कानून के राज पर उठते गंभीर सवाल
संजय कुमार शर्मा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार देता है। संविधान की यह व्यवस्था लोकतंत्र की बुनियाद है। इसका स्पष्ट संदेश है कि कानून की नजर में कोई व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं, बल्कि सभी समान हैं। लेकिन जब अदालतों की कार्यवाही और सरकारी अधिकारियों के व्यवहार को देखा जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संविधान का यह महत्वपूर्ण सिद्धांत वास्तव में जमीन पर लागू हो रहा है या फिर केवल संविधान की किताबों तक सीमित रह गया है? अदालती अवमानना के मामलों में आम नागरिकों और छोटे कर्मचारियों के प्रति सख्त रुख तथा शीर्ष अफसरशाही के मामलों में दिखाई देने वाली नरमी इस सवाल को और गंभीर बनाती है।
ताजा मामला सीजेपी आंदोलन के दौरान नागरिक सुविधाओं को बंद किए जाने और इस संबंध में उच्चतम न्यायालय के आदेशों की कथित अवहेलना से जुड़ा है। बताया गया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को भी सुनवाई की और आवश्यक निर्देश दिए। इसके बावजूद यदि सरकारी अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था और अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर नागरिक सुविधाओं को प्रभावित होने दिया, तो यह केवल प्रशासनिक चूक का मामला नहीं रह जाता। यह सवाल भी उठता है कि क्या सरकार और उसके अधिकारी न्यायपालिका के आदेशों को अपनी सुविधा के हिसाब से लागू करने लगे हैं?
लोकतंत्र में न्यायपालिका की प्रतिष्ठा केवल उसके संवैधानिक अधिकारों से नहीं, बल्कि उसके आदेशों के प्रभावी पालन से भी कायम रहती है। अदालत का आदेश जारी होने के बाद यदि सरकारी तंत्र उसे लागू करने में आनाकानी करता है, तो आम नागरिक के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होता है। इससे भी गंभीर स्थिति तब बनती है, जब आदेशों की अवहेलना के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी अदालत में पेश होकर बिना शर्त माफी मांग लेते हैं और मामला समाप्त होने की उम्मीद करने लगते हैं। सवाल यह है कि क्या माफी मांग लेना किसी भी कथित अवमानना का पर्याप्त समाधान हो सकता है?
सीजेपी प्रदर्शन के दौरान सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की कथित अवहेलना के मामले में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह सचिव की ओर से कानून-व्यवस्था तथा अन्य प्रशासनिक परिस्थितियों का हवाला दिए जाने की बात सामने आई है। संबंधित अधिकारियों ने बिना शर्त माफी भी मांगी। लेकिन अदालत को यह तय करना होगा कि माफी वास्तविक गलती स्वीकार करने का प्रमाण है या फिर संभावित दंड से बचने का आसान रास्ता। न्यायालय को अधिकारियों के स्पष्टीकरण, परिस्थितियों और आदेशों के अनुपालन से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि जानबूझकर आदेश की अवहेलना साबित होती है, तो केवल माफी के आधार पर मामले को समाप्त करना न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि न्यायालय की अवमानना का उद्देश्य किसी अधिकारी को अपमानित करना या बदले की भावना से दंडित करना नहीं है। इसका मूल उद्देश्य न्यायिक आदेशों की गरिमा बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था न्याय व्यवस्था को चुनौती देने की स्थिति में न आ जाए। लेकिन इस उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है, जब अदालतें प्रत्येक मामले में समान मानदंड अपनाएं। किसी सामान्य नागरिक से अदालत के आदेश की अवहेलना होने पर यदि कठोर कार्रवाई की जाती है, तो किसी वरिष्ठ अधिकारी को भी केवल उसके पद और प्रशासनिक हैसियत के कारण राहत नहीं मिलनी चाहिए।
सरकारों और अफसरशाही के लिए भी यह समझना आवश्यक है कि प्रशासनिक अधिकार असीमित नहीं हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार की है, लेकिन इसके नाम पर नागरिकों की आवश्यक सुविधाओं को अनिश्चितकाल तक बाधित करने या न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करने की छूट नहीं मिल सकती। यदि किसी आदेश को लागू करने में वास्तविक कठिनाई है, तो संबंधित अधिकारी को अदालत के सामने तथ्य रखने चाहिए और उचित निर्देश मांगने चाहिए। न्यायिक आदेशों को अपनी मर्जी से बदलना या उनकी अनदेखी करना किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वीकार्य तरीका नहीं हो सकता।
नागरिक सुविधाओं का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी आंदोलन, विरोध या प्रशासनिक विवाद का सबसे अधिक असर आम लोगों पर पड़ता है। रोजाना काम पर जाने वाले कर्मचारी, विद्यार्थी, मरीज और छोटे कारोबारी ऐसी परिस्थितियों में सबसे अधिक परेशान होते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करने वालों के अधिकारों और आम नागरिकों की सुविधाओं के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन का दायित्व है। लेकिन यदि इस संतुलन के नाम पर अदालत के आदेशों को ही कमजोर कर दिया जाए, तो इससे न तो लोकतंत्र मजबूत होगा और न ही कानून का शासन।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर उठते सवालों ने सार्वजनिक विश्वास को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में न्यायपालिका की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। अदालतों को यह साबित करना होगा कि न्याय के दरवाजे पर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए कानून का पैमाना समान है। न्यायपालिका की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होना किसी एक मामले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट को संबंधित अधिकारियों की माफी पर निर्णय लेते समय केवल उनके शब्दों को नहीं, बल्कि उनके आचरण, आदेशों के पालन और नागरिकों को हुई परेशानी को भी ध्यान में रखना चाहिए। जहां जानबूझकर अवमानना साबित हो, वहां कानून के अनुरूप प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, वास्तविक प्रशासनिक कठिनाइयों और सद्भावना से हुई त्रुटियों में अंतर करना भी जरूरी है। यही निष्पक्ष न्याय का तकाजा है।
आखिर अदालतों की प्रतिष्ठा केवल सख्त टिप्पणियां करने से नहीं, बल्कि अपने आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने से कायम होती है। यदि सरकारी अधिकारी पहले मनमानी करें और बाद में अदालत में माफी मांगकर राहत पाने की उम्मीद रखें, तो इससे कानून के शासन का संदेश कमजोर पड़ेगा। न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि संविधान का अनुच्छेद 14 केवल आम नागरिकों के लिए कर्तव्य और अनुशासन का पाठ न बने, बल्कि सत्ता के गलियारों में बैठे शीर्ष अधिकारियों पर भी समान रूप से लागू हो। कानून से ऊपर कोई नहीं, न आम नागरिक, न सरकार और न ही देश की शीर्ष अफसरशाही। यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।