उपलब्धियों के आकलन पर छिड़ी बहस

Ncr Today. Khabariya. New Delhi। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले पीएम बनने जा रहे हैं। इस अवसर पर जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेता इसे ऐतिहासिक उपलब्धि और देश के लिए गौरव का विषय बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों के नेताओं ने कार्यकाल की अवधि के बजाय उसके प्रभाव और उपलब्धियों को अधिक महत्वपूर्ण बताया है।
हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री जगत सिंह नेगी ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से किए जाने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि दोनों नेताओं की परिस्थितियां, चुनौतियां और समयकाल पूरी तरह अलग रहे हैं। उन्होंने कहा कि नेहरू अपने दौर के एक महान नेता थे, जिन्होंने ऐसे समय में देश का नेतृत्व किया, जब भारत में बुनियादी औद्योगिक और विनिर्माण ढांचा भी बेहद सीमित था। इसके बावजूद उनकी सोच दूरदर्शी थी और उन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखने का काम किया।
नेगी ने कहा कि किसी भी दो नेताओं की तुलना तभी उचित हो सकती है, जब उनकी परिस्थितियां और चुनौतियां समान हों। चुनावी सफलता के कारण किसी नेता का कार्यकाल लंबा हो सकता है, लेकिन केवल लंबे समय तक सत्ता में बने रहना ही किसी की उपलब्धियों का पैमाना नहीं हो सकता। किसी भी सरकार या नेता का मूल्यांकन उसके द्वारा किए गए कार्यों, नीतियों और उनके सामाजिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल को लेकर चल रही चर्चाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक कार्यकाल की लंबाई अपने आप में उपलब्धि नहीं होती। उन्होंने कहा कि वास्तविक सवाल यह है कि उस कार्यकाल का आम लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ा और क्या लोगों की जिंदगी बेहतर हुई।
मनोज झा ने कहा कि वर्ष 2014 से लेकर अब तक देश में आय की असमानता, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक सौहार्द जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि इन मुद्दों पर सरकार को जवाब देना चाहिए और केवल कार्यकाल की अवधि को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि आजादी और देश विभाजन के बाद भारत बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। देश सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा था, लेकिन उस दौर के नेतृत्व ने एक आधुनिक और समावेशी भारत का सपना देखा था। उन्होंने आरोप लगाया कि उस सपने को वर्तमान समय में कमजोर करने का प्रयास हुआ है और कई मूलभूत आदर्शों को नुकसान पहुंचा है। जब देश का युवा वर्ग बेरोजगारी और भविष्य को लेकर चिंता में हो, तब ऐसे अवसरों पर उत्सव मनाना उचित नहीं लगता।

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