संजय कुमार शर्मा
किसी संकट की घड़ी में किसी बहादुर व्यक्ति की हिम्मत बढ़ाना, उसके साहस को सलाम करना और उसके परिवार को भरोसा देना प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की स्वाभाविक जिम्मेदारी है। लेकिन जब किसी घटना के बाद शब्दों की व्याख्या इस तरह होने लगे कि मानो सत्ता में बैठा व्यक्ति जमीन पर रहते हुए आसमान में उड़ रहे लोगों की सुरक्षा का स्वयं नियंत्रक हो, तब सवाल केवल एक बयान का नहीं रह जाता। सवाल सत्ता की भाषा, उसके प्रचार और मीडिया की भूमिका का हो जाता है।
फ्लाईदुबई के विमान में सह-पायलट के कथित हमले के दौरान कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस साहस का परिचय दिया, वह निस्संदेह असाधारण है। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलने की कोशिश की, जिससे यात्रियों और अन्य क्रू सदस्यों को हमलावर पर काबू पाने का अवसर मिला और विमान को सुरक्षित रूप से मोड़ा जा सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्पताल में उनसे वीडियो कॉल पर बात की और उनके साहस, धैर्य तथा त्वरित निर्णय की प्रशंसा की। यहां तक सब कुछ सामान्य और प्रशंसनीय है। लेकिन इसके बाद जो सवाल उठता है, वह कहीं अधिक गंभीर है। क्या आज भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री की छवि को इतना विराट बनाने की कोशिश हो रही है कि हर सफलता का श्रेय अंततः सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा दिया जाए? क्या मीडिया को हर घटना में प्रधानमंत्री की मौजूदगी को इस तरह प्रस्तुत करने से पहले यह नहीं देखना चाहिए कि वास्तविक श्रेय किसे जाता है?
विमान आसमान में था। संकट कॉकपिट के भीतर था। खतरे का सामना कैप्टन स्मित मच्छार और विमान में मौजूद लोगों ने किया। विमान को संभालने में पायलट का प्रशिक्षण, वर्षों का अनुभव, तत्काल निर्णय, यात्रियों का सहयोग और अन्य पायलटों की भूमिका थी। प्रधानमंत्री उस विमान में मौजूद नहीं थे। इसलिए किसी भी राजनीतिक नेता की प्रशंसा करते समय वास्तविक घटनाक्रम और उसकी सीमाओं को स्पष्ट रखना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी विवरण भी यही बताता है कि मोदी ने मच्छार के साहस, धैर्य और त्वरित निर्णय की प्रशंसा की तथा कहा कि उन्होंने अनेक लोगों की जान बचाई। यहां तथ्य और राजनीतिक व्याख्या के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
फिर सवाल यह है कि इस पूरे प्रसंग को किस दिशा में ले जाया जा रहा है? भारतीय परंपरा में ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का अर्थ अत्यंत गहरा दार्शनिक है। इसका अर्थ किसी राजनीतिक व्यक्ति का स्वयं को भगवान घोषित करना नहीं है। इसलिए किसी नेता पर सीधे यह आरोप लगाना कि वह स्वयं को भगवान समझता है, बिना ठोस प्रमाण के उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र में व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है।
क्योंकि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री भगवान नहीं होता। प्रधानमंत्री संविधान के अधीन काम करने वाला निर्वाचित कार्यपालिका प्रमुख होता है। उसकी शक्ति भी संविधान से आती है और उसकी जवाबदेही भी संविधान के प्रति होती है। यही वह बिंदु है जहां मीडिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कोई प्रधानमंत्री किसी घायल नागरिक से बात करता है, तो खबर होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री ने उससे बात की, उसकी स्थिति पूछी, उसके साहस की प्रशंसा की और सहायता का आश्वासन दिया। लेकिन यदि खबर का प्रस्तुतिकरण ऐसा वातावरण पैदा करने लगे कि प्रधानमंत्री हर संकट के प्रत्यक्ष नियंत्रक हैं, तो पत्रकारिता और प्रचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।आज सोशल मीडिया के दौर में यह खतरा और बढ़ गया है। सत्ता से जुड़े किसी भी संवाद का वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे में शब्दों की सटीकता और संदर्भ की जिम्मेदारी मीडिया की कई गुना बढ़ जाती है। लोकतंत्र में सुर्खियां भावनाएं भड़का सकती हैं, लेकिन पत्रकारिता का धर्म तथ्यों को सामने रखना है।
कैप्टन स्मित मच्छार ने स्वयं बताया कि संकट की घड़ी में उन्हें हनुमान चालीसा से मानसिक शक्ति मिली। प्रधानमंत्री ने भी उनकी बहादुरी और आध्यात्मिक विश्वास का उल्लेख किया। यहां आस्था व्यक्ति की निजी शक्ति बनती है; लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनेता को दैवी शक्ति से जोड़ना एक अलग बात है। देश को यह अंतर समझना होगा। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता अलग विषय है, प्रधानमंत्री की संवैधानिक भूमिका अलग। किसी नेता के प्रति सम्मान अलग बात है और उसे सर्वशक्तिमान मान लेना अलग।
मीडिया का काम नेता की छवि को देवत्व प्रदान करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से ऊपर उठे। विमान को बचाने वाले पायलट की कहानी पायलट की ही कहानी रहे। उसकी बहादुरी को किसी राजनीतिक प्रचार का परिशिष्ट न बनाया जाए। प्रधानमंत्री की भूमिका का उल्लेख हो, लेकिन उतना ही जितना वास्तव में हुआ है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि कोई नेता बहुत लोकप्रिय हो जाए। असली खतरा तब पैदा होता है जब संस्थाएं, मीडिया और नागरिक धीरे-धीरे यह मानने लगें कि सत्ता का व्यक्ति गलती से परे है, प्रश्नों से ऊपर है और हर सफलता का स्वाभाविक केंद्र वही है। सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा संकट के समय होती है, और मीडिया की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब सत्ता के साथ खड़े होने और सत्ता से सवाल पूछने के बीच चुनाव करना हो। यदि पत्रकारिता सवाल पूछना छोड़ दे तो लोकतंत्र में संस्थागत संतुलन कमजोर पड़ता है।
यही कारण है कि किसी भी लोकप्रिय नेता की छवि से अधिक महत्वपूर्ण संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता है। भारत का लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की असाधारणता पर नहीं, बल्कि संविधान, संस्थाओं और नागरिकों की सामूहिक शक्ति पर टिका है। इसलिए सवाल मोदी के भगवान होने या न होने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम लोकतंत्र में किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री को इतना बड़ा बना रहे हैं कि उसके सामने सवाल पूछने की हमारी क्षमता ही छोटी पड़ जाए? यदि ऐसा हो रहा है तो दोष केवल सत्ता का नहीं होगा। उसमें मीडिया की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। और यही वह क्षण है जब पत्रकारिता को तय करना होगा—उसे सत्ता का महिमामंडन करना है या सत्ता के सामने आईना रखना है।
क्योंकि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। और जब सत्ता को सवालों से ऊपर मान लिया जाता है, तभी लोकतंत्र धीरे-धीरे व्यक्ति-पूजा की ओर बढ़ता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और एनसीआर टुडे समाचार पत्र समूह के संपादक हैं।

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