ईरान की मजबूरी भी है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को जल्दी खोलना
अर्जुन देशप्रेमी
आम तौर पर लोग सोच रहे हैं कि पश्चिम एशिया संघर्ष में ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद करके पूरी दुनिया की नाक में दम कर दिया है और इसके कारण अमेरिका और उसके राष्ट्रपति दबाव में या गए हैं। इसके कारण बहुत से लोग यह भी कहने लगे हैं कि ईरान युद्ध जीत रहा है और अमेरिका की यह एक बड़ी हार है। हार इस सेंस में कि अमेरिका चाहकर भी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खुलवा नहीं पा रहा है। इसके कारण पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है और तेल-गैस के दामों में उछाल आने के कारण पूरी दुनिया परेशान है। कई देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बेतहाशा बढ़ाने पड़े हैं तो कई देशों में लोग इनकी लाइनों में लगे पड़े हैं। भारत में भी समस्याएं बढ़ी हैं।
इस बीच खबरें आ रही हैं कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोलने को लेकर पिछले कई दिनों से जारी तनाव कम होने वाला है और ईरान इसे खोलने पर विचार कर रहा है। हालांकि ईरान ने खुलेआम इसका ऐलान नहीं किया है, पर सच में देखा जाए तो इस समुद्री जलमार्ग को खोलने के लिए ईरान भी लालायित होगा। चाहे वह कुछ भी कहे, पर सच यही है कि इसके बंद रहने से जितना ज्यादा नुकसान दुनिया के कुछ देशों को हो रहा है, उससे ज्यादा समस्या ईरान को ही हो रही है। और आने वाले दिनों मे ईरान के लिए इसका बंद होना जीवन मरण का प्रश्न भी बन सकता है। ऐसे में इस समुद्री मार्ग को खोलने को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वह राहत भरी दिख रही हैं और संभव है जल्दी ही इसे पूरी तरह खोल दिया जाए।
असल मे इसके बंद होने से अमेरिका और इस्राइल को कोई खास दिक्कत नहीं है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों की समस्या को देखते हुए इसको खोलने के लिए ईरान पर दबाव बना रहा था और दबाव बना रहा है, धमकियां दे रहा है। पर जिस तरह से अमेरिका और यूरोप के रिश्ते बदले हैं, उसमें अब अमेरिका के लिए इसका खुलना या बंद रहना कोई खास मायने नहीं रखता है। अमेरिकी राष्ट्रपति इस बात को बोल भी चुके हैं कि अमेरिका के पास अपना पर्याप्त तेल और गैस भंडार है। उसे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से कुछ नहीं लेना है। जिसको इसके माध्यम से तेल और गैस लेना हो, वह खुद पहल करे, इसे खुलवाए। मतलब साफ है कि अब अमेरिका इसको लेकर चिंतित नहीं है। अगर कोई चिंतित है तो वे हैं यूरोपियन देश, भारत, चीन, पाकिस्तान, जापान और कोरिया जैसे देश। यही कारण है कि ब्रिटेन के नेतृत्व में दुनिया के प्रभावित होने वाले 50 देशों ने बैठक कर इसे खुलवाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।
वास्तव में ये ऐसे देश हैं जो ईरान से कोई दुश्मनी नहीं रखते हैं। इन देशों ने युद्ध में अमेरिका और इस्राइल का साथ भी नहीं दिया है। उलटे अमेरिका को आईना ही दिखाया है। सो अगर ये देश ईरान से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ खोलने के लिए कहते हैं तो ईरान को भी सोचना पड़ेगा कि वह इसे खोले। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो ये देश जो अबतक लगभग मित्रवत हैं या मित्र हैं, वे भी ईरान से किनारा करेंगे और ईरान के प्रति उनकी सहानुभूति कम हो जाएगी। संभव है ऐसे में वे दुनिया के दूसरे हिस्सों से तेल और गैस की खरीद को विवश हो जाएं और ईरान हमेशा के लिए अपने खरीदार खो दे। अगर इस संकट में ईरान ने हठधर्मिता अपनाई तो भविष्य में ये देश हठधर्मिता अपना सकते हैं जो दीर्घावधि मे ईरान के लिए घातक होगा।
इसके साथ ही ईरान की एक बड़ी दिक्कत यह है कि वह इतने ही दिनों के युद्ध में काफी हद तक तबाह हो चुका है, उसके इन्फ्रस्ट्रक्चर पर भारी बमबारी हुई है और वह लगभग तबाह हो चुका है। युद्ध के कारण उसके स्वयं के तेल और गैस की बिक्री लगभग रूकी हुई है। ऐसे में अगर वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ नहीं खोलता है और लंबे समय तक इसे बंद रखता है तो वह अपना तेल और गैस बेचेगा कैसे? और तेल नहीं बेचेगा तो खाएगा कैसे? ईरान ज्यादातर चीजों का आयात करता है। उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल के निर्यात पर निर्भर है। ऐसे में अगर वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ नहीं खोलता है तो दूसरे देशों से आवश्यक सामग्री और मानवीय मदद लेकर जाने वाले जहाज, खासकर कार्गो शिप उसके यहां आएंगे कैसे? उसके यहां दवाइयां कैसे पहुंचेंगी? उसे अपने को फिर से खड़ा करने के लिए दूसरी आवश्यक सामग्री, मशीनरी, उपकरण कैसे मिलेंगे? हवाई मार्ग से तो संकट यह है कि ईरान की तरफ जाने वाले विमानों को तो इस्राइल और अमेरिका हवा में ही मार सकते हैं। एयर डिफेन्स नहीं होने के कारण वह अपने विमानों या अपने यहां आने वाले विमानों को बचाने में भी सक्षम नहीं है। कुल मिलकर ईरान आवश्यक जींसों, दवाइयों, चिकित्सा उपकरणों निर्माण सामग्रियों आदि की कमी के साथ ही खाने पीने के सामानों की कमी से ही जूझ नहीं पाएगा जो वहां के आम लोगों के जीवन को नरक बना देगा।
अगर तटस्थ और मित्र देशों के कहने पर ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ नहीं खोलता है तो यही देश कल को उसकी समस्याओं से मुंह मोड़ेंगे और ईरान की बातों को वैसे ही इग्नोर करेंगे जैसा की ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ खोलने को लेकर करेगा। ऐसे में सोचिए ईरान का क्या होगा। अभी जो भी मित्र देश बचे हैं, वे भी नहीं रहेंगे और दुनिया में अकेले कोई देश जीवित नहीं रह सकता। आज हर देश किसी न किसी रूप से दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर है।
शायद यही कारण है कि आज ईरान ने साफ भी किया है कि उसे युद्धविराम का प्रस्ताव मिला है। हालांकि वह कह रहा है कि अमेरिका और उसके मित्र देशों के लिए वह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ नहीं खोलेगा, पर इसके इसके साथ ही वह भारत और चीन समेत की देशों के जहाजों को रास्ता भी दे रहा है और जल्दी ही इसे खोलने के संकेत भी दे रहा है।
जिस ओमान पर ईरान ने युद्ध के दौरान हमले किए या कर भी रहा है, अब कह रहा है कि केवल ईरान और ओमान ही होर्मुज का भविष्य तय करेंगे। यानी वह ओमान के साथ नरमी बरत रहा है। भारत जैसे देश को साधने के लिए भारत स्थित ईरानी दूतावास ने इसे शेयर करते हुए भारतीय दोस्तों को भरोसा दिलाया कि वे ‘सुरक्षित हाथों’ में हैं। यानी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में भारत के जहाज सुरक्षित हैं। एक तरह से भारत के लिए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ खुला ही हुआ है। तभी तो कई जहाज वहां से निकल भी रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के इस अड़ियल रवैये को बदलने के पीछे उसके कुछ मित्र देशों और न्यूट्रल देशों (जैसे भारत) की बड़ी भूमिका रही है। लगातार चल रही बातचीत का असर ईरान पर हुआ है। इन देशों ने ईरान को उसके भविष्य को लेकर काफी कुछ समझाया भी है। साफ किया है कि अगर होर्मुज को लंबे समय तक बंद रखा गया, तो दुनिया भर में उसका बहिष्कार हो सकता है और उसके अपने घायल सैनिकों और नागरिकों के लिए जरूरी दवाएं और राशन पहुंचना बंद हो जाएगा। इसी ‘मानवीय मजबूरी’ और कूटनीतिक दबाव के कारण ईरान ने होर्मुज का संकरा द्वार खोलने को लेकर ईरान अब अपना रूख बदलने वाला है। अब देखना है कि वास्तविकता में ईरान इसका ऐलान कब करता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)