेकर हीन भावना पाले बैठे लोगों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हममें से ऐसा कौन होगा जिसने अपनी जाति से जुड़ी नकारात्मक बातें कभी न सुनी हों। आप बेशक खुद को सवर्ण कहें अथवा पिछड़ा, अनुसूचित कहें अथवा कुछ और मगर जातीय उपहास से आप भी शायद बच नहीं पाए होंगे। हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे कि जातीय व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि नीची से नीची समझे जाने वाली जाति भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है और उसका मखौल उड़ाती है। मगर अब जैसे जैसे शिक्षा, तकनीक, शहरीकरण और समृद्धि का फैलाव बढ़ा है, समाज इस कूप मंडूकता से धीरे धीरे ही सही मगर बाहर आ रहा है। तमाम जातियों के युवा अब प्रेम विवाह करते समय जाति की परवाह नहीं करते। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में अंतर्जातीय विवाहों की संख्या अब ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है। महानगरों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में भी अंतरजातीय विवाह अपेक्षाकृत बढ़े हैं।
स्वयं भारत सरकार भी ऐसे विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए योजनाएँ चलाती रही है। याद कीजिए, पचास साठ साल पहले भी क्या यही स्थिति थी? क्या तब भी दूसरी जातियों के लोगों के साथ हम इतने ही सहज थे, जितने आज हैं? क्या हम भूल गए कि हमारे घरों में नीची समझी वाली जाति के लिए चाय की प्याली तक अलग होती थी मगर अब भी ऐसा है क्या? किसी को पुकारते समय अरे फलाने के जैसे संबोधन क्या हमने बचपन में नहीं सुने? मगर अपने बुजुर्गों की नादानियों से अब हमने पल्ला छुड़ा नहीं लिया है क्या?
ऐसे में क्या कोई दावे से कह सकता है कि भारत में जाति प्रथा स्थाई तौर पर प्रभावी रहने जा रही है? हो सकता है कि हमारे जीते जी यह व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त न हो मगर अगले सौ दो सौ सालों की क्या कोई गारंटी ले सकता है? इस ज़हालत से बाहर आए बिना भारत तरक्की कर भी सकता है क्या? इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिगत राजनीति के विरोध में धर्म की राजनीति शुरू हुई थी और अब धर्म की राजनीति के मुखालिफ जातियों को खड़ा किया जा रहा है मगर क्या यह दौर सदा रहने वाला है? क्या हम भारतीय सदैव इतने ही भोले रहेंगे? कुछ जमा बात यह नहीं है क्या कि जातीय वैमनस्य का दौर लगभग बीत चुका है और जहां थोड़ा बहुत है, वह भी आखरी सांसें गिन रहा है ? तो फिर क्यों उस काले अध्याय को याद करना ? क्या जातीयता से उपजे दंभ अथवा हीन भावना को रात गई बात गई कि तर्ज पर भुलाया नहीं जाना चाहिए ? रहा सवाल धर्म की राजनीति का तो उसका समाधान भी वक्त खुद कर लेगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।