संजय कुमार शर्मा
देश में इन दिनों विकास का शोर कुछ इस तरह सुनाई दे रहा है मानो विकास का दूसरा नाम केवल कंक्रीट, एक्सप्रेस-वे, ऊंची इमारतें, औद्योगिक गलियारे और विशाल परियोजनाएं रह गया हो। सत्ता के मंचों से विकास-विकास की आवाज लगातार उठ रही है, लेकिन इस शोर के बीच एक सवाल दबता जा रहा है—इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है? यदि इस कीमत में खेत, गांव, कृषि भूमि और किसान का भविष्य शामिल है तो फिर यह विचार करना जरूरी है कि विकास आखिर किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है?
शहरीकरण निश्चित रूप से आधुनिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है। उद्योग, आवास, परिवहन, अस्पताल, स्कूल और आधारभूत ढांचे के लिए भूमि चाहिए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विकास की योजनाओं का सबसे आसान रास्ता कृषि भूमि को मान लिया जाता है। शहर फैलते जाते हैं, कंक्रीट के जंगल बढ़ते जाते हैं और उनके बीच खेत सिकुड़ते जाते हैं। भारत सरकार के भूमि उपयोग आंकड़ों में भी कृषि भूमि में कमी का रुझान दिखाई देता है। 2018-19 में देश में कृषि भूमि लगभग 180.62 मिलियन हेक्टेयर थी, जो 2021-22 में घटकर लगभग 180.11 मिलियन हेक्टेयर रह गई। सरकार के 2023-24 के भूमि उपयोग आंकड़ों में कृषि भूमि करीब 179.596 मिलियन हेक्टेयर दर्ज की गई है।
आंकड़े भले ही धीरे-धीरे बदलते दिखाई दें, लेकिन इनके पीछे छिपा सवाल बहुत बड़ा है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में कृषि योग्य भूमि का लगातार गैर-कृषि उपयोग की ओर जाना केवल जमीन का परिवर्तन नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
विडंबना यह है कि जिस किसान को देश का अन्नदाता कहा जाता है, वही अपनी जमीन के भविष्य को लेकर सबसे असुरक्षित दिखाई देता है। किसान के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। वह उसकी आजीविका, सामाजिक पहचान, पारिवारिक सुरक्षा और अगली पीढ़ी की उम्मीद होती है। जमीन चली गई तो केवल खेत नहीं जाता, उसके साथ खेती का कौशल, पशुपालन, स्थानीय रोजगार और गांव की पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को अधिक न्यायपूर्ण और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से 2013 में भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम बनाया गया। कानून में सामाजिक प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई, आपत्तियों की प्रक्रिया, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं। कानून का घोषित उद्देश्य ही यह है कि प्रभावित लोगों को केवल मुआवजा पाने वाला व्यक्ति न माना जाए, बल्कि विकास की प्रक्रिया में उनका सामाजिक और आर्थिक स्तर बेहतर हो।
लेकिन सवाल कानून की किताब में लिखे प्रावधानों का नहीं, उनके जमीन पर उतरने का है।
किसान की असली परेशानी अक्सर अधिग्रहण की अधिसूचना से पहले शुरू हो जाती है। जमीन का बाजार मूल्य बढ़ता है, आसपास की जमीनें तेजी से खरीदी-बेची जाती हैं और परियोजना आने की खबर के साथ ही जमीन का आर्थिक महत्व बदल जाता है। ऐसे समय में छोटे और सीमांत किसान सबसे कमजोर स्थिति में होते हैं। उनके पास न कानूनी सलाह की पर्याप्त सुविधा होती है, न प्रशासनिक तंत्र तक पहुंच और न ही लंबे मुकदमों को लड़ने के लिए आर्थिक क्षमता।
यही कारण है कि जमीन के सवाल को केवल मुआवजे के सवाल तक सीमित करना गलत होगा। असली सवाल यह है कि जमीन गंवाने के बाद किसान का जीवन कैसे चलेगा? एकमुश्त मुआवजा कुछ वर्षों में समाप्त हो सकता है, लेकिन जमीन से मिलने वाली आय पीढ़ियों तक चल सकती थी। यदि किसान को जमीन के बदले केवल पैसा मिलता है और वह पैसा खत्म होने के बाद उसके पास स्थायी आय का साधन नहीं बचता, तो पुनर्वास का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
इसके साथ ही आबादी और आवासीय अधिकारों का प्रश्न भी गंभीर है। विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर और आसपास के तेजी से शहरीकरण वाले इलाकों में कृषि भूमि, आबादी क्षेत्र और ग्रामीण बस्तियों से जुड़े विवाद लंबे समय तक चलते रहे हैं। लाल डोरा जैसे पुराने भू-अधिकार ढांचे से जुड़े विवादों में भी स्वामित्व, निर्माण, रिकॉर्ड और नियमितीकरण के सवाल उठते रहे हैं। जब गांव के विस्तार और शहर के विस्तार के बीच जमीन की कीमत आसमान छूने लगती है तो सबसे पहले स्पष्ट और सुरक्षित भू-अधिकार की जरूरत होती है। लेकिन यदि रिकॉर्ड अस्पष्ट हों और विवाद वर्षों तक अदालतों और दफ्तरों में घूमते रहें तो किसान की जमीन उसके लिए संपत्ति कम और विवाद अधिक बन जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि भूमि उपयोग की नीति किसके हित में बन रही है। सरकारें उद्योग, निवेश और रोजगार के नाम पर बड़े प्रोजेक्ट लाने की कोशिश करती हैं। यह अपने आप में गलत नहीं है। देश को उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए और आधुनिक बुनियादी ढांचा भी चाहिए। लेकिन उद्योग लगाने के लिए सबसे उपजाऊ कृषि भूमि ही क्यों चुनी जाए? सरकार की अपनी नीति में भी कम जैविक क्षमता वाली, अनुपजाऊ अथवा अन्य कारणों से कृषि के लिए कम उपयोगी भूमि को गैर-कृषि विकास के लिए प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
यही वह जगह है जहां विकास की नीति की परीक्षा होती है।
यदि किसी औद्योगिक परियोजना के लिए हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन ले ली जाती है और उसके बाद वही जमीन वर्षों तक परियोजना की प्रतीक्षा करती रहती है, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि संसाधन प्रबंधन का गंभीर प्रश्न है। 2013 के कानून में अधिग्रहित लेकिन उपयोग में न लाई गई भूमि की वापसी और उच्च कीमत पर हस्तांतरण से जुड़े प्रावधान भी मौजूद हैं। इन प्रावधानों का वास्तविक अनुपालन कितना प्रभावी है, इसकी नियमित सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए।
दूसरी ओर, किसानों की शिकायत यह भी रही है कि जमीन की कीमत तय करते समय भविष्य में होने वाली कीमत वृद्धि का वास्तविक लाभ उन्हें नहीं मिलता। जिस जमीन को किसान की आजीविका के लिए जरूरी समझा जाता है, वही जमीन अधिग्रहण के बाद कारोबारी या शहरी उपयोग में पहुंचते ही कई गुना मूल्यवान हो जाती है। ऐसे मामलों में किसान के मन में यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि विकास से पैदा होने वाली संपत्ति में उसका हिस्सा आखिर कितना है?
यहां सरकारों और उद्योग जगत दोनों की जिम्मेदारी बनती है। उद्योग लगाना अपराध नहीं है और पूंजी निवेश को संदेह की नजर से देखना भी उचित नहीं। लेकिन यदि किसी परियोजना के लिए भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठें, जमीन के मालिकों और वास्तविक प्रभावित परिवारों के हितों की अनदेखी हो अथवा जमीन के उपयोग और स्वामित्व में बड़े बदलाव हों, तो पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक निगरानी आवश्यक हो जाती है।
भूमि का सवाल इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि जमीन सीमित है। उद्योग और शहर बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन उपजाऊ जमीन को उसी रूप में वापस बनाना आसान नहीं। एक बार किसी उपजाऊ खेत पर स्थायी कंक्रीट संरचना खड़ी हो गई तो उसे फिर से खेत बनाना लगभग असंभव हो सकता है। इसलिए विकास की योजना में भूमि को केवल उपलब्ध संसाधन मानना खतरनाक है।
भारत की खाद्य सुरक्षा भी इसी जमीन से जुड़ी है। कृषि भूमि घटेगी तो उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकता पर और अधिक दबाव पड़ेगा। जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा, किसानों की लागत बढ़ेगी और खाद्य आयात पर निर्भरता का जोखिम भी बढ़ सकता है। ऐसे में कृषि भूमि का संरक्षण केवल किसान हित का मुद्दा नहीं, राष्ट्रीय हित का प्रश्न है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब गांव के किसान धीरे-धीरे जमीन से बाहर हो जाते हैं और वही जमीन बड़े कारोबारी या रियल एस्टेट हितों के नियंत्रण में चली जाती है। यह आरोप जहां भी सामने आएं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जमीन की खरीद-बिक्री के आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए। किस क्षेत्र में कितनी कृषि भूमि गैर-कृषि उपयोग में बदली, किसे आवंटित हुई, किस कीमत पर हुई और परियोजना कितनी जमीन पर वास्तव में बनी—इन सवालों के जवाब जनता के सामने होने चाहिए।
सरकार को विकास और किसान के बीच किसी एक को चुनने की मजबूरी पैदा करने के बजाय ऐसा मॉडल बनाना होगा जिसमें दोनों साथ चल सकें। इसके लिए कृषि भूमि के संरक्षण की स्पष्ट राष्ट्रीय नीति, भूमि रिकॉर्ड का पूर्ण डिजिटलीकरण, आबादी क्षेत्रों के अधिकारों का शीघ्र निपटारा, पारदर्शी भूमि मूल्यांकन, स्वतंत्र सामाजिक प्रभाव आकलन और अधिग्रहण के बाद वास्तविक पुनर्वास जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किसान को केवल मुआवजा पाने वाला व्यक्ति न समझा जाए। वह विकास परियोजना से प्रभावित नागरिक है और उसके अधिकारों की रक्षा संविधान तथा कानून दोनों की भावना के अनुरूप होनी चाहिए। 2013 का कानून भी प्रभावित परिवारों को विकास की प्रक्रिया में भागीदार बनाने की इसी व्यापक सोच को सामने रखता है।
विकास जरूरी है, लेकिन विकास का अर्थ खेत मिटाकर शहर बनाना नहीं हो सकता। विकास वह है जिसमें शहर भी बढ़े, उद्योग भी लगे, रोजगार भी पैदा हो और किसान की जमीन तथा उसकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहे।
सत्ता को यह तय करना होगा कि विकास के नारों के बीच किसान की आवाज कहीं खो न जाए। कंक्रीट के जंगलों की ऊंचाई से किसी देश की समृद्धि नहीं मापी जा सकती। समृद्धि तब होगी जब किसान के पास जमीन भी हो, उसकी जमीन का अधिकार भी सुरक्षित हो, उसकी मेहनत का उचित मूल्य भी मिले और विकास की दौड़ में उसका अस्तित्व ही समाप्त न हो।
आज जरूरत विकास-विरोध की नहीं, विकास की दिशा पर सवाल उठाने की है। देश को ऐसे विकास की जरूरत है जिसमें खेत केवल परियोजनाओं की जमीन न बनें, किसान केवल मुआवजे का आंकड़ा न बने और जमीन केवल पूंजी के विस्तार का साधन न रह जाए। यदि विकास की कीमत अन्नदाता की जमीन और आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा है, तो उस विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करना ही होगा।
क्योंकि जिस देश में खेत लगातार सिकुड़ते जाएं और भूमिहीनता बढ़ती जाए, वहां केवल ऊंची इमारतों को देखकर यह दावा नहीं किया जा सकता कि देश वास्तव में आगे बढ़ रहा है। असली विकास वही है जिसमें किसान जमीन का मालिक बना रहे और विकास उसकी जमीन छीनने के बजाय उसकी जिंदगी बेहतर करे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।

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