अर्जुन देशप्रेमी
पूरी दुनिया में काफी कुछ ऐसा घटित हो रहा है जिसमे पता लगना मुश्किल हो रहा है कि आने वाले समय में कौन किसके साथ बैठेगा और किससे अपने रिश्ते निभाएगा। अपने भारत की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसा लगा कि भारत और अमेरिका स्वाभाविक मित्र हैं। भारत अमेरिका के लिए बहुत मायने रखता है। यह बात इसलिए भी कही जा रही थी कि भारत के साथ मिलकर अमेरिका ने क्वाड का गठन किया। इसमे उसने जापान और ऑस्ट्रेलिया को भी साथ रखा जिसका मकसद चीन को काबू करना था। इसी तरह अमेरिका ने पकिस्तान से भी दूरी बना रखी थी जो धीरे धीरे चीन के काफी करीब चला गया। भारत और इजराइल के बीच बढ़ते रिश्तों ने भी इसी के संकेत दिए क्योंकि इजराइल और अमेरिका की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है।
पर हाल के कुछ महीनों के दौरान सब कुछ बदलता सा दिख रहा है। पहले छिपकर तो अब लगभग खुलेआम दोनों देशों के बीच दूरियां दिखने लगी हैं। अमेरिका अब भारत के दुश्मन पाकिस्तान के साथ गलबहियां कर रहा है। उसे पैसे दे रहा है, हथियार देने की भी बातें कर रहा है, उसके सामरिक बेसेज के इस्तेमाल की बातें सामने आ रही हैं। इसके उलट अमेरिका भारत पर टैक्स बोझ लादने की बातें कर रहा है। पकिस्तान के सेना प्रमुख को दावतें दे रहा है जो एक तरह से भारत के लिए उकसावे की बात है। इतना ही नहीं अमेरिका ब्रिक्स में भारत की भूमिका को लेकर भी चिढ रहा है।
हालत यह है कि अमेरिका जी-7 में भारत के साथ बैठक नहीं करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प शिखर सम्मलेन छोड़कर चले जाते हैं। भारत को नीचा दिखाने के मकसद से ट्रम्प प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तब बुलाते हैं जब पाकिस्तानी सेना प्रमुख ट्रम्प के पास बैठा होता है। यानि वह भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तानी सेना प्रमुख को एक ही तराजू में तौलने लगता है। भारत अमेरिका रिश्तों की गर्माहट तब ठंडी दिखने लगती है, जब भारत भी जवाब देने लगता है। ट्रम्प के न्योते को मोदी ठुकरा देते हैं। टैक्स (टैरिफ) के मुद्दे पर भारत कोई रियायत देने से मना कर देता है। ब्रिक्स सम्मलेन में भारत अमेरिका के रूख का समर्थन नहीं करता है और अमेरिका की जगह रूसी हथियारों को तरजीह देने की बात सार्वजनिक करने लगता है।
ऐसे में भारत का एक और कदम रिश्तों में ठण्ड को तब फिर उजागर करता है जब भारतीय प्रधानमंत्री उस क्यूबा के राष्ट्रपति से मिलते हैं जिसके साथ अमेरिका के बहुत ही ख़राब संबंधों का इतिहास रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री क्यूबा के राष्ट्रपति में मिले क्यों? असके पीछे की मंशा क्या है और इसके मायने क्या हैं?
पृष्ठभूमि के लिए बता दें कि क्यूबा और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच आधुनिक राजनयिक संबंध ठंडे हैं, जो ऐतिहासिक संघर्ष और भिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से उपजा है। इनके बीच शीत युद्ध के दौरान 1961 में संबंध टूट गए थे। हालाँकि दोनों देशों में 20 जुलाई, 2015 को राजनयिक संबंध बहाल हो गए पर रिश्ते अभी भी सामान्य नहीं हैं। एक तरह से जो सम्बन्ध भारत और पाकिस्तान के हैं वैसे ही सम्बन्ध अमेरिका और क्यूबा के हैं। 1960 से अमेरिका ने क्यूबा पर आर्थिक और व्यापार प्रतिबंध लगा रखे हैं।
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कानेल बरमूडेज़ से हाल ही में ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में आयोजित 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान औपचारिक रूप से मुलाकात की और द्विपक्षीय संबंधों को और प्रगाढ़ करने के लिए स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स, बायोटेक्नोलॉजी, पारंपरिक चिकित्सा (जैसे आयुर्वेद), डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और यूपीआई जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर चर्चा भी की। अमेरिका के कट्टर दुश्मन क्यूबा के राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मोदी की इस मुलाकात से डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह से परेशान हुए होंगे, यह समझने की बात है।
दरअसल अमेरिका ने जिस तरह से भारत के साथ व्यवहार करना आरम्भ किया है उसमे दो ही बातें हो सकती थी। या तो ट्रम्प की हर बात में हाँ मिलाई जाये या फिर जैसे को तैसा वाला जवाब दिया जाये और बराबरी के आधार पर रिश्तें रखे जायें। संभवतः इसी सिद्धांत के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह मुलाकात की है। यानि साफ सन्देश दिया गया है कि यदि आप हमारे दुश्मन पाकिस्तान के साथ मिलेंगे और उससे गलबहियां करने की कोशिश करेंगे तो भारत भी आपके दुश्मन क्यूबा के साथ दोस्ती कर सकता है। यानि आप हमें छेड़ने की कोशिश न करें। इस बात को प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को कूटनीतिक जवाब भी कहा जा सकता है। यह मुलाकात अमेरिका को यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भारत केवल अमेरिका की नीतियों का पिछलग्गू नहीं। भारत एक सार्वभौम देश है और अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। इस मुलाकात के माध्यम से भारत ने अमेरिका को यह सन्देश भी दिया है कि जब हम ऐसा कर सकते हैं तो अमेरिका के टैरिफ के मुद्दे पर भी नहीं झुकने वाले हैं। अगर वहां भी अमेरिका कोई दादागिरी जैसी बात करता है तो उसे मुंह की खानी पड़ेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *