अर्जुन देशप्रेमी
देश में बहुत सारे लोग परेशान हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत का क्या होगा? क्या भारत की अर्थव्यवस्था चौपट (डेड यानि मृत) हो गई है? आने वाले दिनों में क्या होगा? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तो कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था मर चुकी है और देश में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी भी यही दोहरा रहे हैं? ये ऐसा कह रहे हैं तो कुछ तो होगा। यह प्रश्न वाजिब भी है और चिंता का कारण भी हो सकता है। पर असलियत यह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था का मृत होना तो दूर, यह ठोस हाल में है जीवंत है और निकट भविष्य में भी कोई गड़बड़ी नहीं दिखती है।
पहला सवाल यह है कि मृत अर्थव्यवस्था होती क्या है? संभवतः उत्तर होगा कि जब गलत नीतियों से देश कंगाल हो जाए, खाने को अनाज न हो, देश में उत्पादन ठप्प हो, व्यापार ठप्प हो, विदेश से ख़रीदने के लिए ख़ज़ाने में पैसे न हों, सैनिकों को देने के लिए तनख्वाह न हो, सैन्य सामानों के लिए पैसे न हों, बेरोजगारी के कारण गृहयुद्ध छिड़ा हो, पहनने को कपड़े न हों, दूसरों के रहमों करम पर देश हो, उनके हर आदेश को मानने की विवशता हो, लोग भूखे मर रहे हों, महंगाई बढ़ने की दर आसमान छू रही हो, तो कहा जा सकता है कि उस देश की अर्थव्यवस्था मर चुकी है (मृत है) जैसा कि डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है और जिसे राहुल गाँधी और कुछ और नेता दोहरा रहे हैं।
पर आप स्वयं देखिये और विचार कीजिये कि क्या ऐसी कोई भी स्थिति देश में है? क्या 1966 की तरह भारतीयों के सामने भुखमरी की समस्या है? क्या हम वैसा गेहूं, जिसे अमेरिका में जानवरों को खिलाया जाता था, के खेप के मुफ्त में अमेरिका से आने का इन्तजार कर रहे हैं? और तो छोड़िये क्या देश में लोग राशन की दुकानों में, गैस की लाइन में लगे हैं, या किरासन तेल की लाइन में? और तो और क्या 1991 की तरह देश का सोना गिरवी रखना पड़ रहा है?
ऐसा तो कुछ भी नहीं है। उल्टा हम खाने पीने से लेकर ज्यादातर सामानों का निर्यात ही कर रहे हैं। आज भारत की अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जबकि क्रय-शक्ति समता की दृष्टि से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। देश में लगभग 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 2014 की तुलना में दोगुने से ज्यादा हो गई है। स्थिर मूल्यों पर प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 2014-15 में 72,805 रुपये थी, जो अब 1,14,710 रु तक पहुंच गयी। यह पिछले एक दशक की तुलना में 41,905 रुपये की वृद्धि है। भारतीय अर्थव्यवस्था अभी कितनी मज़बूत है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। जहाँ अमेरिका की जीडीपी विकास दर 1.8 प्रतिशत के आसपास रह गई है, वहीं भारत की 6.5 प्रतिशत के आसपास। चीन भी भारत से पीछे है। जापान, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे विकसित दश भारत से पीछे जा चुके हैं। और ऐसा इसलिए हुआ है कि देश में मज़बूत घरेलू माँग, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के विकास, ग्रामीण माँग में वृद्धि और सहायक सरकारी नीतियों ने अपना अपना काम किया है। मुद्रास्फीति (महंगाई दर) में उल्लेखनीय कमी आई है, जो अप्रैल 2025 में लगभग छह साल के निचले स्तर 3.2% पर पहुँच गई। खाद्य मुद्रास्फीति में भी अप्रैल में लगातार छठे महीने गिरावट आई है। 2024-25 में निर्यात 824।9 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुँच गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह 14% बढ़कर 81.04 अरब डॉलर हो गया है। हाल के वर्षों में रुपये की अस्थिरता में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे यह एशिया की सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक बन गई है।
आप अमेरिका पोषित एजेंसियों की रिपोर्ट ही देखें तो भारत की मज़बूत घरेलू खपत, बढ़ते निवेश और मज़बूत बैंकिंग क्षेत्र से विकास को और गति मिलने की उम्मीद है। हालाँकि कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं। पर एक प्रगतिशील और विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था के लिए यह जरूरी भी है। पर उपरोक्त तथ्यों पर गौर करें तो पायेंगे कि भारत की अर्थव्यस्था मृत (डेड) नहीं, ठोस और जीवंत है। समग्र दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के यह कहने में कोई दम नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था “डेड” है। और फिर राहुल गाँधी के तो कहने ही क्या जिनको न तो इतिहास के तथ्य मालूम हैं, न ही अर्थव्यवस्था के आंकड़े। उनको तो बस सत्ता के लिए कुछ भी ऐसा बोलना है जिससे मोदी को नीचा दिखाया जा सके भले ही इससे देश नीचा क्यों न दिखाया जा रहा हो। पर इस बार तो पूर्व केन्द्रीय मंत्री और उनके खास राजीव शुक्ला ने भी राहुल गाँधी को आइना दिखाया है। उनके साथी कई दलों के नेताओं ने भी ट्रम्प और राहुल गाँधी के उलट भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर बताया है। रही बात अमेरिकी टैरिफ की, तो इससे भारत पर असर तो पड़ेगा पर कोई खास नहीं। याद कीजिये जब भारत ने 1998 का परमाणु परीक्षण किया था और अमेरिका ने व्यापार तथा पैसा रोक दिया था, तब भी भारत की अर्थव्यवस्था 8 प्रतिशत के बराबर 2008 तक बढ़ी थी। बाद में अमेरिका को ही पीछे हटना पड़ा था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)